शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

संतों घर में झगरा भारी/सदानन्द शाही


संतों घर में झगरा भारी[1]

कबीर पर बात करते हुए बरबस कबीर की यह पंक्ति याद आ जाती है । खास तौर से तब जब हिन्दी आलोचना का घर हो । इस घर में कबीर की उपस्थिति ही ऐसी है कि वे जहां होते हैं, अड़बड़ पैदा कर देते हैं। इसलिए कबीर के लिए जितने मुंह ,उतनी बातें।ऐसे में मेरे जैसे हिन्दी के औसत छात्र के लिए बहुत सी मुश्किलें पेश आती हैं। कबीर के बारे में कुछ बातें इतने धड़ल्ले से कही जाती हैं कि चाहकर भी संदेह नहीं कर सकते । लेकिन ठीक उलट बातें भी उतने ही आत्मविश्वास से कही जाती हैं । लिहाजा भ्रम बना रहता है,दुविधा बनी रहती है  । ऐसी दुविधाओं के अनेक युग्म हैं । उदाहरण के तौर पर 1-कबीर ब्राह्मण थे या जुलाहा (दलित) 2- कबीर हिन्दू थे कि मुसलमान 3- कबीर कोरी थे कि जुलाहा  4 -कबीर बे पढ़े-लिखे थे या ज्ञानी (ज्ञान मार्गी तो खैर थे ही )। और (सबसे पहले या सबसे अंत में भी ) 5- कबीर कवि थे कि समाज सुधारक। ऐसी ही और भी  बहुत सी बातें हैं ।
कबीर कवि हैं कि समाज सुधारक ? यह एक ऐसा सनातन सवाल है जिसका उत्तर हिन्दी में पिछले सौ सालों  से खोजा जा रहा है। मजे की बात यह कि इस सवाल का उत्तर खोजते-खोजते अनेक पीढ़ियाँ सर्फ हो गईं।  उत्तर नहीं मिला । कभी-कभी ऐसा लगता है कि ऐसे सवाल कबीर तक पंहुचने के रास्ते में गति अवरोधक के रूप में खड़े किए जाते हैं । अगर पाठक असल कबीर या मूल कबीर तक पहुंच गया और उनकी संवेदना से जुड़ गया तो बात बिगड़ जाएगी। इसलिए अवरोधक खड़े किये गये । इसलिए जरूरी है कि इन गति अवरोधकों को हटाया जाय।
कबीर अपने को बार-बार जुलाहा कहते हैं ,कोरी कहते हैं ,उन्होंने कभी अपने को ब्राह्मण नहीं कहा है । वे कपड़ा बुनते थे,ताना-बाना और करघे में लगे  रहते थे।   फिर भी कहानी गढ़ी गयी और कह दिया गया कि कबीर ब्राह्मण थे ।ज़िद थी कबीर को ब्राह्मण मानने की। यह ज़िद  इसलिए नहीं थी कि ब्राह्मण बनाकर कबीर को सम्मान देना है; बल्कि यह साबित करना है कि जुलाहा इतना प्रतिभाशाली ,इतना  साहसी ,इतना नवोन्मेषी ,इतना मौलिक कैसे हो सकता है ? ऐसी क्षमता तो किसी उच्चवर्णी में ही हो सकती है। सो विधवा ब्राह्मणी वाली कहानी रच दी गयी। यह कहानी चाहे जितनी अविश्वसनीय और हास्यास्पद हो ,रामानन्द जैसे संत की छवि को चाहें जितना ध्वस्त करे – प्रयोजन यह सिद्ध करना है कि कबीर ब्राह्मण थे। मूल भाव यह है कि ब्राह्मणेतर में प्रतिभा नहीं  हो सकती है ,प्रतिभा भगवती का निवास सिर्फ ब्राह्मण में ही हो सकता है। इसलिए रामानन्द के आशीर्वाद से , विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से कबीर के जन्म की कथा चल पड़ी। इस कथा पर भरोसा झूठ पर भरोसा करने की गौरवशाली परंपरा का ही हिस्सा है। इस कहानी की रचना के मूल में एक तरह का जाति –वर्ण सिद्धान्त काम कर रहा है। कबीर का शाब्दिक अर्थ श्रेष्ठ या महान होता है । सब कुछ के बावजूद  कबीर कबीर थे – श्रेष्ठ और महानचूंकि श्रेष्ठता और महानता उच्च कुल में ही संभव है इसलिए कबीर को ब्राह्मण बना देना है ।
