मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

ताल्स्ताय और साइकिल (साइकिल, जो यास्नाया पोल्याना से चकिया तक चलती रही ) सदानंद शाही



केदारनाथ सिंह के सातवें कविता संग्रह ताल्स्ताय और साइकिल (2005 में प्रकाशित ) का शीर्षक इसी कविता से दिया गया है।  ताल्स्ताय और साइकिल शीर्षक में उत्सुक बनाता है।  हमारा पाठक मन ताल्स्ताय के  जीवन की किसी घटना या किसी कथा प्रसंग की प्रत्याशा या कि खोज में निकल पड़ता है।  किंतु कवि या कविता से ऐसा कोई समाधान या उत्तर नहीं मिलता । दोनों हमें कुंवर नारायण के शब्दों में कहें तो एक रहस्य लोक में ले जाकर छोड़ देते हैं।  बकौल कुंवर नारायण यह रहस्य में चौंकाता है और आकृष्ट भी करता है । ताल्स्ताय और साइकिल ऐसी ही कविता है । कविता के इस रहस्यलोक  में प्रवेश करने का रास्ता आसानी से नहीं मिलता । इसलिए कवि के सुझाए रास्ते पर ही चलते हैं । किसी कविता का शीर्षक प्राय: कविता में प्रवेश करने का कवि  द्वारा सुझाया गया रास्ता ही होता है ।
कविता के  शीर्षक ताल्स्ताय और साइकिल में द्वंद समास है।  यानी यहां ताल्स्ताय और साइकिल दोनों एक से महत्वपूर्ण हैं।  दोनों पद प्रधान हैं। केदार जी अपनी कविताओं में प्राय: अति साधारण और अतिपरिचित चीजों अद्भुत  संयोजन से चौंकाते हैं और इसी तरह काव्यार्थ की ओर उन्मुख कराते हैं।  ताल्स्ताय यानी एक व्यक्ति, एक महान लेखक और साइकिल एक यंत्र । केदारनाथ सिंह का पाठक दोनों से भली भांति परिचित है।  एक चेतन और एक जड़। लेकिन कविता में दोनों ही प्रधान हैं। कवि ने दोनों को  एक सा महत्व दिया है।यह केदारनाथ सिंह के संयोजन का ही कमाल है कि हमारा अति परिचय किसी काम नहीं आता है। ताल्स्ताय और साइकिल की व्याख्या करते हुए कुंवर नारायण ने एक सूत्र दिया है- एक त्रिकोण बनता है मनुष्य- (ताल्स्ताय) साइकिल (यांत्रिकता ,प्रगति) और इतिहास (या ऐतिहासिकता) के बिंदुओं को ढीले तौर पर जोड़ता हुआ इस सूत्र के बाद कुँवर नारायण एक और बात करते हैं –व्याख्या बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि पाठक की सोच का दबाव किस बिंदु पर अधिक पड़ता है यह संकेत देने के बाद भी कुँवर नारायण कोई व्याख्या नहीं करते । वे  खुद किसी कोण पर दबाव नहीं देते । यानी कुल मिलाकर कुंवर नारायण भी हमें वही खड़ा छोड़ देते हैं, जहां कवि ने हमें चकित करके छोड़ दिया है।
पाठक की  मुश्किल यह है कि वह कुँवर नारायण के इंगित त्रिकोण के सहारे कविता में प्रवेश करे या फिर कवि के सुझाए रास्ते । कवि का सुझाव माने तो किसी एक कोण पर है अधिक दबाव दे ही नहीं सकते । जैसा कि पहले ही कह चुके हैं ताल्स्ताय और साइकिल  दोनों का समान महत्व है,और इनमें से किसी एक पर ज्यादा ज़ोर नहीं दे सकते।  दोनों एक खास इतिहास में, एक खास समय में आमने-सामने हैं, इसलिए उस खास समय को भी हम गौण करार नहीं दे सकते । कविता की व्याख्या में तीनों कोण  प्रधान हैं।
बहरहाल  शीर्षक से आगे बढ़ें । कविता का पहला ही बंद।  कविता कुछ विश्व प्रसिद्ध की चर्चा से शुरू होती है-
'आपने कभी सोचा है
महान ताज में क्यों नहीं रही
वह पहली सी चमक?
और वह पहली सी गूंज रोम के घंटे में
वह आश्चर्य पहला-सा दीवार में
चीन की ?
