मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

केदारनाथ सिंह की कविता ‘पांडुलिपियाँ’ ( भूत, भविष्य और वर्तमान का संगम) सदानंद शाही



तालस्टाय और साइकिल केदारनाथ सिंह का सातवां कविता संग्रह है।  यह संग्रह 2005 में प्रकाशित हुआ yaani          यानी 70 पार के केदार की कविताएं हैं । संग्रह की पहली कविता आईना है,जिसमें कवि कहता है-

मेरे निर्माता का आदेश है
देखो और बोलो
बोलो और टंगे  रहो
और देखिए ना मेरी मुस्तैदी
कि मैं सब की ओर से बोलता हूं
और बोलता हूं अपने भीतर की सारी सच्चाई के साथ

यानी कवि जिसे देखता है, उसे पूरी सच्चाई के साथ बोलता है या बोलना चाहता है । कवि की सबसे बड़ी पूंजी उसका इंद्रिय बोध है । जीवन और जगत का अनुभव हमें इंद्रियाँ कराती हैं। कवि इस अनुभव को ग्रहण करके अपनी कविता में दूसरों के लिए इंद्रिय संवेद्य बनाता है । इस संग्रह की कविताएं प्रमाणित करती हैं कि 70 की उम्र में भी कवि की इंद्रियाँ उतनी ही सक्षम हैं जितनी कि युवा काल में थीं। बल्कि कवि के अनुभव संसार कि व्यापकता  ने  उसके इंद्रिय बोध को और धारदार बना दिया है,समय के साथ उसमें  और निखार आया है।  इसलिए कवि को नागासाकी में अकेली ब गई चिउँटी  भी दिखाई दे रही है और कवि उसकी ओर से भी बोल रहा है।  उम्र और अनुभव ने कवि के इंद्रियबोध को और  उदबुद्ध कर दिया है। जिससे उनकी कवितायें सांद्र,संश्लिष्ट और विपुल’(अरुण कमल) हो गयी हैं।      यहां आते आते केदारनाथ सिंह की कविताएँ अपने समय का आईना  होने के साथ मानव चेतना का जीवंत  इतिहास का बन जाती हैं।
संग्रह की  ऐसी ही एक कविता है- पांडुलिपियाँ पांडुलिपियाँ मनुष्य की चेतना के इतिहास से रूबरू कराती है। मनुष्य और  मनुष्य का जीवन स्मृतियों का इतिहास है।  इन स्मृतियों  को जीने, बरतने और भावी पीढ़ी तक हस्तांतरित करने एक आदिम  दिन बेचैनी आदमी में होती है।  इस बेचैनी के नाते ही  आदमी ने  भाषा जाद किया,, भाषा को लिपियों का लिबास दिया, लिखने की कला ही नहीं लिखने के तमाम साधनों का संधान  किया।  पत्थर से लेकर तापत्र और भोजपत्र से होते हुए कागज तक का सफर हमारे सामने है। मनुष्य ने लिखने के लिए  तापत्र और भोजपत्र का लंबे समय तक इस्तेमाल किया । तापत्र और भोजपत्र का रंग पीलापन लिए  होता है । पांडुलिपियाँ में पांडु (यानी पीला) वहीं से आया । इसलिए पीले तापत्र अथवा भोजपत्र पर हाथ से लिखी गई इबारत को पांडुलिपियाँ कहा गया । कागज के आविष्कार के बाद भोजपत्र आदि की जगह कागज का इस्तेमाल होने लगा । लेकिन हाथ से लिखी गई पोथियों को पांडुलिपि कहा जाने लगा। छापेखाने का विकास बहुत बाद में हुआ । इसलिए जाने कब से  हाथ से लिखी गई पोथियों में मानव की स्मृति सुरक्षित होती आई  है।  आज भी असंख्य पांडुलिपियाँ मठों- मंदिरों से लेकर पुस्तकालयों  और संग्रहालयों  में पड़ी प्रकाश में आने का इंतजार कर रही हैं।  इन धूल खाई पांडुलिपियों में मानव चेतना का इतिहास संचित है । मानव चेतना का यह इतिहास जड़ वस्तु नहीं ;बल्कि चेतन एहसास है । मानव चेतना के इतिहास से साक्षात्कार कराती हुई पांडुलिपियाँ कविता सबसे पहले हमारी मुलाकात कराती है स्त्री की चीख  से-
कि डरते-डरते पहला पन्ना खोला
और क्या आप विश्वास करेंगे
मुझे उसके भीतर सुनाई पड़ी एक स्त्री की ची
जो किसी अक्षर के नीचे
दबी पड़ी थी

