केदारनाथ सिंह की कविता ‘बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर' यानी इक हसरत-ए-तामीर: सदानंद शाही
केदारनाथ सिंह और
उनकी कविता खास विशेषता है
मद्धिम लय । यह मद्धिम लय कोई अचानक उपलब्ध जादू की छड़ी नहीं है बल्कि उनके
जीवन की स्वाभाविक लय है। इस लय में बुद्ध का मध्यमार्ग है ,सूरदास का सा आनंद
भाव है तो गालिब जैसी सन्नद्ध तटस्थता भी । इसलिए बहुत तेजी की तलाश में रहने वाले
लोगों को केदार की कविता के मर्म तक पहुँचने में कठिनाई होती है। इस मद्धिम लय के सहारे ही
केदार जी की छोटी और साधारण
दिखने वाली कविताओं में भी अर्थ की सघन अनुगूँज मौजूद होती है ।समय ,इतिहास ,परंपरा ,वर्तमान और
भविष्य सबसे एक साथ संवाद होता रहता है । इस संवाद में बड़बोलापन या कोई युगांतकारी दावा नहीं बल्कि सहज बतरस से
नि:सृत जीवन राग
होता है ।2005 में प्रकाशित केदारनाथ सिंह के कविता संग्रह ‘तालस्ताय और साइकिल’ में इन विशेषताओं के साथ एक खास
तरह की अंतर्राष्ट्रीयता दिखाई पड़ती है जिसे विजयमोहन सिंह ने केदारनाथ सिंह की
विदेश यात्राओं से जोड़कर देखने का प्रस्ताव किया है । इस संग्रह की ‘त्रिनिदाद,तू फू ली पै, बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर' जब मैं मिलारेपा को पढ़ रहा था ,तालस्ताय और साइकिल ऐसी
ही कवितायें हैं’ । यह सही है कि केदारनाथ सिंह
की विदेश यात्राओं ने उनके विषय वस्तु का
विस्तार किया है लेकिन विदेशी पृष्ठभूमि या विषय वस्तु को केदार नाथ सिंह अपनी उसी
चिर परिचित जनपदीय दृष्टि से देखते हैं। केदारनाथ सिंह की कविताओं को पढ़ते हुए
उनके तीसरे कविता संग्रह ‘यहाँ से देखो” की बरबस याद आ जाती है। यह संग्रह की कोई एक कविता नहीं है बल्कि पूरे
संग्रह का नाम है। मुझे ऐसा लगता है कि केदारनाथ सिंह की सभी कविताओं को मिलकर कोई एक संग्रह
तैयार हो तो उसका सबसे उपयुक्त नाम यहाँ से देखो ही होगा। अभिप्राय यह कि केदारनाथ सिंह
की कथित अंतरराष्ट्रीयता
भी जनपदीयता की आँखों से देखी गयी है। ‘बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर'कविता को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। अपने
इतिहास और वर्तमान से संवाद करती हुई इस कविता में केदारनाथ सिंह की सभी काव्यगत विशेषताओं तथा उनकी विश्वदृष्टि का पता मिल जाता है।
बात कविता के शीर्षक से
शुरू करते हैं। ‘बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर' । जाहिर है कवि को सिर्फ बर्लिन
की टूटी हुई दीवार का व्योरा नहीं देना है। यदि ऐसा होता
तो शीर्षक ‘बर्लिन की टूटी दीवार’ होता। शीर्षक बता रहा है कि कविता का
सरोकार ‘बर्लिन की टूटी दीवार’ से नहीं बल्कि उसे देखकर
उपजने वाली अनुभूति से है। बर्लिन की दीवार पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी को बांटने को बांटने के लिए 1961 में बनी थी। यह एक अस्वाभाविक बंटवारा था । जैसा
कि हम जानते हैं, द्वितीय विश्व युद्ध में