पर क्यों-क्यों
आपकी गली से गुजरती हुई
एक जर्जर साइकिल की छोटी-सी घंटी में वही जादू है
जो उस दिन था जब ताल्स्ताय ने पहले-पहल
देखी थी साइकिल'
कवि को साइकिल की छोटी से घंटी के जादू की बात करनी है।  लेकिन वह  सबसे पहले संसार के कुछ आश्चर्यों  का जिक्र करता है और इस हमारा ध्यान इस ओर आकृष्ट करता है कि ताज में पहले जैसी चमक नहीं रही। वह  ताज की महानता पर  कोई सवाल नहीं उठाता।  सिर्फ उसमें पहले जैसी चमक नहीं महसूस होती ,बस इतना ही कहता है।  लगे हाथ यह भी बता देता है कि रोम के घंटे में पहले जैसी गूंज नहीं है और न ही चीन की दीवार में वह पहले वाला आश्चर्य । इतिहास प्रसिद्ध आश्चयों  में वह चमक,वह आश्चर्य नहीं रहा लेकिन हर गली मोहल्ले में मौजूद अत्यंत साधारण सी साइकिल की छोटी सी घंटी का जादू बदस्तूर कायम है। कहां ताजमहल, रोम  का घंटा और चीन की दीवार और कहाँ जर्जर साइकिल की घंटी। लेकिन कवि इस अत्यंत साधारण में भी  ऐसी साधारणता  देखता है कि उसके सामने संसार का अचरज मानी जाने वाली चीजें भी फीकी जान पड़ती हैं।  कुछ-कुछ वैसे ही जैसे ईदगाह कहानी में प्रेमचंद मामूली से चिमटे के आगे सुंदर से सुंदर खिलौनों की चमक फीकी कर देते हैं।  अपनी बात को बल देने के लिए या कि पाठक के अचरज  को और बढ़ा देने के लिए सौ वर्ष  से ज्यादा की कालावधि और ताल्स्ताय को साइकिल के पक्ष में ला खड़ा करता है।
अब प्रश्न यह है कि ताल्स्ताय ही क्यों? और भी बहुत से ऐसे महापुरुषों का नाम लिया जा सकता था जो कि साइकिल की घंटी के जादू की गवाही दे सकते थे  या उसके पक्ष में बोल सकते थे।  ऐसा लगता है जैसे कवि का यह मकसद सिर्फ ताल्स्ताय ही पूरा कर सकते थे । क्योंकि ताल्स्ताय ही साधारण के भीतर के   असाधारण  को वहाँ से देख सकते थे और उस साधारणता को प्रतिष्ठित कर सकते थे, जहां से केदारनाथ सिंह खुद देख रहे थे।  वह है साइकिल की घंटी का जादू । आखिर साइकिल और उसकी घंटी में जादू है कौन सा,जिसके लिए कवि धरती आसमान एक किए हुए है।  साइकिल का कमातो यह है कि वह पैरों को आजादी देती है,उसकी क्षमता का विस्तार करती है। और उसकी घंटी? साइकिल की घंटी के टिन टिन  में संवाद की लय  है।  यह दूसरे को अपनी ओर आकृष्ट करती है और सचेत  करती है।  साइकिल और साइकिल की घंटी का जादू उसमें अंतर्निहित आजादी और संवाद धर्मिता में है । यह आकर्षण इतना दुर्निवार है कि ताल्स्ताय भी साइकिल को उतने ही आश्चर्य से देखते हैं।
 कविता का दूसरा बंद पूरी तरह से ताल्स्ताय को समर्पित है-
'और ताल्स्ताय चूँकि ताल्स्ताय थे
इसलिएवे एक उदास घोड़े से
कर सकते थे बातें
कर सकती थे  कोशिश एक रंगीन चित्र को
कागज से उठाकर
जेब में रखने की
दे सकते थे आदेश समुद्र की लहरों को
एक अभय मुद्रा में हाथ उठाकर'
'और ताल्स्ताय चूँकि ताल्स्ताय थे'  इस कथन पर गौर करें।  ताल्स्ताय की विशेषता बताने के लिए, उनकी तुलना के लिए कोई और उपमान नहीं है, अपनी उपमा स्वयं  ताल्स्ताय हैं।  इसे समझने के लिए ताल्स्ताय के बारे में बाद की पीढ़ी के विश्वविख्यात रूसी कथाकार मैक्सिम  गोर्की के एक कथन को ध्यान में रखना होगा। गोर्की आखिरी दिनों में ताल्स्ताय से मिलते रहते थे। गोर्की ने लिखा है कि मैं भगवान में विश्वास नहीं करता, लेकिन मुझे लगता है कि अगर भगवान होता तो बिल्कुल ताल्स्ताय जैसा होता । इसी के साथ एक और रूसी  पत्रकार बात जोड़ दें । उसने लिखा कि रूस के दो राजा हैं । पहला जार और दूसरे ताल्स्ताय, जो राजा से बड़े हैं। एक लेखक जो राजा से बड़ा है  और भगवान के समतुल्य है ऐसे लेखक की तुलना किससे करें ? उनकी उपमा उन्हीं से दी जा सकती है। इस आलोक में इस कथन का अर्थ समझें- 'और ताल्स्ताय चूँकि ताल्स्ताय थे' इसलिए वह उदास घोड़े से बात कर सकते  थे । ताल्स्ताय की एक कहानी है जिसका हिंदी अनुवाद 'इंसान और हैवान' नाम से  छपा है।  