रैदास :श्रम की प्रतिष्ठा करने वाली कविताई / सदानंद शाही
कविता भाषा में संभव होती है. भाषा की उत्पति
सम्बन्धी एक सिद्धांत यह बताता है कि भाषा
की उत्पति के मूल में मानवीय श्रम है . कविता का श्रम से बहुत निकट का सम्बन्ध है.
जैसे जैसे हमारे समाज में श्रम की प्रतिष्ठा कम होती गयी कविता और श्रम में भेद
बढ़ता चला गया. रैदास की कविताई श्रम को प्रतिष्ठित करने वाली कविताई है.
रैदास
का व्यक्तित्व निर्मल भक्ति का प्रतीक है।
रैदास का जीवन और काव्य इस तरह घुला मिला है जैसे चन्दन और पानी मिल जाता है। वे
अपने प्रभु के साथ केवल चन्दन और पानी का ही नहीं बल्कि और भी कई रिश्ते बनाते हैं
. गिरिवर और मोर ,चंदा और चकोर ,दिया और बाती,तीर्थ और यात्री का रिश्ता. वे यहीं नहीं रुकते एवे कह उठाते हैं कि मेरे और
तुम्हारे बीच कोई अंतर ही नहीं है ण्कहने को तो यह बात बहुतों ने कही होगी लेकिन
इस कहनी पर रैदास को पूरा भरोसा था ण् इसीलिए उन्होंने भक्ति के साथ साथ कर्म
साधना जारी रखी और उसी के सहारे अपने
र्इश्वर को प्रत्यक्ष कियाण् इसीलिए प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी गाने वाले
इस संत कवि का व्यक्तित्व भले ही कबीर की
तुलना में विनम्र और साधु लगता हो. वैचारिक दृढ़ता में उनकी तुलना सिर्फ कबीर से हो सकती है .
रैदास अपनी कविता में मन के चंगा होने की बात करते हैं। यदि मन
पवित्र है तो सामने की कठवत का पानी ही गंगा की तरह पवित्र है। मन की शुद्धता,
वाणी की शुद्धता और कर्म की शुद्धता रैदास की वाणी का मर्म है।रैदास ने अपनी
मानसिक और वैचारिक दृढ़ता से श्रम को प्रतिष्ठा दी । उनके लिए कर्ममय जीवन ही पूजा
है. जहँ जहँ डोलउ सोर्इ परिक्ररमा जो
कुछ करौं सो पूजा। सहज जीवन क्रम में हम
जहाँ कहीं भी जाते हैं वही परिक्रमा है, जो कुछ करते हैं वह पूजा की तरह पवित्र
है।
जिस श्रम को समाज ने हेय बना रखा था रैदास ने
उसे गरिमा प्रदान कर श्रमशील जनता को गरिमा और प्रतिष्ठा दी. भारतीय समाज में श्रम
को अवमानित करने की अनेक विधियाँ विकसित की गयी, वर्ण श्रेष्ठता उनमे से एक है.
रैदास जिस समय और समाज में हुए थे उसमें मनुष्य के श्रम को अवमानित किया जाता
था।जो जितना ही उपयोगी श्रम करता है वह
सामजिक ढांचे में उतना ही हीन माना जाता
है . रैदास ने अपनी काव्य साधना से वर्ण श्रेष्ठता को चुनौती दी और मानवीय श्रम को
प्रतिष्ठित किया .
आम तौर पर हमारे समाज में अकर्मण्य साधुता का प्रचलन
रहा है .इसके बरक्स रैदास श्रमशील साधुता का आह्वान करते हैं और कहते हैं कि ईश्वर
किसी के बाप का नहीं है. वह हर उस उस व्यक्ति का है जो अपने कर्ममय जीवन के भीतर
उसे ;ईश्वर को मन प्राण से चाहता
है .उनका साहित्य वर्ण आधारित श्रेष्ठताक्रम
को चुनौती देता है . वर्ण व्यवस्था दर असल सामाजिक श्रम के अपहरण का ही एक रूप है,इसलिए
श्रम की सामाजिक प्रतिष्ठा का जो सन्देश
रैदास की कविता और जीवन से मिलता है वह
आज भी हमारे समाज की परम कामना है.
.रैदास ने बेगमपुर की कल्पना के रूप में एक ऐसे
समाज का प्रताव है जहाँ किसी तरह का भेदभाव ,भय ,शोषण उत्पीडन नहीं होगा ,जहाँ
मनुष्य हर तरह के बन्धनों से मुक्त
मनुष्यता के उच्चतम शिखर पर होता है.
