बुधवार, 9 अप्रैल 2014

बनारस की तीसरी आँख/सदानंद शाही


कहते हैं, बाकी दुनिया शेषनाग के फन पर टिकी है पर  बनारस शिव के त्रिशूल पर टिका हुआ है । यानी    बनारस बाकी दुनिया से   निराला है। अपने होने के साथ ही बनारस बाबा भोलेनाथ की नगरी है।कभी कभी मुझे लगता है, शिव के व्यक्तित्व में दिखने वाली  अंतर्विरोधी धाराएँ बनारस में भी मौजूद हैं . चन्द्रमा की अमृत जैसी शीतलता और अमरत्व के साथ हलाहल विष का दाह लिए अपने में मगन रहता है बनारस .विरुद्धों को स्वीकारने और  धारण करने की क्षमता  ही बनारस को शिव की नगरी बनाती है . शिव की बूटी भांग की मस्ती यहाँ की हवा में है .जो इसे  छानते  हैं वे भी और जो नहीं छानते वे भी मस्ती के आलम में रहते हैं .मजे की बात यह है कि इस  आलम में भी चेतना का  तीसरा नेत्र हमेशा खुला रहता है . बिलकुल शिव की तरह .बनारस के महाश्मशान में निरंतर जलने वाली आग की रौशनी में हर तरह के छद्म को भेद कर जीवन सत्य को प्रकाशित करने की सामर्थ्य है .
 भारत की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता की ऐसी उपस्थिति शायद ही किसी दूसरे नगर में मिले। भगवान बुध्द अपना पहला उपदेश देने यहीं आये। बुध्द को पहले शिष्य भी यहीं  मिले ।जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरो में से चार यहीं हुए।  बुध्द की तरह महावीर  को भी पहले शिष्य यहीं मिले।  ।शैव और शाक्त साधनाओ का केन्द्र रहे इस शहर में वैष्णव भक्ति की धारा को विकसित होने का अवसर मिला।  कबीर और रैदास जैसे संतो की वाणी बनारस के कण कण में गूज रही है और मनुष्य  की मूलभूत एकता और श्रेष्ठता का संदेश दे रही  है। तुलसीदास   ने राम के मर्यादा पुरुषोत्तम रूप की लोक स्थापना यहीं रहते हुए  की .राम का जन्म भले ही अयोध्या में हुआ हो,  रामलीला बनारस से ही शुरू हुई और जन जन में व्याप गयी .अघोरपंथी कीनाराम यहीं  हुए  ।बनारस में  आस्तिक और नास्तिक ,निर्गुण और सगुण साथ साथ रहते हैं .
बनारस के  संगीत घराने दुनिया में प्रसिद्द हैं . उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई से उठती मधुर तान बनारस के मन्दिरो  में गूंजती रही है ।काशी विश्वनाथ के नौबतखाने से उठी शहनाई की तान पूरी दुनिया ने सुना .कभी बिस्मिल्लाह खान से अमेरिका चलने के लिए कहा गया .उन्होंने पूछा –वहां गंगा हैं ?नहीं हैं तो मैं वहां क्यों जाऊँ?सौन्दर्य और मंगल की  विधायक बनारसी साड़ियाँ जिस ताने और बाने से रची जाती हैं उसमें हिन्दू और मुसलमान एकरस होकर शामिल हैं । बनारसी पान का  रंग इसी ताने बाने से जमता है . ताना बाना बनारसी  जीवन का केंद्रीय शब्द है ।  यह  शब्द बुनकरों की दिनचर्या से निकल कर कबीर की कविता के रास्ते  बनारस के जीवन  में   उतर आया है।ताने और बाने की तरह यहाँ के रहवासी जुड़े हुए हैं .हिन्दू मुसलमान जनता की अनगिन साझी विरासतें बनारस के जर्रे जर्रे में समाई हुयी है .जिसे यहीं बगल के गाँव लमही से निहारते हुए हिंदी और उर्दू दोनों के कथा साहित्य को शिखर पर ले जाने वाले मुंशी प्रेमचंद अपनी घनी मूंछों के बिच मंद मंद मुस्कराते रहते हैं .  
देश के हर हिस्से से लोग बनारस आये और बनारस को अपना घर बनाया।बंगाली, मराठी, गुजराती ही नहीं तमिल,  कन्नड और मलयाली मुहल्ले बनारस में मौजूद हैं . बनारस विविध कला साहित्य संगीत के साथ परस्पर विरोधी विचारों और साधना पध्दतियों से जगमगाता रहता  है।शायद इसीलिए  बनारस को प्रकाश का शहर(काशी ) भी कहते हैं ।

गंगा के अर्ध चंद्राकार किनारे पर बसे इस नगर की  प्राकृतिक शोभा दुनिया को अपनी ओर आकृष्ट करती है .गंगा में पड़ती सुबह के सूरज की किरणें आज भी सुबहे बनारस का जादू रचती हैं .कहते हैं, बनारस के सौन्दर्य से अभिभूत होकर कोलकाता (तब कलकत्ता ) जाते समय  मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ महीनों रुक गए और  चिरागे दैर जैसी शानदार नज़्म बनारस  की शान में लिखी  .