जर्मनी को सोवियत संघ , फ़्रांस ,अमेरिका और इंग्लैंड ने
जीत लिया और दोनों धड़ों ने उसे दो हिस्से में बाँट लिया था । दो हिस्से हो जाने के बाद भी लोगों का आना जाना बंद
नहीं हुआ। आना जाना रोकने के लिए
दीवार बना दी गयी । दूसरे विश्व युद्ध ने जर्मनी को ही
नहीं ;बल्कि पूरी दुनिया को
दो खेमों में बाँट दिया था । बर्लिन की दीवार इस
बँटवारे की ठोस प्रतीक थी। सोवियत संघ में ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका
के बाद शीत
युद्ध की वर्फ
पिघलनी शुरू हुई . । देखते-देखते सोवियत ब्लॉक के देशों में एक-एक कर क्रांतियाँ होती चली गईं । जब बदलाव की हवा पूर्वी जर्मनी में पहुंची तो
बँटवारे के इस प्रतीक को खत्म करने का वातावरण बनने लगा। 3 नवंबर 1989 को अचानक पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी की
जनता ने इसे तोड़
दिया। बर्लिन की दीवार विश्व इतिहास के सबसे
भयावह संदर्भों की उपज थी। द्वितीय विश्वयुद्ध
के बाद की दुनिया ईर्ष्या,द्वेष,वैमनस्य,शत्रुता और दुर्भाव से भरी हुई थी । बर्लिन की दीवार इस
दुर्भाव की प्रतीक चिन्ह बन गयी थी ।बर्लिन शहर के रहने वाले
लोगों ने यह दीवार नहीं बनायी थी।इसे उन लोगों ने बनाया था जिन्होंने जर्मनी या कि बर्लिन को जीत लिया था। पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी लोग एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहते
थे।जिन लोगों ने जर्मनी
को जीत लिया था, वे लोगों को अलग-अलग
रखना चाहते थे । जर्मनी के लोग चाहते
थे कि वे साथ - साथ रहें,मिलें,जुलें ,खेलें कूदें,प्रेम करें
और अपना जीवन जीये। । इन जनाकांक्षाओं को रौंदते हुए विजेताओं द्वारा बर्लिन की दीवार खड़ी की गई थी।
।कालान्तर में यह दीवार गिरा दी गई । बांटने वाली शक्तियों के द्वारा खडी की गई दीवार को
जनाकांक्षा और जनता की पहल पर गिरा दिया गया। बर्लिन की दीवार गिरने के बाद न
सिर्फ बर्लिन के लोगों का मिलना जुलना शुरू हुआ ;बल्कि पूरी दुनिया में शीत युद्ध के समाप्ति की शुरुआत हुई ।
बर्लिन की
दीवार टूटने के बाद नब्बे
के दशक के उत्तरार्ध में केदारनाथ सिंह कभी
बर्लिन गये रहे होंगे। तब तक बर्लिन की दीवार का नामोनिशान मिट गया था । वह सिर्फ स्मृति और संग्रहालयों में ही रह गई थी । लेकिन केदारनाथ सिंह का कवि उस टूटी हुई दीवार को देखता है ।टूटी दीवार
जो टूटने पहले वह थी। उस दीवार के होने का बोध कवि
के मन पर इतना गहरा है कि वह उसे टूटने के बाद भी देख लेता है। इस देखने में कवि द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका से लेकर भारत पाक विभाजन की
त्रासदी तक देख लेता है। इनसे से मनुष्यता को होने वाली क्षति
को देखता है और साथ ही दोनों देशों के सामान्य मनुष्य की मिल जुल कर प्रेम से रहने की आकांक्षा को भी
महसूस करता है। सत्ता विभेद और वैमनस्य पैदा करती है और विभाजन
की ओर ले जाती है। जबकि साहित्य
की संवेदना एकता , प्रेम और सहजीविता की ओर। विभाजन की