क्या विडम्बना है? यों भी   मनुष्य की स्मृति का  आरंभ स्त्री की चीख  से ही  होता है।  जन्म के समय प्रसव पीड़ा से छटपटाती स्त्री की ची से शुरू हुई स्मृति जैसे मानव सभ्यता का स्थायी लेख बन जाये। यह चीख  थेरी गाथा की औरतों से होते हुए टमाटर बेचने वाली बुढ़िया तक बदस्तूर कायम है। यह टमाटर बेचने वाली बुढ़िया एकदम मां की तरह चुप रहती है। केदारनाथ सिंह के लिए  स्त्री की ची को जानना दरअसल स्त्री को जानना है।वे यहाँ तक कह देते हैं कि – जो एक स्त्री को जानता है उसके लिए कुछ भी- कुछ भी अजूबा नहीं हैमहाभारत के लिए कहा जाने वाला वाकई याद आ जाता  है-यन्न भारते तन्न भारते  अर्थात जो भारत (यानि महाभारत) में नहीं है वह भारत में नहीं है। केदारनाथ सिंह इससे भी बड़ी बात कहते हैं –स्त्री को जानना सब कुछ जानना है।   यहाँ किसी स्त्री को जानना मनुष्यता के समूचे इतिहास को जानने में बदल जाता है।  पांडुलिपियाँ में यह चीख किसी  अक्षर के नीचे दबी पड़ी है।  इसका क्या मतलब है ? क्या अक्षरों के पीछे  इस ची को छुपा दिया गया है। क्या अक्षर स्त्री की चीख को दबा छुपा देना चाहते हैं ! पर यह चीख इतनी स्पष्ट है कि छुपाए जाने के बावजूद जहां तहां से सुनी जा सकती है। जैसे कि हम सुन ही लेते हैं सीता और द्रोपदी जैसी स्त्रियों के  दुख को भी। अभिप्राय यह कि हमारी सभ्यता का एक पाठ स्त्री के दुख में है जिसे छुपाए जाने की कोशिशें हुई हैं । केदारनाथ सिंह का कवि इसे सुन लेता है और अपने पाठक तक इस चीख और चीख में छुपे सभ्यता विमर्श को संप्रेषित करता है।
सबसे रोमांचक अनुभव
मुझे उस समय हुआ
जब मैं खड़ा था एक प्राचीन हस्तलेख के सामने
और उसके भीतर से एक आवाज ने
जैसे मुझे पहचाना और लगा जैसे पूछा हो –
कैसे हो केदारनाथ ?’