विद्या के केंद्र के रूप में बनारस युगों युगों  से जाना जाता है . महान वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के  कुलगीत में बनारस को सर्व विद्या की राजधानी कहा  है . स्वाधीनता आन्दोलन की सभी धाराएँ बनारस में सक्रिय रही हैं .क्रांतिकारी , समाजवादी और गांधीवादी विचारों की प्रयोगभूमि रहा है बनारस . जिस समय महामना मदन मोहन मालवीय विद्या और ज्ञान के क्षेत्र में प्रतीची और प्राची के  सुन्दर मेल की प्रस्तावना कर रहे थे, लगभग उसी समय में यहाँ पर भारत माता मंदिर के रूप में राष्ट्र की अवधारणा  रची  जा रही थी .पुरातन और नवीन में चयन का विलक्षण विवेक बनारस को जड़ होने से बचाता है और जीवंत बनाता है .इसीलिए बनारस का इतिहास सदैव अग्रगामी रहा है .भारत विविध भाषाओं ,विविध संस्कृतिओं  ,विविध धर्म मतों और विविध भौगोलिक विशेषताओं का देश है .यह इस देश की सबसे बड़ी पूंजी है .बनारस  विविधता की इसी  पूंजी का प्रतिनिधित्व करता है .
बनारस का एक और पहलू है .हिंदी  के महान लेखक भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र  देखी  तुमरी कासी में बनारस को झूठे ,निकम्मे ,बेशर्म और डींग हांकने वाले लोगों की नगरी बताया है . तुलसीदास  भी इससे परिचित थे . . तुलसीदास ने कलियुग का जो चित्र खींचा है उसका आधार बनारस का यही रूप   है .यह दो प्रवृत्तियां हैं जो मिलकर बनारस को रचती हैं . बनारस इन दोनों प्रवृत्तियों की संघर्ष भूमि है .बनारस में पाखंड को रचने वाली बुद्धि है तो किसी भी तरह के पाखंड को भेद कर सत्य का मर्म जान लेने वाली मेधा भी है .
सोलहवीं लोक सभा का चुनाव बनारस की इस मेधा के लिए बहुत बड़ी चुनौती लेकर आया है . सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में बनारस संसदीय निर्वाचन क्षेत्र एक  प्रतीक बन गया है क्योंकि  भाजपा की ओर से प्रधान मंत्री पद के दावेदार यहाँ से चुनाव लड़ रहे हैं . मीडिया गुजरात के विकास को जुनून की तरह पेश कर रहा है . विकास के गुजरात मॉडल का गीत बज रहा है किन्तु गीत के बोल स्पष्ट नहीं हैं . बनारस ही नहीं देश भर में कुछ लोग मीडिया रचित  इस गीत पर पर झूम रहे हैं  . डीजे पर थिरक रहे है .बनारस विजय की घोषणाएँ हो रही हैं .

 बनारस के सामने अपने  ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को  बनाये रखने की चुनौती है . उस ताने और बाने को बचाए रखने की चुनौती है जो बनारस  ही नहीं पूरे देश की प्राणवायु है . ध्यान रहे कि बनारस में  जो गंगा बह रही  है उसमें  यमुना घुल मिल कर एकमेक हो गयी है . बनारस बनारस इसलिए है कि वह इसी गंगा के तट पर बसा है .बनारस के बसने में गंगा का रोल है तो उसमे घुल मिल गयी यमुना का भी उतना ही रोल है .बनारस के सामने एक चुनौती गंगा के इस प्रवाह को निरंतर बनाये रखने की भी है . एक बार फिर  देश और दुनिया की नजर बनारस पर टिकी है .क्या करेगा बनारस ? बुद्ध की जातक कथाओं के ज़माने से चले आ रहे अपने रस को बनाए रह पायेगा बनारस? और बनारस है कि इन तमाम प्रश्नों से बेपरवाह  अपने प्रिय कवि केदारनाथ सिंह के शब्दों में –गंगा के जल में /अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर /अपनी दूसरी टांग से बेखबर !



1 टिप्पणियाँ:

यहां 9 अप्रैल 2014 को 5:27 pm बजे, Blogger lokayat ने कहा…

बनारस के मौजूदा हालत से सम्बंधित विचार भेज सकते हैं

 

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