विभीषिका की एक स्मृति कवि के मन मेँ बहुत गहरे कहीं बनी हुई है। बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर विभाजन की वह स्मृति उभर आती है। पूरी कविता इसी स्मृति के आलोक मेँ लिखी गयी
है।
यह कविता कुल नौ बंदों
में है । पहले बंद में यह सूचना देते हुए कविता शुरू हो रही है कि कवि तीन दिन से बर्लिन में है और उसे
तीन दिनों में कौए नहीं दिखे। कवि खुद सवाल भी कर देता है कि भारतीय कवि को
बर्लिन के सुंदर और नीले आसमान में कौए क्यों चाहिए? आखिर कौए के बिना भी शहर सुंदर लग रहा
है और आसमान के नीलेपन में कोई कमी नहीं है। ऐसा लगता है मानो कविता का विषय बर्लिन की टूटी दीवार नहीं
बल्कि बर्लिन में कौए हो । बर्लिन के नीले आकाश में कौए की अनुपस्थिति कवि को
तुरंत उस आकाश में पहुंचा देती है जिसमें कौए होते हैं। वहाँ पहुँचते ही कवि,कवि नहीं रह जाता वह ‘भारतीय कवि’ हो जाता है। और इस भारतीय कवि का काम बिना कौए के आसमान से नहीं चल सकता
है। । यानी वृहत्तर
अर्थों में
मानवेतर जगत। जीवन की पूर्णता मानवेतर जगत के बीच ही अनुभव की जा सकती है। कौए की आवाज
को प्रिय के आगमन की पूर्व सूचना से जोड़कर देखा जाता रहा है। मानव जीवन मानवेतर जीवन से
मिलकर सम्पूर्ण होता है। केदारनाथ सिंह की
कवितायें बार बार इस सत्य को प्रकट करती हैं। इसके माध्यम से कवि पूरब और पश्चिम
की जीवन दृष्टि के भेद और मौलिकता की ओर इशारा कर देता है और यह भी कि जो दृश्य कवि देख रहा है उसके पीछे
भारतीय आँख है। इसे महसूस करने के लिए
हमें छोड़कर कवि आगे बढ़ जाता है।
अगले दो बंदों में कविता आगे बढ़ती है । हिन्द और पाक के लेखकों का
समूह बर्लिन के छोटे से
होटल में है।इस समूह में कवि भी मौजूद है। भले ही वे
हिन्द और पाक जैसे दो अलग-अलग और विरोधी देशों के लेखक हों, लेकिन यहाँ बैठे लेखकों
में वैसा फर्क नहीं है जैसा कि उनके पासपोर्ट बता रहे हैं।हिन्द
के लेखकों में कुछ ऐसा है, जो पाक जैसा है तो पाक के लेखकों में
भी ऐसा कुछ है जो हिन्द जैसा है। वे साथ - साथ खा रहे हैं,साथ-साथ पी रहे हैं,साथ-साथ हंस रहे हैं । यह
साथ- साथ होना जैसे हिन्द और
पाक के लोगों की सहज स्वाभाविक एकता को दिखा रहा है । साझी संस्कृति,साझी विरासत, साझे इतिहास का सहज उल्लास मूर्तिमान
हो उठा है-
और हमारे पासपोर्ट चाहे
जो कहते हों
यहाँ हममें से हरेक थोड़ा-थोड़ा हिन्द है थोड़ा- थोड़ा पाक
हम साथ –साथ खाते हैं
पीते हैं साथ-साथ
हँसते-हँसते
कभी कभी
हो जाते हैं उदास भी
इस उल्लास के बीच अचानक
उदासी आ पसरती है। विदेशी जमीन पर होने के नाते हिन्द और पाक की एशियाई पहचान उभरती है ,खान पान रहन सहन की साझेदारी की
अनुभूति सघन हो गयी है । आनंदोल्लास इसी अनुभूति के नाते है । लेकिन जैसे ही यह बात जेहन में आती है कि हिन्द और पाक के बीच का स्थायी भाव तो बैर है,वैसे ही यह अप्रिय
यथार्थ उदास कर देता है ,फिर भी साथ –साथ होने की आश्वस्ति है , बनी रहती है। यह एक दुर्लभ अनुभव है, जो विदेशी जमीन पर ही संभव है क्योंकि यहाँ हिन्द और पाक होने के कृत्रिम विभाजन को देखने
