सोमवार, 20 अप्रैल 2020

गोरखपुर में नामवर सिंह / सदानन्द शाही



नामवर सिंह पूर्वाञ्चल की धरती से उठकर हिन्दी साहित्य समाज में चक्रवर्तित्व हासिल करने वाले इकलौते और अनूठे व्यक्तित्व रहे हैं । जिस आयु में लोग या तो पढ़ाई पूरी करने में लगे होते हैं या फिर यहाँ वहाँ नौकरी के लिए आवेदन करते रहते हैं उसी आयु में नामवर सिंह ने प्रथम श्रेणी के लेखकों विचारकों में अपनी जगह बना ली थी ।  सारी प्रतिभा और वैदुष्य के बावजूद नामवर सिंह के जीवन का पूर्वार्ध लगभग बेरोजगारी और संघर्ष में बीता। इसे शिक्षा जगत की विडम्बना ही कहेंगे कि जिस व्यक्ति का एम ए में लिखा प्रबंध (संदर्भ -हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग ,यद्यपि  मूल लघु प्रबंध में बाद में काफी कुछ जोड़ा घटाया गया है ,फिर भी मूल ढांचा एम ए के दौरान ही तैयार हुआ था।) पिछले पचास साथ वर्षों से विभिन्न विश्वविद्यालयों के एम ए पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा है ,उसे शिक्षा जगत में इतनी देर से जगह हासिल हुई । फिर भी अपने अध्ययन ,अध्यापन ,ज्ञान, असाधारण वक्तृता और स्वाभिमान के बल पर उन्होंने यह चक्रवर्तित्व हासिल किया था ।नामवर सिंह न कभी कुलपति रहे,न किसी अकादमी के अध्यक्ष और न ही   राज्य सभा के मेम्बर हुए । वे कभी किसी सत्ता केंद्र के औपचारिक मुखिया नहीं  रहे । जब वीर बहादुर सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री हुए तो उन्होंने नामवर जी को लखनऊ विश्वविद्यालय का कुलपति बनाना चाहा था ,लेकिन नामवर जी ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था।     बिना किसी औपचारिक पद  के नामवर सिंह ने खास तरह की सत्ता अर्जित की थी । यह अनौपचारिक सत्ता बहुतों के लिए ईर्ष्या  का बायस थी तो कुछ के लिए स्पृहा का । इस संदर्भ में एक वाकया याद  आता है।   मेरे एक  पुराने छात्र हैं डॉ अंजनी कुमार  श्रीवास्तव।   अंडमान में हिन्दी पढ़ाते हैं और एक संगठन से गहरे जुड़े हैं । एक बार उन्होंने मुझ से कहा था - सर मैं चाहता हूँ कि मेरे संगठन में भी कोई नामवर जी जैसा पॉवर फुल आदमी हो। मैंने उनसे कहा कि हैं तो अमुक जी ,उनके पास जितनी सत्ता है उतनी नामवर सिंह के पास कभी नहीं रही।इस पर अंजनी ने कहा कि सर मैं राजनीतिक सत्ता की बात नहीं कर रहा हूँ,मैं उस सांस्कृतिक सत्ता की बात कर रहा हूँ जो हिन्दी में सिर्फ नामवर सिंह के पास है । मैं इस बात के मर्म को महसूस करता रहा। नामवर सिंह की इस अघोषित सत्ता को हासिल करने कि कोशिश में उनके बहुतेरे समकालीनों को हास्यास्पद होते हुए देखा गया है। लेकिन यारों को मीर का इकबाल नसीब न हुआ। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि  नामवर ने अपने और अपने अपने साहित्य के लोकवृत्त का बेपनाह विस्तार किया था । यों तो नामवर का यह लोकवृत्त अखिल भारतीय था लेकिन पोरवी उत्तर प्रदेश में इस लोकवृत्त में एक खास तरह के अपनापे का रसायन घुलमिल गया था ।  इसीलिए  उनको लेकर विशेष पूर्वाञ्चल की धरती खास तरह के  गौरव का अनुभव करती थी।
