शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

अवधू बेगम देस हमारा : कबीर की कविता में घर और देस /सदानन्द शाही




कबीर की कविता में घर एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में हमारे सामने आता है। आम तौर पर कबीर के जिस घर से हमारा परिचय है वह है जिसे   वे जला देना चाहते हैं। याकि जला देते हैं। वे  अपना घर तो जलाते ही  हैं,  उसका घर भी जला देना चाहते हैं, जो उनके साथ चलना चाहता है। घर को जला देना कबीर के साथ चलने की पूर्व शर्त है। यदि आप कबीर के साथ चलना चाहते हैं तो पहले अपना घर जला दें। कबीर के साथ चलने का न्योता सिर्फ उसे ही मिलेगा, जिसने अपना घर जला दिया है।
कबिरा खड़ा बाजार में लिए मुराठा हाथ।
जो घर जारे आपना चले हमारे साथ।।
इसे सिर्फ न्यौता ही न समझा जाय। यह इजाजत और अनुज्ञा का भी मामला है। कुछ लोग बिना न्यौते के भी चले आते हैं। माया और राम दोनों को एक साथ साध लेना चाहते हैं। अपना घर भी जोड़ लें  और कबीर के साथ कुछ दूर चल कर देख भी लें कि वहाँ क्या मिल रहा है? कबीर ऐसे लोगों को न्योता भी देते हैं और चेताते भी हैं-
हम घर जारा आपना, लिया मुराड़ा हाथ।
अब घर जारौं तासु का, जो चलै हमारे साथ।।
कबीर के घर की यह आम छवि है। वे अपना घर जलाकर आ गये हैं। वे हर उस व्यक्ति का घर जला देने के लिए तत्पर हैं, जो उनके साथ चलने वाला है या चलना चाहता है। मजे की बात यह कि वे अकेले जाना भी नहीं चाहते। वे अपने साथ सबको ले जाना चाहते हैं। चेताते चलते  हैं कि अगर घर नहीं जला पा रहे हो, तो कोई बात नहीं। देख लो ! मेरे हाथ में लुआठा है। मेरे साथ चलोगे तो पहले तुम्हारा घर जलायेंगे, फिर आगे बढ़ेंगे। अपना घर जलाओ और मेरे साथ चलो। हम इसी कबीर को जानते हैं।
   
अब जो घर जोड़ने की माया में जुटे हैं, वे भला क्यों कबीर के पास आने लगे। घर कितनी मुश्किल से बनता है। उसे जलाना कहाँ की समझदारी है। इसीलिए जिनके पास घर है, वे प्रायः कबीर से परहेज करते हैं। कबीर की कविता से परहेज करते हैं। रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं-उनका (कबीर का) कोई साहित्यिक लक्ष्य नहीं था, वे पढ़े लिखे लोगों से दूर ही दूर अपना उपदेश सुनाया करते थे।
कबीर के समय में पढ़े लिखे लोग कौन थे ? या कि जिन्हें पढ़ने लिखने की इजाजत थी वे कौन लोग थे ?  प्रायः वही लोग थे जो घर जोड़ने की माया में जुटे हुए थे। वे भला कबीर की सुनते ही क्यों ? और कबीर उन्हें सुनाने भी क्यों जाते ? घर जोड़ने की माया से बँधे हुए पढ़े लिखे लोगों के पास झख मारने कबीर क्यों जाते ? और इसका उलटा भी उतना ही सच है -ऐसे लोग घर जलाने की बात करने वाले कबीर के पास क्यों जाते?