के लिए अपेक्षित वस्तुपरकता आ जाती है । कविता हमें मेल-जोल
के आनंद और विभाजन के सच से
पैदा उदासी की मिश्रित भावभूमि पर ले आती है। सतह पर खुशी और भीतर थोपे
गए विभाजन से उपजी गहरी उदासी
साथ-साथ मौजूद है।
चौथे बंद मेँ कविता एक
कदम और आगे बढ़ती है। खिड़की के बाहर दो वायुयान दिख रहे हैं विशाल नीले
आकाश मेँ दो वायुयान ऐसे लगते हैं जैसे दो कबूतर। कबूतर का उड़ना हमारी आदिम स्मृति
का हिस्सा है । वायुयान दूर आकाश मेँ कबूतरों जैसे लग रहे हैं। दोनों
युद्ध और प्रेम जैसे
भावों के प्रतिनिधि जान पड़ते हैं । कवि की इस कल्पना मेँ अतीत और वर्तमान
के धागे घुल मिल गए हैं। बाहर संभवत: किसी पार्क मेँ बैठे हुए बूढ़े जिनकी स्मृति मेँ दोनों विश्व
युद्धों की स्मृति है, जहां वायुयान का बमवर्षक और विनाशक रूप ठाँय-ठाँय की आवाज के साथ विद्यमान है । और इसके ठीक समानान्तर ‘एक ताजा चुंबन किन्हीं होठों से गिरकर /वहाँ घास पर पड़ा हुआ’ है। विश्व युद्धों की भयावहता को चीरकर
बाहर निकल आए प्रेम के संगीत मेँ डूबी
मानवता । बम गिरने के ध्वंस को ध्वस्त करती हुई चुंबन के गिरने की आवाज हमारे भीतर गूंज उठती है । युद्ध के
विनाश के भीतर से प्रेम का कोंपल फूटता है। भीतर कमरे में उल्लास और उदासी का
द्वैत है तो बाहर युद्ध कि स्मृति के बीच प्रेम।
पांचवें और छठें बंद मेँ
कविता अपने काव्य वस्तु के शिखर पर जा
पहुँचती है। खिड़की के बाहर केवल यह प्रेम का संगीत नहीं बल्कि
बर्लिन की टूटी दीवार भी
दिखाई दे रही है,कुछ इस तरह –
‘पर मेरी खिड़की से दिखती है
बर्लिन की टूटी दीवार भी
और देखता हूँ कि उसके चारो ओर
लगा रही है चक्कर एक
पागल स्त्री
न जाने कब से
कहीं कुछ है कील की तरह
उसकी आत्मा में ठुँका
हुआ
की रुकने ही नहीं देता उसे
और वह बार –बार
आ रही है
जा रही है
उधर से इधर
और उधर से इधर ...’
चूंकि बर्लिन की टूटी
दीवार वास्तव मेँ दिखाई नहीं दे सकती थी।
वह अतीत का हिस्सा थी जिसे
महसूसा तो जा सकता है पर देखा नहीं जा सकता। इसलिए कवि टूटी हुई दीवार का उल्लेख एक झटके के साथ कर के आगे बढ़ जाता है । यहाँ
कविता में एक पागल स्त्री प्रवेश करती है,जो बर्लिन की दीवार के चारो ओर
चक्कर लगाती दिखाई देती है । उसकी आत्मा मेँ कुछ है जो कील की तरह ठुँका हुआ है। वह बार-बार दीवार
के इस पार आ रही है और उस पर
जा रही है । पूरी बेचैनी
का समुद्र उस पागल स्त्री के भीतर हिलोरें ले रहा है। बर्लिन
की टूटी हुई दीवार हकीकत मेँ उतनी नहीं है जितनी उस पागल स्त्री
की स्मृति मेँ है। और उस स्मृति में दूसरे विश्वयुद्ध से मचने वाली तबाही का मंजर है ।
दीवार टूट गयी है, लेकिन उसके होने ने जो तबाही मचाई उसकी स्मृति पूरी तरह जिंदा है। कविता की पागल स्त्री को जैसे यकीन ही नहीं हो रहा है कि वह
दीवार टूट चुकी है। बार-बार इधर से उधर और उधर से इधर आ जा कर