नामवर सिंह ने भी जीवन भर इस गौरव बोध का मान रखा और गोरखपुर से बनारस तक के आमंत्रण को घर के आमंत्रण कि तरह बरतते रहे।   गोरखपुर से नामवर सिंह का गहरा और बहुस्तरीय रिश्ता था । रिश्ते की अनेक वजहें थीं । एक तो उनकी सहपाठी रही प्रो शांता सिंह पहले महाराणा प्रताप कालेज में और फिर गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष रहीं । नामवर जी के अत्यंत प्रिय और छात्र जीवन के साथी कवि केदारनाथ सिंह लंबे समय तक गोरखपुर अंचल में रहे । यह संबंध आगे चलकर रिश्तेदारी में बदला और नामवर जी के इकलौते बेटे विजय प्रकाश की शादी केदार जी की बेटी निर्मला से हुई तो बारात पडरौना ही गयी थी । यह शादी जिस सादगी और आत्मीयता से हुई और मैत्री को रिश्तेदारी में बदला गया ,वह नामवर जी की विशाल हृदयता की एक अलग ही कहानी है जिसे केदारजी आजीवन महसूस करते रहे ।उस दौर में बेटे के विवाह के समय मैत्री को याद रखना मामूली बात नहीं थी । आगे चल कर नामवर जी को आलोचक परमानंद श्रीवास्तव के रूप में एक ऐसा सहयोगी मिला जिससे उनका गोरखपुर से नाता बना रहा ।  इस तरह नामवर जी के गोरखपुर आने के  बहाने निकलते रहे और वे बार-बार गोरखपुर आते रहे ,गोरखपुर के छात्रों ,अध्यापकों और साहित्य प्रेमियों को शिक्षित –प्रशिक्षित और निर्मित करते रहे । एक बार गोरखपुर में ही एक समारोह में नामवरजी ने बताया कि एक अवसर ऐसा उपस्थित हुआ था कि वे गोरखपुर में स्थायी तौर पर रह सकते थे । बी एच यू से निकाले जाने के बाद वे आजीविका के लिए भटक रहे थे । अपने योग्य शिष्य नामवर का इस तरह   भटकना  गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी को साल रहा था । उन्होंने  ही किसी से बात चलायी होगी और नामवर जी को महाराणा प्रताप कालेज में हिन्दी प्राध्यापक का प्रस्ताव मिला । बहुत सोच विचार के बाद नामवर सिंह ने वह प्रस्ताव ससम्मान अस्वीकार कर दिया । उस दुर्दिन में ऐसा प्रस्ताव अस्वीकार करने की खास वजह थी। नामवर सिंह को यह न्योता जाति विशेष का होने के नाते मिला था । उन्हें लगा यह न्योता योग्यता के लिए नहीं जाति के लिए है। यह नामवर सिंह के आत्म  सम्मान के खिलाफ था ।  हालांकि दुर्दिन में मिले उस न्योते ने उन्हें संबल प्रदान किया था जिसे लेकर एक कृतज्ञता बोध उनके मन था । नामवर जी ने आगे कभी निजी बातचीत में कहा था कि गोरखपुर के बौद्धिक समाज में जाति इस कदर हावी रही है कि उसने बहुत बड़ी प्रतिभाओं को नष्ट कर दिया ,खास तौर से विश्व विद्यालय में।उन्होंने अपने कुछ बेहद संभावनाशील साथियों के नाम भी लिए जो गोरखपुर की जातिवादी राजनीति का हिस्सा बन कर रह गए ।  नामवर सिंह की उपस्थिति ने गोरखपुर के परिवेश में व्याप्त इस जातीय संकीर्णता को तोड़ने की दिशा में बौद्धिक खुराक का काम किया ।
नामवर सिंह के गोरखपुर से सम्बन्धों का एक सिरा पं विद्यानिवास मिश्र के साथ  उनके निजी  सम्बन्धों से जुड़ा था । कम लोग जानते हैं कि इसी सिरे से जुड़कर नामवर सिंह के बेटे कुछ दिन गोरखपुर विश्वविद्यालय में पढ़ने आए थे और विद्यानिवास जी के भाई प्रो महेश्वर मिश्र ने इसके लिए जरूरी व्यवस्थाये की थीं ।
गोरखपुर में जब हम लोग प्रेमचंद साहित्य संस्थान बना रहे थे ,नामवर सिंह ने उसमें गहरी दिलचस्पी ली और हमें लगातार प्रोत्साहित किया । उस समय प्रेमचंद साहित्य संस्थान मेरे जैसे कुछ अर्ध बेरोजगार छात्रों का उद्यम था जिसे बहुत से साहित्यिक मठाधीश तवज्जो ही नहीं देते थे । लेकिन नामवर सिंह ऐसी साधन हीन संस्था के निमंत्रण पर कम से कम दस बार गोरखपुर आए और प्रेमचंद पर अपने महत्वपूर्ण व्याख्यान दिये।