लेकिन कबीर के साथ चलने के लिए बहुत से लोग तैयार रहते हैं। अपना घर जलाने और कबीर के साथ चल पड़ने वाले लोगों की कमी नहीं हैं। प्रेमचन्द के घीसू और माधव को हम जानते है। माया जब मुहँ बिराती है, वे कबीर के पास जाते हैं। घीसू माधव का पता  प्रेमचन्द देते हैं। ऐसे लाखों लोग हैं जो कबीर के साथ चलते हैं,जिनका पता हम्मे से बहुतों को न हो . अमरीका के एक कवि है राबर्ट ब्लाई। उनकी कबीर से भेट रवीन्द्र नाथ टैगोर के अनुवाद के माध्यम से हुई। उन्हें टैगोर का विक्टोरियन अंग्रेजी में किया अनुवाद पुराना लगा। राबर्ट ब्लाई ने स्वयं कबीर के पचास पदों का अनुवाद किया। अब वे अपनी कविताएँ नहीं सुनाते। जहाँ जाना होता है वे कबीर की कविताएँ ही सुनाते हैं। इस तरह देखें तो घीसू माधव से लेकर राबर्ट ब्लाई तक कबीर के साथ चलने को तैयार लोगों का रेंज बहुत व्यापक है। ऐसे लोगों को कबीर कहाँ ले जाना चाहते हैं, कहाँ ले जाते है? इसी के साथ सवाल यह भी है कि कबीर के साथ जाने के लिए लोग क्यों तैयार हैं। आखिर कबीर कहाँ ले जा रहे हैं? वह कौन सी जगह है, जहाँ जाने के लिए लोग अपना  घर-बार  जलाने पर आमादा हैं। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे।
कबीर के यहाँ घर के और भी रूप हैं। थोड़ा उसे भी देख लें। एक तरफ तो घर में झगरा भारीहै। वे इस झगरे को सुलझाते हैं। इस भारी झगरे से मुक्ति दिलाने की बात करते हैं। मैं कहता आँखिन की देखी तू कहता कागज भी लेखी। मैं कहता सुरझावन हारी तू राखे अरुझाई रे।
घर से आदमी का बड़ा पुराना नाता है। घर के बिना आदमी का काम नहीं चलने वाला। घर जलाने वाले के रूप में मशहूर कबीर का भी। वे केवल घर जलाते नहीं है, घर बनाते भी हैं। अवधू गगन मंडल घर कीजै, अमृत झरै सदा सुख उपजै, बंकनालि रस पीजै।’  इत्यादि-इत्यादि।यानी घर से अमृत बरसे और सुख मिलता रहे तो कबीर को घर करने में एतराज नहीं है। घर की प्रकृति भिन्न है। घर का स्वरूप  भिन्न है। अमृत बरसता हो, निरन्तर सुख उपजता हो तो कबीर घर की रखवाली के लिए भी प्रस्तुत हैं। वे केवल घर जलाने के लिए हाका नहीं लगाते वे घर की रक्षा के लिए भी आवाज लगाते हैं-
   
मन रे जागत रहिए भाई।
   
गाफिल होई वस्तु मति खोवै, चोर मुसै घर जाई।।
घर जलाने के लिए प्रसिद्ध कबीर इसके लिए सचेत कर रहे हैं कि कहीं घर में चोर न घुस जाये, इसलिए जागत रहिए भाई।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता है-
मैंने जब-जब सिर उठाया अपने ही चैकठ से टकराया
सिर झुका आओ बोली भीतर की दीवारे
सिर झुका आओ बोला बाहर का आसमान
दोनों ने मुझे छोटा करना चाहा।
बुरा किया मैंने जो ये घर बनाया।
घर का एक रूप जो आदमी को छोटा करना चाहता है। आदमी को छोटा कर देता है। कबीर दास उसे  जलाने की बात करते हैं। वह इसी तरह का घर है। जो आदमी को छोटा कर दे, ऐसा घर कबीर को कुबूल नहीं है।
घर जलाकर और जलवाकर कबीर हमें कहाँ ले जाना चाहते हैं? इस घर जलाने वाले संत के प्रति सैकड़ों वर्षों से लोगों के मन में इतना आकर्षण क्यों हैं? वह कौन सी जगह है, जहाँ जाने के लोभ में लोग घर जलाने को तैयार हो जाते हैं?
