शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

दूधनाथ सिंह की कहानी 'धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे':एक पाठ /सदानंद शाही




धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे कथाकार दूधनाथ सिंह के दूसरे रचनात्मक विस्फोट के दौर की कहानी है ।अपनी कथा यात्रा के आरंभ में दूधनाथ सिंह का कथाकार अपने को प्राय:  अन्तर्मन के दायरे में घटित होने वाले यथार्थ तक सीमित रखता है । उनके कथा लेखन के दूसरे दौर को रचनात्मक विस्फोट इसीलिए कहा गया क्योंकि इस दौर में कथाकार की अंतर्दृष्टि व्यापक बाह्य समाज की ओर रुख करती है और समाज की बहुस्तरीय जटिलता के यथार्थ का साक्षात कराती है । इस दूसरे दौर की शुरुआत यमगाथा नाटक से होती है ,बीच में माई का शोकगीत और धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे जैसी उदात्त कहानियों से होती हुई और आखिरी कलाम जैसे उपन्यास में आकार  लेती है।
 धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे  अपनी बनावट में बहुस्तरीय यथार्थ की कहानी है । जाहिरा तौर पर यह   जरायम पेशा बाप-बेटे सिउ महतो और मरकटवा की कहानी है। हिन्दी कहानी में बहुत दिन बाद बाप-बेटे की ऐसी जोड़ी दिखाई देती है जो प्रेमचंद के घीसू और  माधो की याद दिलाती है ।प्रकट तौर पर अमानवीय ,जरायम लेकिन उनके भीतर बहुत गहरे मनुष्यता का एक सोता कल कल करता हुआ बह रहा है। यह कहानी उस टहटह उज्जर औरत की कहानी है जो पचास से ज्यादा पृष्ठों की कहानी में शुरू से अंत तक मौजूद है लेकिन उसका कोई नाम नहीं है या वह किसी एक नाम में समा नहीं पाती। होने को उसका मायका है ,मायके में बाप भी  है ,ससुराल है  पर ससुराल भी क्या है जहां सास ,ससुर और पति कोई दिखाई सुनाई नहीं देता ,बस राक्षस  की तरह चचिया ससुर है जिसने सब कुछ को ग्रस लिया है। कहानीकार ने इस औरत की पहचान कराने की पूरी कोशिश की है..... ।पर यह आसान नहीं है क्योंकि यह  सिर्फ एक व्यक्ति के पहचान का सवाल नहीं है। दरअसल यह हमारे उपमहाद्वीप में निरंतर बज रहे  माई के शोकगीत की   पहचान का सवाल है । जिसे पहचानने के लिए कहानीकार किसी अनाम निर्गुणिया का सहारा लेता  है-
कौन बनवाँ इबो ,कवन बन अचइबो
कवन बनवा नाSS
आपण सेजिया डंसइबो
कवन बनवा नाSS
बाबा बनवाँ बाघ,माई के बनवाँ माघ
साईं के  बनवा नाSS
रावन सेजिया डंसावै
साईं के  बनवा नाSS
किस वन में खाऊँ /किस वन में हाथ धोऊँ/किस वन में में अपना विस्तार बिछाऊँ । बाबा के वन में बाघ है / (तो) माँ के वन में माघ(माघ की ठंढ बाघ से भी भयानक ) है। तो क्या साईं (प्रियतम) के वन में विस्तर  में  बिछाऊँ?साईं के वन में रावण ने पहले से ही विस्तार बिछा रखा है ! आधुनिक स्त्री विमर्श बताता है कि पुरुष प्रधान समाज में स्त्री स्थायी तौर पर विस्थापित है ।  घर  कौन कहे उसके पास अपना एक कमरा तक नहीं है।  यह निरगुन स्त्री के विस्थापन की सनातन पीड़ा का बयान है। इस निरगुन में कहानीकार  को (अपने गाँव की नानू  बो चाची के) जँतसार की अनुगूँज सुनाई पड़ती है। कहने की जरूरत नहीं कि जँतसार भी ऐसा श्रम गीत है जिसमें स्त्री की पीड़ा का सनातन राग सुनाई पड़ता है। स्त्री बाघ  से बचे कि माघ से । दोनों से बच गयी तो रावण से निजात नहीं है । यह स्त्री के जीवन के  इसी विकट बीहड़ यथार्थ से साक्षात्कार की कहानी भी है ।  