मुझे याद है उन दिनों कारें इतनी नहीं थीं ,और जो थीं वे हमारी पंहुच से बाहर थीं । नामवर जी को गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर रिटायरिंग रूम में रुकवाया गया था। उन्हें शाम को शांता जी के यहाँ भोजन के लिए आना था । शांताजी ने मुझ से कहा कि जाओ नामवर जी को ले आओ । मैंने कहा -कैसे ? बोलीं रिक्शे से। मुझे संकोच हो रहा था लेकिन और कोई उपाय नहीं था । मैं गया और नामवर जी को रिक्शे से ले आया । शांता जी के हगार  नामवर जी ने कहा कि उनकी सुर्ती खत्म हो गयी है,जाओ गेट के बाहर एक दूकान है वहाँ से लेते आओ। मैं झटपट ले आया । वह सुर्ती नामवर जी को इतनी पसंद आई की उसी दुकान से कई बार सुर्ती मंगवाते रहे । सुर्ती के प्रसंग में एक बात और याद आ गयी । हमारे एक अध्यापक दिल्ली से लौटे थे । वे भी सुर्ती खाते थे। कभी नामवर जी को सुर्ती  खिलाई होगी । नामवर जी ने उनकी चुनौटी की तारीफ कर दी । उन्होंने वह चुनौटी नामवर जी को दे दी थी । उन्हों ने हमसे कहा कि नामवर जी को मेरी चुनौटी इतनी पसंद आई कि उन्हों ने मेरी चुनौटी ले ली । वे इस बात से काफी गौरवान्वित हो रहे थे। मैंने कभी नामवर जी कि चुनौटी देख कर पूछ लिया कि क्या यह वही चुनौटी है जिसे अमुक जी ने दिया था । नामवरजी बोले –हाँ वही है,मुझे मालूम था कि वे इस बात को गाएँगे,खैर अब वे चुनौटी ही दे सकते थे ,सो दी ,चुनौती नहीं। ऐसी और भी बाते हैं पर उनका जिक्र कभी बाद में । मेरे निमंत्रण पर नामवर जी की आखिरी गोरखपुर     यात्रा का जिक्र करना मुनासिब होगा । बात फरवरी 2005 की है । देश भर में प्रेमचंद की एक सौ पचीसवीं जयंती मनाई जा रही थी । हमने सोचा कि प्रेमचंद की कर्मभूमि रहे गोरखपुर में  भी प्रेमचंद की 125वीं जयंती पर आयोजन किया जाय । नामवर जी से अनुरोध किया गया  । वे प्रेमचंद पुन: पुन: विषय पर व्याख्यान देने को तैयार हो गए । प्रभाष जोशी के नेतृत्व में देश भर में नामवर के निमित्त आयोजन हो रहे थे । हमने सोचा कि इस अवसर पर गोरखपुर में भी नामवर सिंह का सम्मान किया जाय । हमारे गुरु प्रो रामचंद्र तिवारी (अब स्वर्गीय)ने इस आयोजन का नाम दिया शिखर का सम्मान। मैं बनारस से गोरखपुर गया हुआ था । कार्यक्रम की सारी तैयारी पूरी करने के बाद मैं अपनी गुरु प्रो शांता सिंह के निवास पर सोया हुआ था । कि तभी मेरे मित्र अनिल कुमार राय (हिन्दी-विभाग ,गोरखपुर विश्वविद्यालय के वर्तमान अध्यक्ष ) का फोन आया । एक सड़क दुर्घटना में पंडित विद्यानिवास मिश्र की मृत्यु हो गयी थी । अकल्पनीय और हृदयविदारक ।  हम सब अवाक । हतप्रभ । किंकर्तव्यविमूढ़ । आनन फानन में हम लोगों ने अगले दिन के कार्यक्रम को विद्यानिवास मिश्र की शोक सभा में बदल  दिया । विद्यानिवास मिश्र वय में नामवर सिंह से सिर्फ छ महीने बड़े थे,लेकिन  साहित्य में नामवर सिंह और विद्यानिवास मिश्रा लगभग दो विरोधी ध्रुवों के नेतृत्व कर्ता माने जाते थे। लेकिन पंडित जी की स्मृति में नामवर जी ने जो व्याख्यान  दिया वह आँखें खोलने वाला था।  गोरखपुर जर्नेलिस्ट असोशिएशन के सभागार में आयोजित इस शोक सभा में शामिल हुए लोगों की स्मृति में नामवर सिंह का वह व्याख्यान अब भी होगा । पंडित जी ज्ञान ,पांडित्य ,रचनात्मकता की जैसी चर्चा नामवर जी ने की ,वैसी चर्चा मैंने कभी पंडित जी की पूजा करने वालों के मुंह से भी नहीं सुनी है। पूजा प्राय: लाभ –लोभ के वशीभूत होकर की जाती है । इसीलिए पूजकों को प्राय: महत्व का बोध नहीं होता। नामवर जी के उस व्याख्यान से यह बोध हुआ कि विद्यानिवास जी की पूजा चाहे जितनी हुई हो ,उनके साहित्यिक महत्व का वास्तविक आकलन अभी बाकी है। पंडित जी के निजी गुणों कि चर्चा करते हुए  नामवर सिंह का गला ही नहीं रुधा बल्कि देखते देखते भरे सभागार में रो पड़े । नामवर सिंह रो सकते हैं यह हमने पहली बार जाना । हमने यह भी जाना कि विरोधी विचारों वाले व्यक्ति के वास्तविक मानवीय गुणों का किस तरह से आदर किया जाना चाहिए। जाना तो यह भी कि सारे विरोध के बावजूद मानवीय स्तर पर एक परस्परता निभाई जा सकती है और निभाई जानी चाहिए।