इसका उत्तर मुझे रैदास को पढ़ते हुए मिला। रैदास का प्रसिद्ध पद हैसबने पढ़ा होगा। बेगमपुरा शहर को नाऊँ।  इस पद में रैदास कहतेहैं -हमें खूब अच्छा वतन/घर मिल गया है। अब हम खूब वतन घर पाया। वे आगे कहते हैं-मेरे शहर का नाम बेगमपुर है। जहाँ दुःख और अन्देशे के लिए कोई जगह नहीं है। वहाँ न तो माल है न लगान देने की चिन्ता। किसी तरह का खौफ नहीं है, भूल या गलती नहीं है, पतन का डर नहीं है। मेरे भाई, मैंने ऐसा खूबसूरत वतन पा लिया है जहाँ सदैव खैरियत ही रहती है। वहाँ की बादशाहत/शासन व्यवस्था दृढ़ और स्थायी है। वहाँ दूसरा या तीसरा कोई नहीं है। यह शहर दाना-पानी, रोजी रोजगार के लिए मशहूर है। धनी मानी और सज्जन लोगों से यह शहर भरा है। जिसको जहाँ भावे वहाँ आ जा सकता है। कहीं कोई रोक टोक नहीं करता। हर तरह के बंधनों से मुक्त रैदास चमार कहते हैं-जो मेरे इस शहर में रहने वाला है, वही मेरा मित्र है। यह अद्भुत शहर कहाँ है?
कबीर और रैदास दोनों बनारस के हैं। दोनों समकालीन हैं। दोनों मिलकर एक नया शहर बसा रहे हैं। रैदास के भक्तों की संख्या पंजाब में बहुत है। पंजाब से बनारस आने वाली एक ट्रेन का नाम है-बेगमपुरा एक्सप्रेस। एक बार मुझ से किसी ने पूछा था-बेगमपुर कहाँ है ? सहसा तो मुझे पूछने वाले पर हँसी आयी। लेकिन भोलेपन से पूछा गया वह प्रश्न मन में कहीं अटक गया। मुझे लगा कि इस बेगमपुर का पता लगाना चाहिए। यह बेगमपुर और कहीं नहीं कबीर और रैदास की कविता में है। यह कबीर और रैदास की कल्पना का शहर है। 
कबीर कहते हैं-अवधू बेगम देस हमारा।’  कबीर राजा रंक फकीर बादशाह सबसे पुकार-पुकार कर कहते हैं कि अगर तुम्हें परम पद चाहिए तो हमारे इस देश में बसो। इस देश में सत्त धर्म की महता हैं। केवल संत धर्म है।
यही बेगम देश है, जिसे कबीर अमरपुर भी कहते हैं। वे सजना से अमरपुर ले चलने के लिए कहते हैं। अमरपुर में बाजार लगी हुई है। वहाँ सौदा करना है। उसी अमरपुर में संत रहते हैं। संत समाज सभा जहॅ बैठी वहीं पुरुष है अपना।
कबीर क्या कह रहे हैं। इसे ध्यान पूर्वक कर सुनने की जरूरत हैं। संत समाज सभा जहॅ बैठी वहीं पुरुष है अपना। यह संतों का समाज संतों की सभा अमरपुर में है। यानी संतों की सभा जहाँ है-वहीं अमरपुरी है। वही बेगमपुर है। इसी के साथ कबीर दास का एक और पद पढ़ लीजिए-
चलन चलन सब कोई कहत है, ना जानौं बैकुण्ठ कहाँ है। जोजन एक प्रमिति नहीं जाने/बातन ही बैकुण्ठ बखाने। एक जोजन आगे का हाल जिन्हें नहीं मालूम वे बैकुण्ठ का बखान करते रहते हैं। जब तक आप स्वयं वहाँ नहीं जाते/स्वयं नहीं देख पाते-तब तक बैकुण्ठ पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अन्त में कबीर कहते हैं कि और कुछ नहीं साधु की संगति ही बैकुण्ठ है।
यह साधु कौन है ? जो अमरपुर में रहता है वही साधु है, वही संत है। वही बेगमपुरा का नागरिक है। इस बेगमपुर की नागरिकता की क्या शर्तें हैं? यह किस भूगोल में पाया जाता है। इसकी क्या विशेषता है? कबीर इसकी विशेषताएँ बताते हैं-