जैसे वह अपने मन को आश्वस्त करना चाहती हो ! क्या दीवार सचमुच टूट गयी है? अगर सच में टूट
गयी है तो इसने जो हमारे जीवन मेँ तबाही मचाई है वह तबाही क्यों नहीं खत्म हुयी है। दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका जिसे पूरे विश्व ने झेला उसका दंश एक कील की तरह इस पागल स्त्री की आत्मा
मेँ धंसा हुआ है। पागल स्त्री की आत्मा मेँ धँसी यह कील गुएर्निका[1] की
याद दिला देती है । पहले विश्व युद्ध की विभीषिका गुएर्निका मेँ रंगों के माध्यम से बिंबित हुई है, वैसे ही यह कील विशेष रूप से दूसरे
विश्व युद्ध और सामान्यत: युद्ध और विभाजन की विभीषिका को मूर्त कर देती
है। युद्ध और विभाजन की भयावहता सबसे ज्यादा स्त्री और स्त्री देह पर
तारी होती है।[2] स्त्री देह के घाव भर भी जाएँ
तो आत्मा पर लगी खँरोच दर खँरोच का वह क्या करे? वह तो आत्मा मेँ कील की तरह धँसी ही रहती है।
इस तरह उस पागल स्त्री की उपस्थिति बर्लिन की
दीवार को ही नहीं बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध की समूची विभीषिका को मूर्त करती है। यह पागल स्त्री कविता के छठें बंद मेँ भी
हमसे मुखातिब होती है। यहाँ भी प्रेम और युद्ध का द्वंद्व मौजूद है । होटल के भीतर अहमद फराज़[3] कोई ताजा ग़ज़ल सुना रहे हैं । जिसके रस में सब झूम रहे हैं। ध्यान रहे की गजल एक ऐसा काव्य रूप है जिसका बुनियादी सरोकार प्रेम से है । गजल का
अर्थ ही है ,प्रिय से गुफ्तगू । इस गुफ्तगू में कवि भी झूम रहा है
लेकिन उसकी नज़र खिड़की से बाहर बर्लिन की टूटी दीवार पर बदस्तूर टिकी हुई है। वहाँ
पागल स्त्री अब भी मौजूद और गजल को चीरती हुई बर्लिन की टूटी दीवार का चक्कर लगा
रही है। शायद उसे ग़ज़ल(मानवीय प्रेम ) के भविष्य पर भरोसा नहीं है । एक
अदृश्य सा डर है कि कब युद्ध या विभाजन जैसी प्रवृत्ति इस प्रेमालाप को बीच में खत्म कर दे,कब एक दीवार इसके
बीच खड़ी हो जाये
।
सातवें बंद मेँ बिजली की कौंध की तरह एक स्मृति कवि को झकझोर जाती है । उसे लगता है जैसे यह पागल स्त्री मेरे भीतर भी
मौजूद है। और जाने कब से मेरे खुद के उप महाद्वीप
मेँ चक्कर लगा रही है , दरवाजे पीट रही है, दीवारों को खुरच रही है। यह पागल स्त्री किस विभीषिका की मारी हुई है।
क्या वह हिन्द और पाक के विभाजन की मारी हुई है ?
बर्लिन की टूटी दीवार
को भारत विभाजन की पीड़ा की जमीन से देखा जा रहा है। यहाँ तो बस एक बर्लिन की दीवार थी जो ढहा दी गयी
है। पर हमारे उपमहाद्वीप मेँ अनेक दीवारें हैं, अनेक दरवाजे हैं, जो दिलों के बीच ,लोगों के बीच और देशों के बीच अभिशाप की तरह जमे हुए हैं । बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर वह पागल
औरत परेशान है कि अगर यह टूट सकती है तो हिन्द और
पाक के बीच की दीवार क्यों नहीं टूट सकती । कवि के शब्द हैं-
“.....मेरे भीतर की वह पागल स्त्री
अब एक और दीवार के आगे
खड़ी है
और चीख रही है-‘यह दीवार
आखिर यह
दीवार
कब टूटेगी
?’
यह दीवार
यानी भारत पाक
के बीच की दीवार कब टूटेगी?