कबीर की महानता और श्रेष्ठता को अपने कुल से जोड़ने की भी परंपरा मिलती है । एक विद्वान उठे तो कबीर को बनिया साबित करने लगे । कवि कबीर की खोज बनिया कबीर की खोज में अटक गयी। जो घर जारे आपना  चले हमारे साथ  का हाँका लगाने वाला कवि हिन्दू –मुसलमान,कोरी-जुलाहा,ब्राह्मण-बनिया -दलित में  फंस गया- या फंसा दिया गया। ऐसे में कबीर का पाठक क्या करे।
जिस रामानन्द के आशीर्वाद से कबीर का जन्म होना बताया गया, आगे चलकर कबीर को उसी रामानन्द का  शिष्य भी बता दिया गया । इसके लिए भी एक कथा रची गयी ।अंधेरे में गंगा नहाकर लौट रहे रामानन्द के खड़ाऊँ के नीचे कबीर के कुचल जाने वाली  कथा ।   यह कथा परंपरा इतनी प्रभावी है कि वह हमेशा तर्क और तथ्य के विरोध में आती है और कालांतर में स्वयं तर्क या तथ्य की तरह मान ली जाती है। गुरु की महिमा और गुरु की योग्यता के बारे इतना कुछ कहने वाले कबीर कहीं भी रामानन्द को गुरु के रूप में दर्ज नहीं करते- लेकिन कथा गढ़ने वाली प्रतिभाएँ ऐसी कथाओं को कुछ इस तरह मन में बैठा देती हैं कि उससे अलग सोचना भी कुफ़्र लगने लगता है।
कबीर के बे पढे-लिखे होने के सवाल पर हर कोई सहमत है। सब धड़ल्ले से कहते मिल जाते हैं कि कबीर पढे-लिखे नहीं थे । कबीर के कुछ दोहे इस बात की गवाही देते मिल जाते हैं  कि कबीर पढे-लिखे नहीं थे। ऐसे में यह घोषित करना आसान हो जाता है ।
सि कागद छुवो  नहीं,कलम गहौ नहिं हाथ ।
चारिउ जुग के महातम कबीरा मुखहि जनाई बात ॥[2]
अब इससे आसान और स्पष्ट प्रमाण और क्या होगा  ? कबीर स्वयं कह रहे हैं कि मैंने स्याही और कागज छुआ तक नहीं है,कभी कलम पकड़ने की नौबत ही नहीं आई । अब क्या चाहिए ,कबीर को बे पढ़ा-लिखा साबित करने के लिए। हालांकि इस दोहे में कहा तो कबीर ने यह भी है कि इसके बावजूद चारों युगों का जो माहात्म्य है,उसे मौखिक ही सबके सामने प्रत्यक्ष कर दिया है। लेकिन दोहे के आखिरी दो चरण किसी की जुबान पर नहीं चढ़ते  । लोग आधे दोहे को ले उड़ते हैं  कि कबीर पढे-लिखे नहीं थे ।
लेकिन दोहे का उत्तरार्ध हमें याद नहीं रहता।  कबीर का यह कथन और कबीर के बारे में हमारा यह निष्कर्ष काफी सुभीते  का है कि कबीर पढे-लिखे नहीं थे। इसलिए इस दोहे का अर्थ करने के पहले ही हम निष्कर्ष तक पहुंच जाते हैं।  