यह कहानी दलित-अछूत –भूमिहीन नगीनदास की कहानी भी है जो  सारी मुश्किलों से निजात पाने के लिए उदासी जी से कंठी माला लेकर मठिया में आ जाता है ,जहां कहीं ज्यादा विकराल  मुश्किलों से दरपेश होना है। यह मठिया जैसे धर्मक्षेत्र को कुकुरछेत्रेना देने वाले उदासी जी की कहानी भी है। नगीनदास जैसे सच्चे धार्मिक के लिए ईश्वर मानों सोया हुआ है और उसकी कृपा उदासी जी जैसे ढोंगियों पर बरस ही रही है । यह नगीनदास और मरकटवा के मन अंकुरित हुए सहज प्रेम की कहानी भी है जिसके लिए दोनों अपने अपने ढंग से जान कुर्बान कर देते हैं। धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे कहानी की कुछ परतें हैं जिनके सहारे हम कहानी की बहुस्तरीयता तक पहुंच सकते हैं।
2
   सिउ महतो अपनी जवानी में ही चोरी की कला में पारंगत हो गया है । उसके गुरु हैं- लेड़ी महतोधंधे के लिहाज से बूढ़े हो रहे लेड़ी महतो ने सिउ महतो को पहले गाय- बैल चुराने की कला सिखाई । कुछ गुरु का ज्ञान और कुछ चेले की प्रतिभा ,थोड़े ही दिन में सिउ महतो गुरु गुड़ और चेला चीनी वाली कहावत पर खरा उतरता है । पशु चोरी के धंधे में उसका नाम हो जाता है। इतना कि ईर्ष्यावश लेड़ी महतो उसे पुलिस के हाथों पकड़वा देते हैं । सात साल की जेल हो जाती है । जेल से छूटते ही सिउ महतो सीधे गुरु के पास पंहुचता है । अब गुरु उसे नए धंधे यानि औरतों  के खरीद फरोख्त की शिक्षा देता है ।वह यह भी बताता है कि इस नए धंधे का मार्केट कहीं ज्यादा है ।इस धंधे में भी सिउ महतो वैसी ही दक्षता हासिल कर लेता है जैसी पिछले धंधे में। वह पीछे मुड़कर नहीं देखता । उसका धंधा मजे से चल रहा है । गाँव में सबसे बढ़िया घर, सबसे सम्पन्न । बस एक ही कमी है ,सिउ के इकलौते बेटे मरकटवा की बीबी को बच्चे नहीं हैं । इसको लेकर सिउ की बीबी किच-किच करती रहती है ।सिउ महतो को भी लगता है कि आद  औलाद नहीं होगी तो उसका बंस डूब जाएगा ।  सिउ महतो पहले तो मरकटवा की व्याहता बीबी को बेच आता है । मरकटवा को यह बात अच्छी नहीं लगती लेकिन बाप के आगे उसकी एक नहीं चलती । सिउ महतो नयी और सुंदर औरत लाने का आश्वासन देकर मरकटवा को बहला  लेता है । वह मरकटवा के लिए सुंदर सुशील औरत की तलाश में जुट जाता है। और अंतत: चनरमा सिंह नाम के एक और कोड़ेबाज (औरत खरीदने बेचने का धंधा करने वाले) के यहाँ से अपनी बहू बनाने के लिए एक सुंदर सी औरत को खरीद लाता है । यहाँ घर पर बीबी और पूरा गाँव नयी बहू के इंतज़ार में है लेकिन जब नयी बहू आती है तो पता चलता है कि वह गर्भवती है । वह तुरंत इस औरत को वापस करने चल देता है । औरत काबू में रहे कहीं भाग न जाय इसलिए मरकटवा को अपने साथ ले लेता है । चनरमा सिंह एकदम से  पलट जाता है ।