ग़ज़ल को चीरने वाली आशंका
आठवें बंद मेँ घटित होती है। गजल सुनाते सुनाते अहमद फराज एक मिसरा भूल जाते हैं ,एक सन्नाटा उपस्थित हो जाता है। कवि के भीतर । कवि के बाहर। अब वह पागल स्त्री उस दीवार के पास पहुँच जाती है जो हिन्द और पाक के बीच खड़ी
है । वह पागल स्त्री कहती है कि आखिर यह दीवार क्यों नहीं टूट रही है।
हिन्द और पाक के बीच की यह दीवार बीसवीं शताब्दी मेँ घटित सबसे बड़ी त्रासदियों मेँ से एक
भारत-पाक विभाजन की
देन है । इस दीवार ने कितनी
ही विभीषिकाओं को घटित किया है,कितने
घर, कितने लोग, कितने हृदय तबाह हुए हैं, और हो रहे हैं। इसे तोड़ दिया जाना चाहिए। यह कब टूटेगी ? हिन्द और पाक के बीच यह दीवार इस तरह खड़ी है कि ग़ज़ल का एक मिसरा ही भूल गया
है । यह महाद्वीप मेँ गज़लों से भरा हुआ है, प्रेम से भरा हुआ है लेकिन एक यह अदृश्य दीवार है जो ग़ज़ल के छंद को भंग कर देती है। कविता इस उम्मीद मेँ खत्म
होती है कि जैसे बर्लिन की दीवार टूटी वैसे ही यह दीवार भी टूट जाएगी और ग़ज़ल का वह भूला हुआ
मिसरा, प्रेम और मुहब्बत के
सिलसिले फिर से शुरू हो जाएंगे-
इतने बरस हुए
गज़लों से
भरे इस उपमहाद्वीप में
मुझे एक भूले हुए मिसरे का अब भी इंतज़ार है
कविता के अंत से जब हम पूरी कविता पर नजर डालते हैं ,तब हमें समझ में आता है कि बर्लिन की दीवार तो
एक बहाना है,वास्तव
में यह कविता भारत विभाजन पर लिखी गयी है। द्वितीय विश्व युद्ध से शुरू हुई
कहानी भारत विभाजन तक पहुचती है और भविष्य के लिए एक संकेत देते हुए विराम लेती
है। कविता में आनेवाली पागल स्त्री बर्लिन की नहीं है वह कवि के हृदय में जाने कब
से कील की तरह धँसी हुई है ।यह कील है विभाजन की त्रासदी । मेरा खयाल है की इस कील
को समझने के लिए इस कविता को केदार जी की एक और कविता ‘सन 47 को याद करते हुए’[4] के साथ रख कर पढ़ना चाहिए। इन दोनों कविताओं को साथ रख पढ़ने
से हिन्द और पाक के विभाजन की गहरी पीड़ा और दोनों के एक हो जाने का कसक भरा
प्रस्ताव समझ में आता है ।और इस कील तथा पागल औरत की सही शिनाख्त हो पाती है-
क्या तुम
बता सकते हो
हर साल
कितने पत्ते गिरते हैं
पाकिस्तान में
तुम चुप क्यों हो
केदारनाथ सिंह
क्या तुम्हारा गणित
कमजोर है ?
(‘सन 47 को याद करते हुए’)
यह कविता बताती है कि
यह पागल औरत कवि के भीतर जाने कब से नहीं बल्कि ,दो सन 47
से मौजूद है । इतिहास की दो विभीषिकाएँ ,दो काल खंड ,दो भूगोल मिल जाते हैं। पागल औरत इन
दोनों भयावह स्मृतियों को खुरच कर मिटा देना चाहती है। भारत और पाकिस्तान अलग अलग
लहूलुहान हैं उसकी एकता में ही गजल संभव है ,प्रेम पूर्ण संवाद संभव है । ‘बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर’ कविता में बार बार
अहमद फराज आते हैं । कविता के विवरण से पता चलता
है कि वहाँ हिन्द और
पाक के बहुतेरे लेखक मौजूद हैं लेकिन कवि
बार बार बार अहमद फराज का नाम लेता है ।शायद इसलिए कि अहमद फ़राज भारत और पाक के अस्वाभाविक
विभाजन का मरसिया पहले ही अपनी नज्म में लिख चुके थे[5]।
गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं
उदास तुम भी हो यारो उदास हम भी हैं
फ़क़त तुम्हीं को नहीं रंज-ए-चाक-दामानी
कि सच कहें तो दरीदा-लिबास हम भी हैं ।
यह कविता पढ़कर यह अंदाज लगा पाना बहुत मुश्किल है कि वहाँ दोनों