कोई कवि अचानक हवा में नहीं पैदा  हो जाता । वह परंपरा के प्रवाह का प्रतिफल है । एक प्राचीन हस्तलेख का  केदारनाथ सिंह को पहचान लेना और हाल-चाल पूछना- कुछ इस तरह  जैसे कि कोई पूर्वज अपने पौत्र या प्रपौत्र का हाल पूछ रहा हो । प्राचीन हस्तलेख द्वारा  पहचान लिया जाना द्योतित करता है की मानव चेतना में संवेदना का नैरंतर्य बना हुआ है। यही समझ कवि को चकित नहीं होने देती । उसे मालूम है कि ‘….  चमत्कार नहीं होतीं पांडुलिपियाँ / वे बोलना-बतियाना चाहती हैं/ आदमी से।
मनुष्य की जिजीविषा का स्रोत उसकी इस लालसा में है कि वह आने वाली पीढ़ियों से संवादरत रहे । वह अपना अनुभव, अपनी स्मृतियां भविष्य की संततियों के लिए सजोता है। इसीलिए पांडुलिपियां किसी  राहुल (शोधकर्ता/उद्धारक ) के इंतजार में सदियों टपटाती  रहती हैं कि वे संततियों से संवाद करना चाहती हैं । उनकी सार्थकता संग्रहालयों में पड़े धूल फाँकते रहने में नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ी के जीवन में उतर आने में है।
यह जो आने वाली पीढ़ियों से संवाद करने कि बेचैनी है ,वह समय के अवरोध को लांघकर भविष्य में उतर आती है। मानो अतीत  वर्तमान से संवाद करता हुआ उसके कंधे पर हाथ रखे भविष्य से मिलने चला जा रहा हो।  इस गतिमानता में ही हमारी सांस्कृतिक निरंतरता बनी रहती है जीवंत और जाग्रत।  इस तरह यह कविता हमें भूत भविष्य और वर्तमान के संगम पर ला खड़ी  करती है,जहां हम भूत ,भविष्य और वर्तमान को एक साथ देख पाते हैं-  
आप पाएँगे वहां शब्दों ने  पीसकर
बराबर कर दिया है
और अब वहाँ सारा समय एक जगह इस तरह है
कि आपको लगेगा जैसे ब्रह्मसूत्र
पढ़ रहा है मुक्तिबोध को
और शाकुंतल का हिर
कुछ कह रहा है पद्मावत के तोते से
और बीजक  का कोई पद
किसी पोथी से छिटककर
मनु से  बहस कर रहा है
और रासो की कोई सबसे पुरानी प्रति
धीरे-धीरे गुनगुना रही है
किसी युवा कवि की प्रकाशित कोई कविता
मनुष्य ने अक्षर की रचना की है।  कवि का भरोसा अक्षर और अक्षर के सामर्थ्य पर  है। अक्षर उसकी प्रथम प्रतिश्रुति भी है और अंतिम भी । अक्षर और उससे बने शब्द सच्चे कवि के असल प्रेमी होते हैं । कभी केदारनाथ सिंह के कवि गुरु त्रिलोचन ने कहा था कि-मुझे अपने मरने का / थोड़ा भी दुख नहीं /मेरे मर जाने पर / शब्दों से /मेरा संबंध टूट जाएगायानि कवि का जीवन शब्दों की ही  रचना है। इसीलिए कवि का जीवन शब्दों के शरीर में बना रहता है।   अक्षरों से बने शब्दों में ही यह सामर्थ्य है  कि वह समय को पीसकर बराबर कर देते हैं । उन्हें अक्षर इसलिए कहते हैं क्योंकि वे क्षर नहीं होते, नष्ट नहीं होते नहीं। एक निहितार्थ यह भी कि अक्षर जो कि आदमी कि बनाई सृष्टि है और  यदि आदमी  की बनाई सृष्टि यानी अक्षरों की दुनिया नष्ट नहीं होती तो मनुष्य कैसे नष्ट हो सकता है? अक्षरों में तरह-तरह के सौंदर्य और तरह-तरह के विचार हैं, जिनका आपस में आमना-सामना होता रहता है, संवाद होता रहता है।  इसे ही कविता की कालातीत समकालीनता  कहा गया है।  कविता कि वह क्षमता जिससे  वह हर काल और दि में अबाध गति से विचरण करती है । ब्रह्म सूत्र और मुक्तिबोध की कविता में संवाद हो रहा है तो शाकुंतल का हिर पद्मावत के तोते से बातचीत कर रहा है । ध्यान से देखें तो हिरन और तोता  ही नहीं, शकुंतला और पद्मावती भी मिल रहे  हैं।  इस मिलने से  अभिनव सौंदर्य का सृजन होता  है । मनु की पोथी से कबीर का बीजक बहस कर रहा है।  जाहिर है यह बहस मानवता के भविष्य को सुंदर बनाने वाली मौजूदा समय की सबसे जरूरी बहस है।  रासो का युवा कवि की अप्रकाशित कविता से गुनगुनाना असल में प्रेम की निरंतरता कि कहानी तो है ही अतीत का भविष्य में भरोसा भी है। ज्ञान, सौंदर्य और प्रेम का नैरंतर्य  ही मनुष्यता मात्र का आख्यान है । अक्षरों के माध्यम से पांडुलिपियाँ इसका जयगान  करती हैं।  एक बार अक्षर लिख दिए जाएं तो वे  जीवित रहते हैं और शताब्दियों के घने जंगलों को पार करते हुए समय के वर्तमान में खड़े होते हैं।  भले ही पांडुलिपियों पर धूल का  कॉपीराइट हो गया हो, मानवद्रोही शक्तियां सतह पर छा गई हो, लेकिन पांडुलिपियों में मनुष्य के बेचैन हाथ की गर्माहट बनी रहती है और पन्नों के चोर पन्नों से निकल आती है। हाथ की गरमाहट ,हाथ की ऊष्मा कवि  केदार के लिए जीवन की ऊष्मा की  सुंदरतम अनुभूति है। केदार जी की हाथ कविता को यहाँ  याद कर लेना उचित होगा –
उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए

केदारनाथ सिंह की कविता में हाथ और हाथ की छुवन  पूरी गरमाहट और गरिमा के साथ आते हैं।  हाथ, हस्तलिपि, लिखावट यह सब केदार जी अत्यंत प्रिय शब्द हैं।  इस प्रसंग में यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हाथ का होना मनुष्य का मनुष्य होना है। हाथ ही मनुष्य को शेष जन्तु जगत से भिन्न बनाता है ।  वैसे ही जैसे कि भाषा मनुष्य को मनुष्य बनाती है।  इसलिए हाथ की गरमाहट को बचाने की चिंता मनुष्य को बचा लेने की चिंता है। यह हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती भी  है।  क्योंकि धूल का कॉपीराइट केवल पाण्डुलिपियों पर नहीं मनुष्यता पर भी हो गया है। पाण्डुलिपियों ने मनुष्यता को  इस खतरे से बचाए रखा है- किसी पेड़ की छाल
किसी नदी के कंठ
किसी जेल की दीवार
या किसी पत्थर की स्मृति में

चीन के महाकवि ली पै के उदाहरण से कविता हमें बताती है कि कई बार नदियों ने  मनुष्य के हस्तलेख को  अपने कंठ में सुरक्षित रखा है। यहीं पर कविता भारत सहित दुनिया की सभी महान संस्कृतियों के संचरण में नदियों की ऐतिहासिक भूमिका की ओर इशारा करती है।  पेड़ की छाल का इस्तेमाल तो जगजाहिर है,कभी-कभी जेल  की दीवारों ने यह भूमिका निभाई है। हाल के इतिहास को देखें तो जेल की दीवारें गांधी ,नेहरू और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के लिखावट की साक्षी होती रही हैं। जिन्हें हम पत्थर कहते और समझते हैं उन्होंने भी मानव संवेदनाओं का वहन किया है। भारत के मिथकेतिहास में सबसे पहले राम कथा हनुमान ने लिखी थी और लिखने के लिए उन्हों ने पत्थरों का ही इस्तेमाल किया था ,अशोक के शिलालेख जिसके ऐतिहासिक सबूत हैं।इस तरह हम पाते हैं कि पांडुलिपियों की चर्चा से से शुरू हुई है यह कविता मनुष्य के हाथ की कर्मशीलता , प्रेम, स्मृति-आख्यान ,ज्ञान मीमांसा से होते हुए मनुष्यता मात्र का जयगान  करती है और मानव सभ्यता के इतिहास से साक्षात्कार कराती है,जिसका एक आयाम स्त्री की चीख में छुपा हुआ है  





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