बिका हुआ  माल वापस लेने को तैयार ही नहीं होता है । सुं पहली बार सिउ महतो धंधे में मात खाता है । वह इस औरत को किसी भी तरह ठिकाने लगा देने पर आमादा है । वे दोनों औरत को लेकर बनकटे (जंगल)में जाते हैं और नकटी माई का चौरे के पास अड्डा जमाते हैं।  है। मरकटवा को रखवाली के लिए तैनात करके सिउ महतो ग्राहक/दलाल  खोजने जाता है । रखवाली के दौरान घने जंगल में मरकटवा के मन में औरत पर पहले दया आती है फिर  धीरे-धीरे प्रेम जैसा कुछ अंकुरित हो जाता है। वह मन ही मन सोचता है कि क्यों न इसको ही रख लिया जाय । उधर  कई कोड़ेबाज़  आते हैं पर  इस आसन्न प्रसवा को खरीदने को कोई तैयार नहीं होता । अंत में एक कोड़ेबाज़ इस शर्त पर तैयार हो जाता है कि इसको खाली कराने कि ज़िम्मेदारी तुम्हारी है । सिउ तैयार हो जाता है । सौदा तय हो जाता है । सिउ बयाना ले लेता है ।उधर सिउ महतो  कोड़ेबाजों को छोड़ने जाता है और इधर औरत को बच्चा हो जाता है । सिउ महतो लौटता है । । प्रसव की गंध पाकर  सियारों का झुंड जुट जाता है जिन्हें मरकटवा लाठी लेकर दूर तक भगा आता हैं । इधर सिउ महतो  बड़े करीने से बच्चे की  नार काटता है और अपनी पगड़ी खोलकर बच्चे को लपेट कर नकटी दाई के चौरे पर रख देता है । उसकी नजर औरत पर पड़ती है । वह भा  जाती है । सिउ महतो सोचता है कि अब यह खाली हो गयी है क्यों न इसे मरकटवा के लिए ही रख लें । और मन में ही योजना बना लेता है । अब वह नवजात शिशु को ठिकाने लगाने के लिए गड्ढा खोदने में लग जाता है । मरकटवा को जैसे ही इसका भान होता है वह अपने पिता पर टूट पड़ता है । बाप बेटे आपस में लड़ पड़ते हैं और दोनों एक दूसरे की जान ले लेते हैं । जब औरत को होश आता है तो उसका सामना  इस भयावह दृश्य से होता है । उसे लगता है कि उसका बच्चा मर गया है लेकिन उसी समय बच्चा कुनमुनाता है । वह दोनों को यों ही छोडकर बच्चे को लेकर इस असार संसार में चल देती है । यही धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे की मुक्तसर सी कहानी है।
3
लेकिन धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे की कहानी इतनी ही नहीं है ।यह कहानी कहते या रचते हुए कहानीकार अनेक संदर्भों को अनेक स्तरों पर देखता चलता है।  जैसा कि पहले ही संकेत किया गया सिउ महतो और मरकटवा की जोड़ी नये तरह के घीसू- माधो के रूप में सामने आती है । औरतों की खरीद बिक्री जैसे जघन्य कार्य को सिउ महतो ने औरतों के उद्धार के रूप में आदर्शीकृत कर दिया है । जिसे दुनिया पाप कहती है ,सिउ महतो उसे पुन्न का काम कहता है ,क्योंकि –वह औरतों का उद्धार करता है,तरन-तारन  करता है। ऐसे माई-बाप , जो अपनी बेटियों का बियाह नहीं रचा सकते ,जो पाई-पाई