देशों के लेखकों ने हिन्द और पाक के बीच की दीवार हटाने का या कि वहाँ हिन्द और पाक के बीच एकता
का विधिवत कोई प्रस्ताव पास
किया गया था या
नहीं । लेकिन दोनों का मिल बैठना ही इस मुद्दे पर दोनों देशों की जनता का राजनीति से भिन्न जैसे जनमत संग्रह हो। अहमद फ़राज और केदारनाथ सिंह दोनों को इस बात का इल्म तो होगा
ही कि एकता और
साझेदारी के इस प्रस्ताव की कीमत राजनीति की नजर में क्या होगी,फिर भी दोनों देशों की कविता बीच की दीवार को खारिज करती है और
हिन्द और पाक के एकीकरण का काव्यात्मक प्रस्ताव करती है। गालिब याद आ जाते हैं -
‘घर में था क्या कि तिरा ग़म उसे ग़ारत करता
वो जो रखते थे हम इक हसरत-ए-तामीर सो है
आखिर कोई कविता
या कलाकृति क्या करती है ?वह प्रेम और मनुष्यता की राह मेँ खड़ी दीवारों को ध्वस्त करने का प्रस्ताव ही
तो करती हैऔर अपने ढंग से ‘बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए’के जतन में लगी रहती है[6]
।
[5] गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं /उदास तुम भी हो यारो उदास हम भी हैं /फ़क़त तुम्हीं को नहीं रंज-ए-चाक-दामानी /कि सच कहें तो दरीदा-लिबास हम भी हैं /तुम्हारे बाम की शमएँ भी ताबनाक नहीं /मिरे फ़लक के सितारे भी ज़र्द ज़र्द से हैं /तुम्हारे आइना-ख़ाने भी ज़ंग आलूदा /मिरे सुराही ओ साग़र भी गर्द गर्द से हैं /न तुम को अपने ख़द-ओ-ख़ाल ही नज़र आएँ /न मैं ये देख सकूँ जाम में भरा क्या है /बसारतों पे वो जाले पड़े कि दोनों को /समझ में कुछ नहीं आता कि माजरा क्या है /न सर्व में वो ग़ुरूर-ए-कशीदा-क़ामती है /न क़ुमरियों की उदासी में कुछ कमी आई /न खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाब /न शाख़-ए-अम्न लिए फ़ाख़्ता कोई आई /तुम्हें भी ज़िद है कि मश्क़-ए-सितम रहे जारी /हमें भी नाज़ कि जौर-ओ-जफ़ा के आदी हैं /तुम्हें भी ज़ोम महा-भारता लड़ी तुम ने /हमें भी फ़ख़्र कि हम कर्बला के आदी हैं/सितम तो ये है कि दोनों के मर्ग़-ज़ारों से /हवा-ए-फ़ित्ना ओ बू-ए-फ़साद आती है /अलम तो ये है कि दोनों को वहम है कि बहार /अदू के ख़ूँ में नहाने के बा'दआती है /तो अब ये हाल हुआ इस दरिंदगी के सबब /तुम्हारे पाँव सलामत रहे न हाथ मिरे /न जीत जीत तुम्हारी न हार हार मिरी
न कोई साथ तुम्हारे न कोई साथ मिरे /हमारे शहरों की मजबूर ओ बे-नवा मख़्लूक़ /दबी हुई है दुखों के हज़ार ढेरों में /अब उन की तीरा-नसीबी चराग़ चाहती है /जो लोग निस्फ़ सदी तक रहे अँधेरों में /चराग़ जिन से मोहब्बत की रौशनी फैले /चराग़ जिन से दिलों के दयार रौशन हों /चराग़ जिन से ज़िया अम्न-ओ-आश्ती की मिले /चराग़ जिन से दिए बे-शुमार रौशन हूँ /तुम्हारे देस में आया हूँ दोस्तो अब के /न साज़-ओ-नग़्मा की महफ़िल न शाइ'री के लिए /अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर /चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए ।

1 टिप्पणियाँ:
आदरणीय सर, आपके द्वारा हम सब के लिए किया गया यह प्रयास अत्यंत श्रेष्ठ व लाभकारी हैं, आपने कविता की व्याख्या जिस संदर्भ से किया हैं वह अत्यंत सारगर्भित व विवेकपूर्ण हैं।।
एक टिप्पणी भेजें
सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें [Atom]
<< मुख्यपृष्ठ