इस यात्रा कि एक और बात याद आ रही है। अगले दिन नामवर सिंह का सम्मान हुआ । रामचंद्र तिवारी अध्यक्षता कर रहे थे। मंच पर शांता सिंह मौजूद थीं ।  हमलोगों के मित्र और प्रखर चिंतक पी एन सिंह बोलने के लिए उठे । उन्होंने अपने व्याख्यान कि भूमिका रचते हुए एक गड़बड़ बात कह दी । उन्होंने कहा कि नामवर जी कि उपस्थिति में बोलने खड़े हो तो ऐसा लगता है कि वे आधा बल हर ले रहे हैं । यह कहते ही उन्हें ध्यान आया कि वे तो नामवर जी को बालि जैसा बता रहे हैं । बात जुबान से निकल चुकी थी और बिगड़ गयी थी । पी एन सिंह ने सभालने कि कोशिश की और फिर लगभग यू टर्न लेते हुए उन्हें राम बना दिया । बात बनी नहीं । पी एन सिंह को गड़बड़ाते हुए हम पहली बार देख सुन रहे थे। अब नामवर जी कहाँ चूकने वाले थे । जब बोलने खड़े हुए तो पहले उन्होंने पी एन सिंह पर इस बात के लिए तंज़ किया कि राम के व्यक्तित्व से मेरी तुलना उचित नहीं है ,फिर राम के जीवन की त्रासदी को बड़े ही मार्मिक शब्दों में उकेर कर मूर्त कर दिया। इसी यात्रा में हमने नामवर जी से प्रेमचंद पार्क में मौलश्री का पौधा लगवाया । वह पौधा आज वृक्ष बन गया है । अनेक अवसरों पर मैंने उसके नीचे खड़े होकर नामवर जी को फोन किया है । मेरे कहने पर कि मौलश्री का पेड़ आपको याद कर रहा है और पूछ रहा है कब आएंगे?वे कहते – जरूर। लेकिन यह संयोग कभी बना नहीं । मैं स्वयं गोरखपुर से बाहर हो गया और अब नामवर जी नहीं हैं । लेकिन इस बात का सुकून है   कि उनका लगाया मौलश्री है जो अभी भी गोरखपुर को आक्सीजन और हरीतिमा दे रहा है,देता रहेगा।
गोरखपुर से जुड़े  नामवर जी के अनेक ऐसे प्रसंग अनेक लोगों की स्मृति में होंगे । लेकिन इनसे भी महत्वपूर्ण एक पहलू है जिसकी चर्चा बेहद जरूरी है ।  नामवर जी जिस दूसरी परंपरा के वास्तुकार ,अन्वेषक और व्याख्याता के रूप में जाने जाते हैं उसके शीर्ष स्तम्भ –बुद्ध ,गोरख ,कबीर और प्रेमचंद की भूमि होने का गौरव गोरखपुर को हासिल है। जिस आमी नदी के जल के लिए हुए संघर्ष के बाद बुद्ध का वैराग्य जगा उसका एक सिरा गोरखपुर को छूता है । गोरखनाथ के बिना गोरखपुर शहर की कल्पना ही नहीं की जा  सकती है,काशी कठिनई से निजात पाने के लिए कबीर इसी भूमि पर आए। गोरखपुर प्रेमचंद की ऐसी कर्मभूमि है जिसने प्रेमचंद जीवन अनेक अध्याय लिखे साथ ही प्रेमचंद ने भी गोरखपुर के सांस्कृतिक भूगोल में काफी कुछ जोड़ा । गोरखपुर ,कुशीनगर ,बस्ती ,आजमगढ़ ,मऊ जैसी जगहों की निरंतर यात्राएं दरअसल दूसरी परंपरा की अनवरत तलाश ही हैं । नामवर जी की ये यात्राएं कबीर आदि संतों की यात्राओं  की याद दिलाती हैं। वे संतों की तरह जीवन भर हाँका लगाते रहे और साहित्य के लोकवृत्त का विस्तार कराते रहे। उन्होंने साहित्य में  विवेक और तर्क के सौन्दर्य को प्रतिस्थापित किया और सच्चे बुद्धिधर्मी की तरह हमारी चेतना को उन्नत करते रहे ।




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