मुहताज हैं ,जिनको पेट के लाले पड़े हैं ,जिनके तन पर बस्तर नहीं हैं, जो हरामी जमीदारों के कर्जे में हैं –उनकी वह मदद करता है । इस कथन से सिउ महतो केवल अपने धतकरम को अपनी नजर में महिमा मंडित ही नहीं करता है बल्कि हमारे समाज में स्त्री की स्थिति और नियति का बयान कर देता है । आगे चल कर यह कहानी जिस औरत के त्रासदी पूर्ण जीवन की कहानी में बदल जाती है वह भी स्त्री की  नियति का बयान ही तो है। कोई भी काम आप तब तक नहीं कर सकते जब तक कि उसके लिए मन गंवारा न करे । जरायम पेशा आदमी भी आदमी होता है ,वह भी अपने को न्याय संगत और औचित्यपूर्ण साबित करने को कोशिश करता है । ध्यान रहे कि सिउ महतो के साथ इस धंधे में न केवल सफेदपोश नरमा सिंह हैं बल्कि मठिया के महंत उदासी जी भी शामिल हैं। जरायम पेशे के आदर्शीकरण की यह छाया संभवत:  उन्हें भी राहत देती होगी। बहरहाल आदर्शीकरण की यह प्रवृत्ति ही भारतीय समाज में मौजूद पाखंड की आधारशिला है ।
सिउ महतो को अपने बेटे के लिए एक औरत चाहिए। कैसी ? चुरइल अस टहटह,उज्जर ।मिल भी जाती है लेकिन समस्या हमल’(गर्भ) है । उसे औरत चाहिए पर दूसरे का बच्चा नहीं चाहिए । इसी हमल कि खातिर उस टहटह उज्जर औरत का निर्वासन और वनवास होता है जिसे कहानीकार वनवास का अनोखा नजारा कहता है। वनवास के  अनोखेपन की ओर इशारा करते हुए पता नहीं कहानीकार के मन में सीता निर्वासन का संदर्भ है या नहीं ,लेकिन अनायास ही गर्भवती सीता के निष्कासन का प्रसंग और उससे जुड़े बहुतेरे प्रवाद भी याद आ जाते हैं ।
अपनी नियति से लगी हुयी वह औरत सिउ और मरकटवा के साथ बनकटे में पंहुच जाती है । यद्यपि बनकटे में वे बमुश्किल एक या दो दिन रहते हैं लेकिन इसी में पूरी कहानी घटित हो जाती है । कहानी में वर्तमान के बीच  स्मृति का एक संसार लगातार चलता रहता है । टह टह उज्जर औरत इस वनवास में अपना पूरा निर्वासन याद करती है ।निर्वासन क्या है पूरा पूरा तीन युग उसके सामने है। वह कभी अपने माँ बाप के पास घर में रही होगी, जिसका कोई खास पता कहानीकार नहीं देता।ब्याह कर ससुराल आई जहां वह अपने  अपने चाचा ससुर के हवस का शिकार होकर गर्भवती हो जाती है। ऐसा किन परिस्थितियों में होता है इसपर कहानीकार बहुत समय नहीं खर्च करता। अनुमान कर सकते हैं कि या तो पति कहीं बाहर है या फिर है  ही नहीं । संभावता: पति की अनुपस्थिति में गर्भवती होना उसके भटकने का आरंभ है । उसका चचिया ससुर  मायके पहुंचा देता है। मायके में अब उसके लिए जगह नहीं है।  बाप यह कहकर वापस ससुराल के गाँव छोड़ आता है कि जिसका पाप वही ढोये। वहाँ फिर वही चचिया ससुर मिलता है । इस औरत को भरपूर भोगने के बाद उसे नरमा सिंह के हाथ बेच देता है। नरमा सिंह सफेदपोश है ,चूंकि उसके बेटे बहू हाबड़ा से आए हुए हैं,इसलिए वह माल को घर में नहीं रख सकता। लिहाजा उसे  उदासी जी की  ठिया पर पहुंचाया   जाता  है। कहने को उदासी जी हैं पर औरत की खरीद बिक्री जैसे गलीज काम में शामिल हैं। बजरिएनरमा सिंह टहटह उज्जर औरत अब उदासी जी कि मेहमान है। उदासी जी की समस्या भी हमल ही है। जब तक इससे मुक्ति नहीं मिलती या कोई खरीददार नहीं मिलता वह  नगीनदास  की देख रेख में दे दी जाती  है। नगीनदास इस कहानी में मौजूद एकमात्र  दलित और अछूत पात्र  है।  