सुभीता यह कि एक बे  पढ़े-लिखे व्यक्ति की बात को तवज्जो कैसे  दे सकते हैं ? इसलिए इस पंक्ति में कहीं कुछ व्यंग्यार्थ भी है, यह देखने-समझने की जरूरत नहीं रह जाती । ऐसा नहीं है    कि हमेशा कवि के  अपने बारे में कहे गए ऐसे कथन को अभिधा में ही लिया जाता रहा हो और अभिधार्थ  को ही सच मान लिया जाता रहा हो  । हम व्यंग्यार्थ जानते भी  हैं और उसे समझते भी हैं।  लेकिन व्यवहार में इस समझ को लागू कराते समय हम चयनधर्मी हो जाते हैं।जब सुविधा होती है तो ऐसे कथनों को अभिधा में लेते हैं और जब सुविधा होती है व्यंजना में लेते हैं। तुलसीदास के  उदाहरण से इस बात को समझने में आसानी होगी। जब तुलसीदास कहते हैं -

वि  न होहूँ  नहिं चतुर  प्रवीनू
सकल कला सब विद्या हीनू । । [3]
 या
कवित विवेक एक नहीं मोरे
सत्य कहों  लिखि कागद कोरे॥[4]
तो गलती से भी के इसे  तुलसीदास का आत्म वक्तव्य नहीं मानते। आखिर  क्यों ? क्योंकि इसका सहज उत्तर है कि तुलसीदास यह सब विनम्रता बस कह रहे हैं। विनम्रता प्रदर्शन कह कर ऐसी उक्तियों के लिए तुलसीदास को अलग से महिमामंडित किया जाता है  हालांकि यह बात सच है कि यह तुलसीदास की विनम्रता ही है । तुलसीदास के काव्य विवेक पर किसी को संदेह नहीं है और न ही करना चाहिए। लेकिन कबीरदास का कथन भी तो विनम्रता वश कहा हो सकता  है- मसि कागद छुयो नहीं कलम गह्यो नहिं हाथ लेकिन नहीं! कबीर की बात को विनम्रता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।  क्योंकि विनम्रता प्रदर्शन के लिए भी पढ़ा-लिखा, सुसंस्कृत और कुलीन होना अनिवार्य है।  इसलिए कबीर के साथ बात उलट जाती है। दोहे की  पहली पंक्ति आसानी से स्वीकार कर ली  जाती है और दूसरी पंक्ति उतनी ही आसानी से भुला  दी जाती है । अगर किसी ने दूसरी पंक्ति पर मेहरबानी की भी तो उसे  उसमे कबीर का अहंकार नजर आएगा। क्योंकि कबीरदास उस तरह से पांडित्य परंपरा अथवा उच्च कुल के नहीं हैं।  विनम्रता कुलीन का ही गुण हो सकती है।  कबीर जैसा उजड्ड  जुलाहा क्या खाकर विनम्रता दिखाएगा। जहां तक  अहंकार का सवाल है, उसके लिए तो खैर कबीर प्रसिद्ध ही हैं।  
अब एक बार कबीर बे पढे -लिखे साबित हो गए तो उसके बाद उनसे निपटना आसान हो जाता है । फिर कबीर का कहा हुआ सब कुछ  बे पढ़े-लिखे व्यक्ति का कहा हो गया । इसलिए वह  मानने  योग्य बात  नहीं है।  मजे की बात यह है कि एक तरफ कबीर को बे पढ़ा-लिखा माना जाता  हैं और दूसरी तरफ उन्हें ज्ञानमार्गी भी  करार दे  दिया जाता  है। यह भी  किसी अचंभे से कम नहीं है ।कमाल यह कि  पहले कबीर को बे पढ़ा लिखा बता  कर संदिग्ध बना दिया गया और फिर उन्हें ज्ञानमार्गी कह कर कविता की दुनिया से बाहर रखने की कोशिश हुई ।   जैसे ब्राह्मण कह देने पर  कबीर का सम्मान नहीं बढ़ा वैसे ही उन्हें ज्ञानमार्गी कह कर  उनको ऊंचे नहीं उठाया गया  बल्कि कबीर को ज्ञानमार्गी कहना उनकी भक्ति और उनकी कविता को कमतर बताने की युक्ति है। अब भक्ति तो ठहरी  प्रेममार्गी तो जो ज्ञानमार्गी होगा वह कांतार हो ही जाएगा।  अब इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता कि प्रेम के मामले में भी कबीर किसी से कम नहीं हैं। प्रेम के मामले में कबीर बेमिसाल हैं,यह समझने के लिए किसी विशेष प्रतिभा की जरूरत नहीं है ,क्योंकि  कबीर  जैसा प्रेमी हृदय मिलना मुश्किल है-