जहवां से आयो अमर वह देसवा।
पानी न पौन न धरती अकसवा, चाँद सूर न रैन दिवसवा।
ब्राह्मन, छत्री न सूद्र वैसवा, मुगलि पठान न सैयद सेखवा।
आदि जोति नहिं गौर गनेसवा, ब्रह्मा विस्नु महेस न सेसवा।
जोगी न जंगम मुनि दरवेसवा, आदि न अंत न काल कलेसवा।
दास कबीर ले आये संदेसवा, सार सब्द गहि चलै वहि देसवा।
रैदास के पद के साथ एक बार इस पद को साथ-साथ पढ़ कर देखें। नागरिकता की शर्त एक ही है। भेद बुद्धि का अभाव। किसी तरह की कोई भेदबुद्धि नहीं है। ऊँचनीच की भावना नहीं है।
यह बेगमपुर ऐसा वतन घर है जहाँ मनुष्य को छोटा करने वाली हर तरह की भेद बुद्धि का अभाव है। हर वो चीज जो मनुष्य को मनुष्य से बाँटती है, भिन्न होने का, ‘द अदरहोने का भाव पैदा करती है-अमरपुर में उसकी समायी नहीं है। भेद बुद्धि रखने वाले को बेगमपुर का वीजा पासपोर्ट  नहीं मिलेगा। कबीर का एक और प्रसिद्ध दोहा याद आ रहा है-
कबीरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुँई धरे तब पइसे घर माँहि।।
अहंकार का, भेद बुद्धि का सिर उतारकर बाहर रख देना है, तब प्रेम के घर में प्रवेश हो पायेगा। प्रेम का घर ऐसा है जिसमें अपना सब कुछ देकर सबकुछ को दाँव पर लगाकर ही प्रवेश हो सकता है। कुछ भी पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। फिर प्रेम तो सर्वोत्तम है। सर्वोत्तम पाने के लिए सर्वोत्तम देना होगा।  सबसे कठिन है सर्वोत्तम को देना। हमारी मुश्किल है कि हम पाना तो चाहते हैं सब कुछ लेकिन उसके लिए कुछ भी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इसी पर तंज कसते हुए कबीर कहते हैं-
जन  कबीर का सिषर घर, बाट सिलैली गैल।
पाँव ने टिकै पिपीलिका, लोगन लादै बैल।।
कबीर हमें प्रेम के घर में लाना चाहते है। यह प्रेम का घर ही रैदास का बेगमपुर है। बेगम देस का नागरिक बनने के लिए हमें बहुत कुछ छोड़ कर आना होगा। इसीलिए कभी-कभी मुझे लगता है कि कबीर की कविता हमें बहुत कुछ छोड़ने के लिए कहती है, बहुत कुछ अनसीखा करने के लिए कहती है। बहुतेरे अवरोध हैं, जिन्हें दूर करने के लिए कहती है।
बेगमदेस पर विचार करते हुए हमारा ध्यान तुलसीदास के राम राज्य की ओर चला जाता है। बेगमदेस और रामराज्य में बड़ी समानताएँ हैं। तुलसी के रामराज्य  की कल्पना की हिन्दी में बहुत सराहना हुई है। रामराज्य की यूटोपिया के नाते तुलसीदास हिन्दी के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। लेकिन बेगमपुर और अमरपुर की यूटोपिया रचने वाले रैदास और कबीर को सिर्फ खण्डन मण्डन करने वाला मान कर अवमानित किया जाता रहा है। बहस होती है कि वे कवि हैं भी या नहीं।
