शनिवार, 16 मई 2020

निर्भया से निर्भया तक /सदानंद शाही


निर्भया कांड को हुए  सात साल हो गए। 2012 में जब यह कांड हुआ था ,पूरे देश में एक उद्वेलन महसूस किया गया।स्त्री के प्रति संवेदना और सहानुभूति की नदी बह चली थी। ऐसा लगा जैसे आने वाले दिनों में स्त्री के प्रति हमारी सामाजिक सोच बदल जाएगी और हम स्त्री के प्रति संवेदनशील हो जाएंगे । पूरे देश में प्रदर्शन हुए ,जुलूस और रैलियां निकाली गई ,भाषण हुए ,लेख लिखे गए, संसद से सड़क तक हंगामा बरपा।लेकिन वही ढाक के  तीन पात। एक तरफ न्याय प्रणाली को स्त्री मुखी बनाने की बात होती रही, उसे चुस्त-दुरुस्त करने की बात होती रही  उसी के साथ अपराधियों को सरेआम सजा देने की बात भी हुई । यह सब होता रहा और आए दिन बलात्कार की घटनाएं भी अखबारों में छपती रहीं।  शायद ही कोई ऐसा दिन बीता जिस दिन बलात्कार या स्त्री हिंसा की कोई घटना प्रकाश में  न आई हो । स्त्री हिंसा की  भयावह घटनाएं घटित होती रही, जिसमें छह महीने की बच्ची से लेकर नब्बे साल की बूढ़ी महिला तक शिकार बनी। ऐसी घटनाओं में धर्मगुरुओं से लेकर राजनेताओं तक की करतूतें सामने आईं। कोई धर्म ,कोई जाति, कोई राजनीतिक समूह  इसका अपवाद नहीं रहा। स्त्री हिंसा और स्त्री से दुर्व्यवहार के मामले में सबके दामन दागदार हुए।एक बात सामान्य रही कि हर स्त्री हिंसा में कसूरवार या अपराधी पुरुष यानी मर्द ही रहा। पिछले महीने हैदराबाद में प्रियंका रेड्डी के साथ हुई घटना ने एक बार फिर वैसा ही विक्षोभ  पैदा किया ।इस विक्षोभ के दौरान  देशभर में फिर तरह-तरह की  प्रतिक्रियाएं हुईं। तरह-तरह की मांगे हुईं-आरोपी का अंग भंग कर देने से लेकर गोली मार देने और  भीड़ के हवाले कर देने जैसी।   हैदराबाद में हुई घटना के बारे में यह मांग राज्यसभा तक पहुंची कि  ऐसे लोगों की लिंचिंग हो जानी चाहिए ।ऐसी मांग न्याय व्यवस्था के प्रति गहरी निराशा और अविश्वास का नतीजा थीं।ऐसा लगा कि कठोर और सख्त सजा देने पर स्त्री हिंसा  की घटनाएं कम हो जाएंगी। हैदराबाद पुलिस ने संभवतः ऐसे ही जन दबाव में चारों आरोपियों  को एनकाउंटर में मार गिराया ।इस एनकाउंटर की मिश्रित प्रतिक्रिया हुई।एक ओर चौतरफा  प्रशंसा हुई तो  कुछ खित्तों  से वैधानिकता का सवाल उठाया गया और यह कहा गया कि विधिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाना चाहिए और त्वरित और विधिक कार्रवाई होनी चाहिए, न कि एनकाउंटर ।इस पर बहस होती रहेगी ।
लेकिन असल  सवाल यह  है कि क्या  स्त्री के प्रति होने वाली हिंसा या बलात्कार को प्रभावी कानून और कठोर सजा  से पूरी तरह रोका जा सकता है ।यह सही है कि प्रभावी कानूनी प्रक्रिया एक डर पैदा करेगी और ऐसा कदम उठाने वाले या व्यवहार करने वाले के मन में हिचक पैदा होगी। लेकिन इससे ऐसी घटनाएं खत्म हो जायेंगी यह उम्मीद करना ज्यादा उम्मीद  करना होगा और  समस्या को ऊपर ऊपर से देखना होगा।हमें यह समझना होगा कि  बलात्कार या स्त्री के प्रति हिंसा की घटनाओं के मूल में  स्त्री विरोधी मनोरचना काम कर रही है । इस मनोरचना को बदले बिना स्त्री हिंसा या बलात्कार को रोकना संभव नहीं है। लाख टके का सवाल यह है कि क्या हम यह मनो रचना बदलने के लिए काम कर रहे हैं?