यह कहानी दरअसल घोड़े की कहानी है । कुछ कुछ घोड़े की आत्मकथा।  इस कहानी को लिखने में ताल्स्ताय को तीस  साल लगे।  इसमें घोड़ा बताता है कि आखिर मुझे यहां से वहां क्यों जाना पड़ता है  और जब मैं आता जाता हूं ,इनके यहां से उनके यहां तो आदमी लोगों को क्या मिलता है? वह कोई पैसे जैसी चीज है? आदि आदि ।  कुल मिलाकर कहानी बताती है कि ताल्स्ताय घोड़े जैसे अनबोलता प्राणी के अनुभवों को भी जान सकते थे।  जिसकी भावनाओं को सिर्फ ईश्वर समझ सकता है, उसे ताल्स्ताय समझ सकते थे, उसका बयान कर सकते थे। एक बार फिर प्रेमचंद को  याद करिए । उनकी कहानी दो बैलों की कथा को, जिसमें बैलों के मनोभाव को प्रेमचंद ने समझा है।  उससे ताल्स्ताय के घोड़े की अनुभूति को व्यक्त करने की क्षमता का अंदाज लगाया जा सकता है।  यहां ताल्स्ताय के न्वीक्षण क्षमता और उसे भाषा में संप्रेषित करने की बेजोड़ क्षमता की ओर इशारा है।  इस क्षमता के लिए कवि दो बिम्ब और देता है । ताल्स्ताय रंगीन चित्र को कागज से उठाकर जेब में रखने की कोशिश कर सकते थे । घोड़ा फिर भी एक जीव है, हाव-भाव से उसकी भावनाओं या उदासी को समझा जा सकता है।  लेकिन रंगीन चित्र जो और ज्यादा सूक्ष्म है, उसे भी ताल्स्ताय बड़ी सहजता से बयान कर सकते हैं।  समुद्र की लहरों को आदेश देने का अभिप्राय यह कि ताल्स्ताय समुद्र की लहरों के हाहाकार को समझ सकते थे और उसका बयान कर सकते थे। वे  अथाह समुद्र का थाह ले  सकते थे । ऐसे थे ताल्स्तायवे  घोड़े ( मानवेतर प्राणी) रंगीन चित्र (कला और सौंदर्य )तथा समुद्र की लहरों (प्रकृति या समूची कायनात) से संवाद कर सकते थे।
इस तरह ताल्स्ताय के महत्व निरूपण के बाद तीसरे बंद में पहली बार दोनों पदों का आमना सामना होता है ।
'पर ताल्स्ताय गिर सकते थे  साइकिल से
साइकिल  सीखते हुए
यास्नाया पोल्याना की उस कच्ची सड़क पर
उस दिन जो साइकिल ने
धूल झाड़ कर इतिहास में प्रवेश किया
तो जैसे आज तक
हर आदमी के पीछे-पीछे घंटी बजाती हुई
उससे बाहर निकलने का
रास्ता खोज रही है.....'
तीसरे बंद में त्रिकोण के तीनों कोणों मौजूद हैं।  ऐसे ताल्स्ताय जो समुद्र की लहरों को आदेश दे सकते थे, असंभव को संभव कर सकते थे ,जिन्हें ईश्वर और राजा के समकक्ष या बढ़कर दर्जा हासिल है, वे भी  साइकिल सीखते हुए साइकिल से गिर सकते थे । कविता के पहले बंद में साइकिल और दूसरे बंद में ताल्स्ताय की महिमा का स्थापन  है।  लेकिन तीसरे बंद में ताल्स्ताय और साइकिल आमने-सामने हैं।  ताल्स्ताय साइकिल सीख रहे हैं, सीखना चाहते हैं और सीखते हुए गिर पड़ते हैं । ठीक इसी जगह कविता में चौथे कोण  का प्रवेश होता है।  यह चौथा कोण या बिंदु है या यास्नाया पोल्याना की कच्ची सड़क । यहीं पर इस चौथे पात्र का परिचय जान लें। यास्नाया पोल्याना ताल्स्ताय का गांव है।  जहां  वे जीवन भर रहे, उससे  प्यार करते रहे और उसे बेहतर बनाने के उपाय  करते रहे।  ताल्स्ताय ने अपने गांव में आश्रम बनाया, स्कूल खोला और गांव के नाम पर एक अखबार निकाला।  शहर और शहरीकरण के जादू के बरक्स ताल्स्ताय जैसे व्यक्ति का गांव से प्यार एक खास तरह की जीवन दृष्टि है, जिसे गांधी ने पहचाना और अपने हिंद स्वराजऔर ग्राम स्वराज्य के सूत्र लिए । सहसा ध्यान इस ओर भी जाता है कि कवि  आखिर यास्नाया पोल्याना की कच्ची सड़क का उल्लेख क्यों करता है?  क्या ठीक इसी समय कवि  को अपने गांव चकिया की कच्ची सड़क की याद तो नहीं आ गई ?और उस कच्ची सड़क पर साइकिल सीखता हुआ कवि स्वयं! शायद !