नैना अंतरि आव तू, नैन झाँपि तोहि लेऊँ।
ना हौं देखूं और कू  तुझ ना देखन देऊँ॥[5]

लेकिन कबीर का प्रेम इसलिए नहीं दिखाई पड़ता या हम देखना नहीं चाहते क्योंकि कबीर प्रेम तक पहुंचने के लिए मति का और विवेक का सहारा लेते हैं ।
कबीर के विद्यार्थी की दिक्कत यह है कि वह उन्हें बे पढ़ा-लिखा मानकर अविश्वास करे , ज्ञानी मान कर डर जाए , उन्हें अहंकारी समझे ,समाज-सुधारक जाने क्या करे? उनके भीतर के प्रेमी रूप को समझने और कविता तक पहुँचने के विकट पंथ में बहुत से मार यानि बाधाएं हैं।

कबीर के बारे में ऐसी बातें इसलिए की जाती हैं क्योंकि कबीर असुविधा पैदा करने वाले कवि हैं।  उनकी कविता किसी भी तरह के  श्रेष्ठता क्रम को चुनौती देती है । श्रेष्ठता वर्णक्रम का हो, भाषा का हो, शास्त्र का हो, कबीर की कविता उसे खारिज करती है । कबीर की कविता का कथ्य शास्त्रसम्मत तो  नहीं ही है, बल्कि उल्टे शास्त्र विरोधी भी है। कबीर की कविता शास्त्र को नकारने वाली है  उसका खंडन करने वाली है । वर्ण व्यवस्था को अस्वीकार करने वाली कविता है।  संस्कृत को कूप  जल कहने वाली कविता है।  पोथी को दूर करने और पुस्तक को फेंक देने वाली बात करती है।  अब एक ही साथ जो कवि या कविता इतनी तरह की सुविधाएं पैदा कर रही हो , उसे ठिकाने तो लगाना ही पड़ेगा! तो भाई लोगों ने लगा दिया।  भाषा ठीक नहीं है,पँचमेल खिचड़ी है , सुनी-सुनाई बे सिर-पैर की बातें हैं, जो बे पढ़े-लिखे लोगों को ही अच्छी लग सकती है,लीजिए फैसला हो गया। यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि कबीर के समय पढ़ा लिखा होने का अर्थ संस्कृत पढ़ा लिखा होना था ।संस्कृत पढ़ने की सुविधा कितने लोगों को थी ! याद करें कि कबीर बहुत बाद के कवि केशव दास को भासा में कविता लिखने को लेकर कैसा अफसोस होता है-भासा बोल न जानहीं,जिनके कुल के दास,तिन भासा कविता करी जड़ मति केसव दास। कबीर के समय तो संस्कृत का दबदबा और ज्यादा रहा होगा । और कबीर उसी संस्कृत को कूपजल कह दे रहे हैं। यह हिमाकत है । फिर हिन्दी आलोचना के गब्बर सिंह कहेंगे ही इसकी सजा मिलेगी ।जरूर मिलेगी । हिन्दी में कबीर संबंधी मूल्यांकन का अधिकांश गब्बर सिंह के डायलॉग जैसा है।
हिन्दी में कबीर के बारे में एक सनातन प्रश्न चला आता है।  कबीर कवि हैं कि समाज सुधारक पीढ़ियां गुजर गई इस प्रश्न का उत्तर देते-देते उत्तर नहीं मिला ।  यह प्रश्न हिंदी की डाल पर बैठे हुए बेताल की तरह जमा हुआ है।  इस पर भी विचार कर लेना समीचीन होगा।  कबीर को कवि  रूप में स्वीकार करना सहज नहीं है , इसके बावजूद कि उन्हें  ब्राह्मण घोषित किया  जा चुका है,वे  रामानंद के शिष्यों  में शुमार कर लिए गए हैं ,तब भी ।