जो तमाम मजबूरियों  के  चलते कंठी लेकर उदासी जी के मठ पर रहता है । वह अपनी ओर से सारे बंधन छोड़ आया है लेकिन मठ में जाति और छुआ-छूत के बंधन मौजूद है, लिहाजा साधु  होने पर भी उसे अलग कोठरी में रहना और पापी पेट के लिए दिन भर खना पड़ता है। कंठी और सधुआई नगीनदास को मुक्त नहीं कर पाती ।बल्कि उनके बंधन और मजबूत हो गए हैं ।  नगीनदास अपनी दशा  का वर्णन खुद करते हैं—और जइसे –जइसे हम कनफूंका मन्तर का जाप कराते ,हमें अरथ समझ में आने लगा  आतम बंधक गुरु रजेवा। त का फरक बबुआनन की बखरी और उदासी जी की मठिया में?हम उहाँ भी बंधक थे ,इहाँ भी हैं ।उहाँ तो करज –कुआं ले देकर एक बखरी से दूसरी बखरी बादल भी लेते थे। इहाँ तो ठाकुरे  के बंधक हैं । आन्हर बरध भाँवरि चालै।माने अंहवत बानही के जाऊन बैल तेलिया हाँकता है न ,उसी तरह। चलते जाओ,जब ले हाड़ -हाड़ न गलि जाय। मरतो-मरत गुरु की सेवा ।यही भगती है,यही मुकुती है । मतवा राम ! अब तो लगता है की भगवानों झूठ हैं….. नगीनदास के बहाने से कहानीकार ने धर्म के सच का साक्षात्कार कराता है। नगीनदास सच्चा धार्मिक है । एक विवश दुखियारी औरत के लिए सहज करुणा जग उठती है ।इस करुणा में स्त्री और घर परिवार के लिए सहज प्रेम को भी देख सकते हैं,जिससे नगीनदास जीवन भर वंचित रहा है।   नगीनदास अपनी क्षमता भर उसका खयाल रखता है   । नगीन दास के अलावा जो भी मिलता है,उसे ही अयाचित  गर्भ धारण का जिम्मेदार ठहराता है।  नगीनदास पहला व्यक्ति है जो गर्भ के लिए उसे पापी होने का ताना नहीं देता। नगीनदास उस गर्भ को राम का आगमन कहता है और तरह-तरह से गाना बजाना कर के वा राम का  मनोरंजन करने की कोशिश करता है । जब तब अपनी खंजड़ी लेकर सोहर और निर्गुण दोनों सुनाता रहता है। कहानी कभी भी  हमें उस स्त्री का नाम नहीं बताती। उसके लिए केवल विशेषण हैं । अब वह टह टह उज्जर हो या फिर समय समय पर दी गयी गालियां। सिर्फ नगीनदास हैं जो उसके लिए माताराम या मतवा जैसे म्मानसूचक सम्बोधन ईजाद करते  हैं। नकटी माई के चौरे पर पड़ी-पड़ी वह टह-टह उज्जर औरत एक सपने कि मानिंद फ़्लैशबैक में अपने जीवन को याद करती है ,-‘उसके सपने में एक अच्छी जगह भी है –जब वह भगत जी के पास थी । कितने दिन?आधे अगहन बीते वह पंहुची थी । और अब फागुन चै है।  