अपने गांव में ताल्स्ताय जब साइकिल सीख रहे थे, उनकी उम्र 67 साल थी।  (लगभग वही उम्र जिसमें कवि केदारनाथ सिंह यह कविता लिख रहे थे) साइकिल के लिए ताल्स्ताय का आकर्षण बच्चों जैसा है।  67 साल की उम्र में नई चीज, नई तकनीक के लिए यह आकर्षण काबिले गौर है।  नए के प्रति केदारनाथ सिंह के मन में भी आकर्षण बना रहता है।  इस आकर्षण को जीवन राग  के रूप में देखना चाहिए । यह जीवन राग उन्नीसवीं सदी के एक और जीनियस यानी मिर्जा गालिब की याद दिला देता है-
 गो हाथ को जुंबिश नहीं, आंखों में तो दम है
रहने दो अभी सागरो-ओ - मीना मेरे आगे
ताल्स्ताय का यह जीवन राग इतिहास से होड लेता दिखाई पड़ता है।  यहां भी कवि आगे की बातें पाठक की कल्पना पर छोड़ कर आगे बढ़ जाता है।
यों तो साइकिल सीखते हुए सवार गिरता है और धूल झाड़ कर वही उठ खड़ा होता है, लेकिन यहां एक बार फिर कवि चकित करता है।  यहां साइकिल धूल झाड़कर खड़ी होती है और इतिहास में प्रवेश कर जाती है।  ऐसा लगता है जैसे ताल्स्ताय को  देख या  छू लेने से साइकिल को अभयदान मिल जाता है। ताल्स्ताय से अभयदान मिल जाने के बाद साइकिल बेधड़क होकर इतिहास में प्रवेश कर जाती है और हर आदमी के पीछे घंटी बजाती हुई चलती है।  उससे बाहर (किस से बाहर- इतिहास से या आदमी से) निकलने का रास्ता खोज रही है.... ।  कविता इस अधूरे वाक्य पर खत्म होती है । साइकिल और उसकी घंटी भी पीछे छूट जाती है।  कविता पाठक के पीछे घंटी बजाती हुई चलने लगती है और पाठक को कई तरह के उधेड़बुन में डाल देती है। साइकिल या यंत्र जितना भी मोहक क्यों न हो आदमी की संस्तुति पर ही वह इतिहास में जगह बनाती है । और उसकी नियति आदमी के पीछे चलना ही है।
कविता हमें यहां पहुंचाती है? या कुछ और कहना चाहती है । ताल्स्ताय और साइकिल में दोनों पद प्रधान हैं । दोनों को य प्रधानता कवि  देता है या व्यापक जनता दोनों को ही अपना कर दोनों को प्रधान बना देती है।  और भी बहुत सी बातें घंटी के बजने की गूंज  की तरह पाठक के मन में आ सकती हैं। मसलन साइकिल या यंत्र से पैरों को मिलने वाली आजादी।  साइकिल का चलते जाना आदमी की आकांक्षा की सतत यात्रा है और घंटी का बजना इस आकांक्षा का उद्घोष।  या कि हर म ओ खा से संवाद की कोशिश।
यही  इस कविता की ताकत है।  कविता पढ़ने के बाद पाठक खुद को साइकिल पर सवार गली मोहल्ले में घंटी टुनटुनाते हुए पाता है।  कविता हमें हमारे बचपन में ले जाती है, जहां साइकिल सीखने की ललक, सीखते हुए गिरना और घंटी बजाते हुए फुर्र हो जाना सब याद आता है।  और याद आती है सुदर्शन की सदाबहार कहानी 'साइकिल की सवारी' कविता ताल्स्ताय की जेब में कहीं पीछे छूट जाती है । पाठक साइकिल मोड़ कर वापस आता है और  पाता है कि ताल्स्ताय यास्नाया पोल्याना में  बैठे समुद्र की लहरों को आदेश दे रहे हैं।  साइकिल का जादुई सम्मोहन पाठक को अपने गांव के कच्चे रास्ते पर लेकर चल देता  है जहां केदारनाथ सिंह पहले से ही मौजूद हैं।



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