सच पूछिए तो हिंदी साहित्य में कबीर के लिए जगह थी  ही नहीं । तब के दिग्गज आलोचक मिश्र बंधु हुआ करते थे।   मिश्र बंधुओं ने हिंदी के नवरत्नों की सूची बनाई और किताब लिखी हिंदी नवरत्न’(1910)  इस सूची में कबीर  शामिल नहीं थे । इसी  बीच रबीन्द्र नाथ ठाकुर को साहित्य का नोबेल प्राइज(1913) मिला।  रबीन्द्रनाथ ठाकुर के नाते दुनिया भर के साहित्यिकों का ध्यान कबीर की ओर नये सिरे से गया। एजरा पाउंड ने कालिमोहन घोष की मदद से कबीर की दस कविताओं का अनुवाद किया था जो 1913 में रामानन्द चटर्जी के द मॉडर्न रिव्यू में प्रकाशित हुआ। टैगोर कबीर का अनुवाद कर रहे थे और दुनिया भर की कवि बिरादरी में कबीर का नाम जा रहा था । टैगोर के अनुवाद की यह किताब पोएम्स ऑफ कबीर नाम से 1915 में आई, जिसके माध्यम से दुनिया ने  भारत के इस संत कवि को नयी निगाह से देखा। पोयम्स ऑफ़ कबीर में कबीर की सौ कविताएं आनूदित थीं । इस किताब के हवाले से  कबीर दुनिया भर में चर्चित हो गयेअब  मिश्र बंधुओं को लगा कि यह तो गड़बड़ हो गई है यह आदमी  पूरी दुनिया में कवि के रूप में पढ़ा और सराहा जा रहा है और हमारे नवरत्न में इसका नाम ही नहीं है।   मिश्र बंधु बैठे और विचार किया । मुश्किल यह थी कि वे पहले के  किसी नवरत्न को निकालना  नहीं चाहते थे। निकालते तो पहले का मूल्यांकन प्रश्नांकित होता।  और इधर कबीर की प्रसिद्धि उनको नवरत्नों में शामिल करने की चुनौती दे रही  थी।  लिहाजा उन्होंने एक रास्ता निकाला।  जैसे वे तीन मिलकर मिश्रबंधु  के नाम से जाने गए वैसे ही नया पद गढा गया त्रिपाठी बंधु। इस तरह मतिराम और  भूषण को छठे स्थान पर रखा गया और कबीर के लिए सातवीं जगह खाली करा ली गई। किसी तरह नवरत्नों में  कबीर एडजस्ट कर लिए गए । यही वह दौर था जब हिंदी आलोचना शक्ल ले रही थी।  यही समय था जब हिंदी साहित्य का इतिहास बन रहा था।  यही समय था जब हिंदी विश्वविद्यालयों में आ रही थी।  उस पूरे दौर पर रवीद्रनाथ ठाकुर के कबीर की धमक मौजूद थी।  मिश्रबंधुओं जैसी ही मजबूरी विश्वविद्यालयों और आलोचकों के सामने थी । लिहाजा  कबीर को साहित्य में जगह दे दी गई । पर एक पा टिप्पणी के साथ । कबीर पर समाज सुधारक होने की छवि चस्पा कर दी गई।  बीसवीं शताब्दी के आरंभ का समय  था।  वातावरण में समाज-सुधार आंदोलनों का जोर मौजूद था । सो उसी वातावरण से एक शब्द लेकर कबीर  को समाज-सुधार की कोटि में डाल दिया गया  बिना यह विचार किये कि 19 वीं सदी का समाज सुधार आंदोलन और कबीर के समय की भक्ति  की चेतना दो अलग-अलग चीजें थी । उन्नीसवीं सदी के समाज सुधार का संदर्भ विंदु  औपनिवेशिक था ।समाज सुधार के प्रयत्नों के पीछे जो मानक काम कर रहे थे वे  औपनिवेशिक थे।  पश्चिम की दुनिया, पश्चिम का समाज एक मानक की तरह सामने खड़ा था।  समाज सुधार के प्रयत्न  अपनी सारी  दिच्छा के बावजूद पूरब को, प्राची को परिभाषित करने के प्रयत्न ही थे।  