नगीनदास, जिसे वह अपने सपने में भगत जी के रूप में याद करती है की कोठरी में बिताए दिन ही उसके जीवन के कुछ अच्छे दिन रहे हैं । लेकिन यह भी सच है कि नगीनदास के लिए भी वे ही दो तीन महीने जीवन के सबसे अच्छे और सार्थक दिन हैं –और नगीनदास को तो जैसे सारे संसार का ऐश्वर्य मिल गया हो । गोशाला में सानी –पानी करते ,तालाब की ओर ,नहाते-धोते,त्रिपुन्ड घँसते , सुरूज़ महाराज को जल चढ़ाते – हर समय उनका ध्यान अपनी कोठारी में लगा रहता । कोठारी में कोसिल्ला माता है ,कोठारी में रामजी हैं। वे बार बार कोठारी में लौट आते और बेमतलब बोलबाल करते।जैसे उनका कंठ खुल गया था। सिर्फ बतरस । वे रात का इंतज़ार कराते। कब रात हो ,कब ठाकुर जी सोयेँ।वे कोठारी में लौटें और बतियाएँ –बतियाते चले जायआखिर कौन सुनता है कहानी मेरी और वह भी जुबानी मेरी।  जाते   शायद नगीनदास के जीवन में यह पहली बार घटित हो रहा था  कि वे किसी को अपनी कहानी सुना पा रहे थे ,कोई था जो उनकी कहानी सुन रहा था और उन्हें  भगतजी जैसे सम्मान और स्नेह का पात्र समझ रहा था  । नेह कि यह वही डोर है जिससे बंधा नगीनदास अपनी इस मताराम के लिए जान तक कुर्बान कर  देता है।  कहानी का एक धर्मक्षेत्र उदासी जी की मठिया है जिसे नगीनदास कुकुरक्षेत्र कहते हैं। क्यों? क्योंकि नगीनदास के लिए ऊपर जाना मना है न ! ठाकुर जी को छूतिका लग जाएगायह कहने के बाद नगीनदास  हँसे । नगीदास की यह हँसी भी बहुत कुछ कह रही है,जिसकी निष्पत्ति है –मतवा राम,अब तो हमको लगता है कि भगवानों झूठ है। इस धर्मक्षेत्रे और संत कचहरी का सच नगीदास उजागर कर देते हैं-संत कचहरी धरमधना /बरन –बरन के लोग /केहु पावे  अथक दु:ख SS /केहु के मनभोग –हो रामा SS
4  

कहानी के इस  कुकुरछेत्र  में एक और धर्मक्षेत्र है और वह है नकटी दाई का चौरा। जहां पर स्मृति कथा के रूप में स्वयं यह स्त्री संजै की तरह अपने जीवन में घटित हो रहे इस समूचे महाभारत का हाल बता रही है। स्मृति कथा के समानान्तर एक वर्तमान  कथा भी चल रही है।   इस  वर्तमान कथा का दरअसल एक अल्पकालिक प्रेमकथा है। सिऊ महतो के  लद्भेसर बेटा मरकटवा को अनजाने उस टह टह उज्जर औरत से प्रेम हो जाता है । लगभग उसी कोटी का जो चम्पा को जलदस्यु(संदर्भ- आकाशदीप,जयशंकर प्रसाद  ) से होता  है । मरकटवा
औरत खरीदने बेचने का धंधा करने वाले सिउ महतो का बेटा है । उसी सिउ महतो जो इस टह टह उज्जर के वर्तमान का जिम्मेदार है ।  मरकटवा की नजर में औरत खरीदना बेचना बाप का धंधा है ,इस धंधे को देखने की   नैतिकता- अनैतिकता की कोई कसौटी उसके पास नहीं है । इस धंधे में बेटा होने के नाते वह साथ है । बाप के साथ वह इसलिए भी है कि उसे भी एक औरत चाहिए । चुरइल  जैसी टह टह उज्जर। मरकटवा को औरत की रखवाली की ज़िम्मेदारी देकर सिउ महतो ग्राहक की तलाश में चला जाता है। इधर दोनों विक जंगल में हैं । दोनों विवश हैं । यह विवशता और विकता दोनों को करीब लाती है । दोनों में संवाद शुरू होता है –
उठो ,उधर अन्हरिया में चलते हैं। मरकटवा ने उसको ताकते हुए कहा ।
थोड़ा थम लो हमको।  औरत ने जैसे सब कुछ भूलते हुए कहा ।