आमतौर पर स्त्री हिंसा को बलात्कार की घटनाओं से जोड़कर देखते हैं ।लेकिन यह बात समझनी चाहिए कि बलात्कार की जितनी खबरें मीडिया में आती हैं, उससे हजारों गुना खबरें रिपोर्ट होने से रह जाती हैं। इसलिए बलात्कार की संख्या को स्त्री के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार का मापदंड नहीं बनाया जा सकता ।क्योंकि अनहुए बलात्कारों की संख्या वास्तविक  बलात्कारों से कई लाख गुना ज्यादा है। पुरुष की मर्दवादी रहन-सहन सहज  रूप से स्त्री के प्रति अवज्ञा से भरी हुई है। वह कदम कदम पर स्त्री का अनादर क रता चलता है ।ऐसे करोड़ों अनादरों की परिणति बलात्कार में होती है । यह अनादर  स्त्री के प्रति लोलुपता पैदा करता है ।यह लोलुपता  विकृति पैदा करती है। अभी हाल में एक स्कूल शिक्षिका ने इसलिए पढ़ना छोड़ दिया  कि जब वह क्लास रूम में पढ़ाने जाती थी तो दर्जा आठ में पढ़ने वाले लड़के कहते थे - 'आइटम आ गई'। यह जो लड़की को या स्त्री को आइटम समझने वाला भाव है ,वह भी मर्दानगी की ट्रेनिंग का ही नतीजा है।इसलिए स्त्री के प्रति होने वाले अपराध या हिंसा या अनादर को रोकने या खत्म करने के लिए पुरुष की   रहनि बदलनी होगी ।पुरुष की इस रहनि के मूल में उसकी मर्दवादी मानसिकता है ।यह मर्दवादी मानसिकता  बनाई जाती है। इस प्रक्रिया के दो आयाम हैं। इसके तहत स्त्री को औरत और पुरुष को मर्द बनाते हैं ।स्त्री को विनम्र होना चाहिए ,लज्जा शील होना चाहिए ,कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए, तपस्वी और मनस्वी होना चाहिए, लक्ष्मणरेखा के दायरे में रहना चाहिए आदि आदि।और इसके ठीक विपरीत मर्द को उद्दंड ,निर्लज्ज ,अकर्मण्य, लंपट आदि होना चाहिए। यानी मर्दानगी उद्दंडता और लंपटता में ही निहित है। सीमोन द बोउवार की यह बात  कि औरत पैदा नहीं होती उसे औरत बनाया जाता है जितनी सच है उतना  ही सच यह भी है की मर्द पैदा नहीं होता, उसे बनाया जाता है।
 हर बच्चा , लड़की हो या लड़का पैदा होते ही रोता है। जन्म के समय बच्चे का रोना बच्चे के स्वस्थ और सामान्य होने का लक्षण है । यह जरूरी है कि बच्चा जन्म के समय रोए। रोने से मस्तिष्क की कुछ धमनियां और शिराएं खुल जाती हैं और बच्चे का सम्यक विकास होता है। ऐसा भी  देखने में आया है कि जो बच्चे पैदा होने पर रोते नहीं हैं , उनके मस्तिष्क की कुछ धमनियां और शिराएं जबद जाती हैं, उनमें विकृति आ जाती है और वे मंदबुद्धि हो जाते हैं ।हमारे यहां रोने जैसी प्राकृतिक क्रिया को भी मर्द और औरत  के दायरे में देखा जाता है। बच्चा जैसे ही बड़ा होने लगता है तो टोका टाकी शुरू हो जाती है और कहा जाता है कि क्या औरतों की तरह रो रहे हो और एक दिन वह रोना छोड़ देता है ।