बनारस
के आस पास के इस संत कवि का प्रभाव पंजाब और राजस्थान तक व्याप्त है।
रैदास की बानी गुरू ग्रंथ साहिब में
संकलित है। जनश्रुति बताती है कि रैदास मीराबाई के गुरू थे। पंजाब और राजस्थान से होते
हुए उनकी बानी का प्रभाव देश और अब विदेश
में दिखाई पड़ रहा है। बनारस का साहित्य
समाज इस प्रभाव से अपरिचित नहीं तो तटस्थ जरूर है। रैदास कबीर के समकालीन हैं । उनके हुए छः सौ से ज्यादा
वर्ष बीत चुके हैं। छः सौ वर्ष बाद भी इस संत कवि की बानी लाखों करोड़ों लोगों को
जीने का सम्बल प्रदान कर रही है। उनकी बानी में विनम्रता और दृढ़ता का दुर्लभ मेल है।
वे अपने कवित विवेक के बारे में कोई दावा नहीं करते। कवि होने का कोई दावा नहीं करते।
साधु होने का दावा भी नहीं है। उनके यहाँ यदि किसी बात का दावा दिखाई पड़ता है तो
अपने पेशे का और जाति का। रविदास चमड़े का काम करते थे और जूता सिलते थे। यह कवि
ओछी समझी जाने वाली जाति और पेशे का दावा डंके की चोट पर करता है और उसे गौरव से भर देता है।
रैदास के बारे में कई ऐसी किंवदन्तियाँ गढ़ी गई जिसमें कवि के अपने
दावे के उलट उसे उच्च वर्ण का साबित करने की कोशिश की गई। इसके पीछे तर्क यह था कि
प्रतिभा और महत्ता तो जाति और वर्ण विशेष में ही संभव है. इसलिए इस संत कवि का
संबंध उच्च वर्ण से होगा ही। भले ही यह संबंध पिछले जन्म में रहा हो। रैदास बार
बार अपनी जाति का गर्व के साथ उल्लेख करते
हैं,इसलिए कबीर की तरह विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से जन्म लेने और ब्राह्मण घोषित
करने की गुंजाइश नहीं थी। फिर भी उन्हें
पिछले जन्म का ब्राहमण घोषित करने की कोशिशें हुईं।
ऐसी कोशिशों के पीछे एक बात तो यह थी कि जाति,
वर्ण,चमत्कार आदि की चर्चा करके उनके सामाजिक पहलू को उपेक्षित कर दिया जाय। रैदास के महत्व का
स्वीकार उनके अनुयायियों के भीतर है। धर्म और सम्प्रदाय के दायरे से बाहर उनकी
बानी की चर्चा कम होती है। रैदास को संत
के रूप में याद करते हुए भी उनके सामाजिक सन्देश की चर्चा करने से लोग कतराते हैं।
कहीं यह कहा जाता है कि संतों की बानी के आध्यात्मिक अर्थ हैं, उन्हें सामाजिक
सन्देश के रूप में सीमित करने का प्रयत्न ठीक नहीं। इस तर्क से संत की महत्ता का
स्वीकार भी हो गया और सामाजिक सन्देश पर राख डालने की मन्शा भी पूरी हो गई । यही
वजह है कि संत रैदास की कविताई की चर्चा
नहीं के बराबर होती है। रैदास की कविताई
पर विचार करते हुए ध्यान रखना चाहिए कि अच्छी कविता और महान कविता के अपने.अपने
तर्क होते हैं। अपने काव्यात्मक गुणों के नाते कोई कविता अच्छी कविता हो सकती है
लेकिन महान कविता वह तभी होगी जब उसका सामाजिक परिप्रेक्ष्य भी बड़ा हो। भक्तिकाल
कविता का स्वर्ण युग इसलिए हो सका कि वहाँ एक वृहत्तर सामाजिक सन्दर्भ मौजूद है।
समाज की चालक.शक्ति धर्म था। इसलिए सारा अन्याय और शोषण धर्म के आवरण में हो रहा
था। स्वाभाविक रूप से अन्याय और शोषण का प्रतिकार भी धर्म के आवरण में हुआ। इसीलिए
भक्ति काल की कविता महज धार्मिक नहीं है ,वह अपने समय के सामाजिक संघर्ष की
सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है।
संत कवियों को पढ़ते हुए प्रायः हमारा यह विवेक
कुन्द हो जाता है और हम उन्हें आध्यात्मिक ऊँचाइयों, चमत्कार.कथाआं, करामातों आदि
के दायरे में ही पढ़ते गुनते हैं। जरूरी नहीं कि ऐसा करने वाले केवल सवर्ण समूहों
के लोग हों।जैसे कुछ दलित चिन्तक अम्बेडकर के वृहत्तर सामाजिक विमर्श को सिर्फ संविधान निर्माण तक ही
सीमित करते पाये जाते हैं,ठीक वैसे ही कुछ लोग रैदास के सामाजिक अभिप्रायों के
बजाय चमत्कार कथाओं में ही उलझ कर रह जाते हैं। जबकि रैदास बानी का मर्म उसके सामाजिक अभिप्रायों
के साथ समझने की जरूरत है।रैदास की कविता हमें यह बताती है कि श्रम को प्रतिष्ठित
किये बिना समता और सामाजिक न्याय को स्थापित नहीं किया जा सकता.

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