कहानी में यह संवाद चालू रहता है । संवाद क्रम में औरत की वाग्विदग्धता का पता चलता है ॰ सूरदास की गोपियाँ याद आती हैं। अपनी वाग्विदग्धता का पता तो वह हर संवाद में देती है । नगीनदास से बातचीत के क्रम में भी । मरकटवा तो उसकी पीढ़े जैसी पीठ पर पहले से ही लोभाया हुआ था,उस औरत को भी  मरकवा की सरलता भा जाती है और मामला यहाँ तक पंहुच जाता है –
तुम्हारा बाप ठीके कहता है। औरत ने सतुआ की पिंडी  मुंह में रते हुए कहा ।
क्या?” मरकटवा सँभल गया।
कि तुम लदभेसर हो। औरत बोली ।
तो मायाते हैं तो कहते हैं रे! मरकटवा पूरी मेटी उठाकर घटर-घटर पानी पीने लगा ।
नहीं ,तुम हो । औरत ने कनखियों से देखते हुए कहा ।
क्या?” मरकटवा चौंका ।
लदभेसर। औरत के स्वर में दृढ़-निश्चयता थी ।
देखो, हम जवानी नहीं दरसाते,समझ लो। मरकटवा थोड़ा तन गया।
जवानी होती तो हमें सींकड़ से जंगल-झर में ले आ के छनते?” औरत बोली।
फिर क्या करते ?” मरकटवा गंभीर हो गया ।
ले के अलोप हो जाते । कतों पुरुब-बंडाला भाग जाते। उसने कहा ।
देखो, हमें गड़बड़ाओ मत। मरकटवा ने थोड़ी  नरमी से कहा ।
आगे भी यह संवाद जारी रहता है लेकिन पाठक भी यह जान जाता है कि मरकटवा गड़बड़ा गया है। मरकटवा इस औरत को उस नाजायज बच्चे के साथ भी अपनाने को तैयार है। बिलकुल तुरंत पैदा हुए बच्चे को देखने का उसका यह पहला अनुभव है। वह सोच में प गया है कि यह आदमी कैसे बनेगा?”
यह सोचते सोचते मरकटवा खुद आदमी बन गया है ।यों तो सिउ महतो भी उस औरत को बहू बनाने को तैयार हैं पर बच्चे को ठिकाने लगाने के बाद। लेकिन मरकटवा हर हाल में अपनाने को तैयार है। सिउ महतो बच्चे को ठिकाने लगाने की कोशिश करता है । मरकटवा मना करता है । दोनों एक दूसरे पर टूट पड़ते हैं और एक दूसरे की जान ले लेते हैं। आदमी बना मरकटवा उस हटह उज्जर औरत के लिए न केवल अपनी जान दे देता है बल्कि हत्यारे पिता की जान ले लेता है। इस सारी घटना से अंजान बेसुध पड़ी हुई औरत जब उठती है तो दोनों को मारा हुआ पाती है ।अपने बच्चे को लेकर बनकटे से निकल जाती है। कहानी इस भयावह और लगभग वीभत्स मोड पर  खत्म हो जाती है ।
कहानी खत्म होकर भी बहुत बड़ा सवाल हमारे  सम्मुख छोड़ जाती है। मरकटवा को एक समय में वह औरत जनावर कहती है। वह जनावर है भी । लेकिन वह पूरी तरह बदल जाता है। वह क्या है जो जनावर को आदमी में बदल देता है ?क्या वह प्रेम है?
5
जैसा कि शुरू में कहा गया धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे बहुस्तरीय कहानी है । कोई चाहे तो इसमें स्त्री विमर्श ,दलित विमर्श, लोक विमर्श आदि देख सकता है ,लेकिन अच्छी कहानियाँ या अच्छी रचनाएँ विमर्शों के पार चली जाती हैं और मनुष्य के हृदय की कोमलता और सौन्दर्य का साक्षात्कार कराती हैं। हमें हमारी मनुष्यता पर और सार्वजनीन मनुष्यता पर यकीन दिलाती हैं,हमें मनुष्य बनाती हैं। धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे ऐसी ही कहानी है।  


0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें [Atom]

<< मुख्यपृष्ठ