या फिर चाह कर भी रो नहीं पाता।कभी-कभी लगता है कि अतिरिक्त  मर्दानगी से हमारे शरीर में रोने की क्रिया  वाला संकाय सूख गया है और हम एक खास तरह की मंदबुद्धिता के शिकार हो जाते हैं ,जिसे मर्दानगी का नाम देकर महिमामंडित किया जाता है ।यह मर्दानगी हमारे जीवन में है, हमारी भाषा में है ,हमारी समाज रचना और राजनीति में है ।जीवन के युद्ध में ,जय और पराजय दोनों ही स्थितियों में कहर स्त्रियों पर बरपा होता है। भाषा में मौजूद गालियों की छानबीन करें तो पाएंगे कि अधिकांश गालियां औरतों की ऐसी तैसी कर रही होती हैं। राजनीति भी प्रायः स्त्री और स्त्री को अपमानित करते हुए चमकायी जाती   है । राजनीति में चूड़ी के प्रयोग के   छोटे से उदाहरण से इस बात को समझ सकते हैं। हमारे यहां विरोधी नेताओं को चूड़ियां भेजने का चलन है । अगर कोई राजनेता असफल होता है या प्रभावी  कदम नहीं उठा पाता तो उसके  विरोधी चूड़ियां भेजते हैं ।चूड़ियां भेजकर  यह संदेश देना चाहते हैं कि तुम औरत हो और तुम कुछ नहीं कर सकते ।चूड़ी पहन कर घर बैठो।इसी मर्दवादी राजनीति का भोंसड़ा  रूप डींग हांकने ,अकड़ने और तरह तरह के अंग प्रदर्शन में दिखाई पड़ता है ।ऐसा करते समय हम यह भूल जाते हैं कि अतिरिक्त मर्दानगी से हमारी मनुष्यता छीजती  है ।स्त्री के प्रति होने वाली हर तरह की हिंसा का संबंध मनुष्यता के छीजते  चले जाने की कहानी है ।अपने पहले हिंदी उपन्यास सेवासदन में प्रेमचंद ने यह सवाल उठाया था कि ईश्वर वह दिन कब लावेगा कि हमारी जाति में स्त्रियों का आदर होगा। ध्यान से पढ़ें तो प्रेमचंद यहां जाति का अर्थ पुरुष जाति से है। अगर सचमुच हम स्त्री हिंसा से उबरना चाहते हैं ,इससे मुक्त समाज बनाना चाहते हैं तो हमें इस अतिरिक्त मर्दवादिता से ऊपर उठना होगा। कभी भक्तिकाल के कवियों ने एक रास्ता दिखाया था।वे  अपने आराध्य ईश्वर की उपासना परम प्रियतम  के रूप में करते थे और अपने को उनकी प्रिया के रूप में देखते थे। ऐसा करते हुए भक्तिकाल के कवियों ने अपने भीतर स्त्री तत्व को  पनपने दिया ।स्त्रीत्व का पनपना यानी मनुष्यता का विस्तार ।अगर हम सचमुच एक सभ्य समाज होना चाहते हैं और स्त्री मात्र के प्रति आदर- सम्मान और बराबरी का भाव रचना चाहते हैं तो हमें भक्तिकाल के कवियों से प्रेरणा लेकर इस अतिरिक्त मर्द वादियां से अपने से मुक्त करना   होगा । अपने भीतर की मनुष्यता का विकास करना होगा। केवल कानून बनाना और  कठोर सजा देना काफी नहीं होगा ।जरूरी है  कि मर्दवादी समाज का मानवीय समाज में रूपांतरण किया जाए ।आइए  इस रूपांतरण का वातावरण सृजित किया जाए।  दिसंबर ,2019 

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