कबीर और रैदास दोनों ही तुलसी से कम से कम सौ वर्ष पहले हुए हैं। उनका बेगमपुर या बेगम देस तुलसी के रामराज्य की कल्पना से कम से कम सौ वर्ष पहले की कल्पना है। तुलसीदास ने थोड़े हेर फेर के साथ बेगमपुर की कल्पना को रामराज्य के रूप में प्रस्तुत कर दिया है। तुलसी के रामराज्य और बेगम देस को आमने-सामने रख कर देखिए। दोनों में ज्यादा भेद नहीं है। रामराज्य की कल्पना में तुलसीदास ने वर्णाश्रम धर्म को एडजस्टकर दिया है। सत्त धर्मकी जगह तुलसीदास ने निज-निज धरम’ की भेद बुद्धि के लिए जगह बना दी है। रामचन्द्र शुक्ल तुलसीदास की जिस प्रतिभा के सबसे बड़े कायल हैं, वह यही है। शुक्ल जी लिखते हैं- सगुण धारा के भारतीय पद्धति के भक्तों में कबीर, दादू आदि के लोकधर्म विरोधी स्वरूप को यदि किसी ने पहचाना तो तुलसीदास ने।शुक्ल जी कह चुके हैं कि कबीर, रैदास, दादू आदि का प्रवेश पढ़े लिखे लोगों में नहीं, बल्कि बे-पढ़ी लिखी जनता में था। विडंबना देखिए कि जिनका प्रवेश बे पढ़े लिखे लोगों में था वे ही कवि लोक धर्म विरोधी हो गये। अस्ल में वर्ण व्यवस्था और आश्रम पद्धति ही रामचन्द्र शुक्ल के लोकधर्म की बुनियाद  है। इसीलिए वर्ण व्यवस्था और आश्रम धर्म का विरोध करने के वाले कबीर आदि संत लोकधर्म विरोधी हो जाते हैं। वर्णाश्रम धर्म को फिर से स्थापित करने के कारण  तुलसी दास लोकवादी हो जाते हैं, हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि हो जाते हैं. और वर्णाश्रम रहित लोकधर्म के प्रवर्तक कबीर और रैदास कवि भी हैं या नहीं इस पर बहस हो रही है। यह भी हिन्दी साहित्य की अनेक उलटवासियों में से एक है। बहरहाल यह एक दूसरा पहलू है.जिसकी चर्चा फिर कभी .
अभी तो मुझे इतना ही कहना है कि यह बेगम देस एक यूटोपिया है .उलटवांसियों से भरे जटिल संसार के बरक्स एक प्रति संसार .एक मानवीय और समुन्नत संसार –जिसमे सत्त की संगति है ,साधु समाज है ,उन्नत मनुष्य हैं .प्रेम ही जिसका नियम है .रविन्द्रनाथ ने जिस मानव धर्म की कल्पना की है वह इसी बेगान देस से निकलता है .उसके प[रवार्तक और प्रतिष्ठाता कबीर हैं रैदास हैं . ऐसी उदात्त यूटोपिया की रचना करने वाले कबीर को विश्वकवि रवीन्द्रनाथ कवि मानते हैं और ‘‘Hundred poems of Kabir’नाम से कबीर की सौ कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद करके दुनिया के सामने प्रस्तुत करते हैं। और इधर हिन्दी के विद्वान आचार्य और आलोचक बहस कर रहे हैं कि कबीर कवि हैं या नहीं। शायद ऐसी ही बहसों के लिए कबीर ने कहा था- बोलना का कहिए रे भाई, बोलत-बोलत तत्त नसाई।

(
महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, के कोलकाता केन्द्र के निदेशक श्री कृपाशंकर चौबे ने  तथा केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद के हिन्दी विभाग के प्रोफ़ेसर आलोक पाण्डेय अपने अपने  केंद्र पर यह व्याख्यान आयोजित किया था . दोनों के प्रति आभार )


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