पूरब को परिभाषित करने का अर्थ पूरब को  अपनी ही दृष्टि में पश्चिम से हीन साबित करने/मान लेने  के व्यापक प्रोजेक्ट का हिस्सा था, जिसे एडवर्ड सईद ने ओरिएंटलाइजिंग द ओरिएंट कहा । इसी औपनिवेशिक दायरे में राष्ट्रवाद की धारणा का भी विकास  हुआ। यही वह दौर था जब कबीर की कविता पर  समाज-सुधार का लेबल लगा । समाज-सुधार का यह लेबल कबीर की कविता को मुकम्मल  कविता मानने से इनकार या उसे हीनतर  कविता मानने का उपक्रम था। यह कबीर ही नहीं  समूची निर्गुण संत  कविता को हीनतर बताने का एक छुपा हुआ किन्तु सुचिन्तित अभियान था। निर्गुण भक्ति को विदेशी पद्धति की भक्ति कहकर हीनतर  भक्ति साबित किया जा रहा था ,इसलिए कबीर को समाज सुधारक कहने के पहले सभी पहलुओं पर विचार कर लेना चाहिए । 19 वीं दी के समाज सुधार आंदोलन  के सापेक्ष कबीर की कविता में बुनियादी फर्क हैकबीर कि नज़र में अपने समय-समाज की संरचनाओं में निहित गड़बड़ियां थीं । यह किसी अन्य के हवाले से नहीं था।  वह अपने समाज में सुधार करके किसी और जैसा सभ्य  और सुसंस्कृत बनने नहीं जा रहे थे।  तत्कालीन समाज संरचना की असंगति उन्हें दिखाई दे रही थी । सामाजिक ढांचे की उलटबांसी को उन्होंने अपनी सहज प्रतिभा से समझा और प्रश्नांकित किया।  इसलिए 19वीं सदी में समाज-सुधार का जो नपना बना,उसका परिप्रेक्ष्य भिन्न है।  उससे कबीर को नापने का काम अनुचित है ।इसलिए  कबीर कवि  नहीं थे या कमर कवि थे, यह साबित करते रहने में  शक्ति खर्च करना बे मतलब है  जिसे रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कवि  माना हो उसके लिए कवि  होने या फिर कमतर कवि  होने का प्रमाण पत्र जारी करने की हिमाकत करना निरर्थक है। बेहतर है कबीर को पढ़ लीजिए।
वीन्द्र नाथ टैगोर के हवाले से कबीर सारी दुनिया में स्थापित हैं ।  वह किसी के खारिज करने से  खारि नहीं होने जा रहे हैं। अलग से किसी को कबीर कवि हैं’, यह स्थापित करने की जरूरत भी नहीं । विचार इस बात पर  करना चाहिए कि कबीर की अपने समाज से खटक क्यों गई थी? वे कौन सी चीजें थी जो उनके कवि को चोट पहुंचा रही  थीं ? कौन सी चीजें थी, जिन्हें वे जला देना चाहते थे या जला देने पर आमादा थे।
विचार यह भी कीजिए कि क्या कबीर दास की यह खटकन एकायामी थी? क्या जैसा कि कहा जाता है वे सिर्फ जलाने में विश्वास रखते थे?उनकी दुनिया  सिर्फ खंडन मंडन तक सीमित थी। उनके पास समाज को  देने के लिए कुछ वैकल्पिक था ही  नहीं?
इस पर विचार करें तो पाएंगे कि कबीर की यह खटकन  इकहरी नहीं थी।  उनके दिल दिमाग में वर्तमान की बेढंगी दुनिया के बरक्स एक वैकल्पिक दुनिया का खाका मौजूद था । कबीर की यह वैकल्पिक दुनिया वर्तमान से बेहतर ही नहीं अपने आप में बेहद सुंदर थी । सौंदर्य की ऐसी कल्पना की तरह जिसे गालिब रानाई –ए- ख्याल कहते हैं।ध्यान से देखें तो कबीर की कविता एक वैकल्पिक सौन्दर्य शास्त्र  प्रस्तावित करती है। जरूरत कबीर की कविता में मौजूद वैकल्पिक सौंदर्यशास्त्र को समझने की है, उनकी कविता में मौजूद वैकल्पिक समाज के नक्शे को जाने और उसे धरातल पर उतारने की है ।
कबीर अपनी कविता के माध्यम से सुंदर की कल्पना को साकार करने में जुटे थे । आखिर कविता करती क्या है?  वह सुंदर को हटाकर सुंदर की रचना ही तो करती है।  कविता की सबसे बड़ी हसरत सुंदर की रचना है।  गालिब की भाषा में कहें तो हसरते तामीर6 कबीर के यहां जो बेचैनी दिखाई पड़ती है, उसके मूल में यह हसरतें तामीर ही है –
सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै
दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवै7
यह जागना और यह रोना, घर जलाने की विकट प्रतिज्ञा या कि पूर्व शर्त का संबंध महज खंडन मंडन से नहीं बल्कि इस हसरतें तामीर से है। इसके लिए कबीर सब कुछ दांव पर लगा देने को तैयार है। कबीर कि कविता हमसे एक असहज सवाल करती है –क्या हम सब कुछ को दाँव पर लगाने के लिए तैयार हैं?’ कबीर की कविता पर विचार करना वास्तव में इस असुविधा जनक सवाल पर विचार करना है।  






[1] -19 सितंबर 2019 को आत्माराम सनातन धर्म कालेज नयी दिल्ली में दिये गये व्याख्यान का संपादित रूप।
#संतों घर में झगरा भारी ।
राति दिवस मिलि उठि-उठि लागै,पाँच ढोटा एक नारी ॥
न्यारो न्यारो भोजन चाहैं ,पांचौ अधिक सवादी
कोई काहु को हटा न मानै,आपुहि आपु मुरादी॥
दुरमति केर दोहगिनि भेटै, ढ़ोटहि चाँप चपेरे॥
कहै कबीर सोई जनु मेरा,जो घर की रारि निबेरे॥
  कबीर वाङ्ग्मय खण्ड1,सबद ,सम्पा-जयदेव सिंह /वासुदेव सिंह पृ371

[2] -कबीर बीजक साखी 187
[3] -तुलसी ग्रंथावली ,भाग 1 (रामचरित मानस) नागरी प्रचारिणी सभा पृ 8
[4] -तुलसी ग्रंथावली ,भाग 1 (रामचरित मानस) नागरी प्रचारिणी सभा पृ 8
[5]- कबीर वाङ्ग्मय खण्ड3,साखी ,सम्पा-जयदेव सिंह /वासुदेव सिंह पृ95

6-घर में था क्या कि तिरा गम उसे गारत करता
वो जो रखते थे हम इक हसरत-ए-तामीर सो है ॥
7- कबीर वाङ्ग्मय खण्ड3,साखी ,सम्पा-जयदेव सिंह /वासुदेव सिंह पृ स47454750



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