दीक्षा भूमि : आधुनिक भारत का महानतम तीर्थस्थल/सदानंद शाही
वर्धा के
हिन्दी विश्वविद्यालय में पहली अप्रैल को कार्यपरिषद की मीटिंग थी। मीटिंग के बाद
मैं नागपुर लौट आया। मेरे मन में था कि अबकी आम्बेडकर की दीक्षाभूमि अवश्य जाउंगा।
नागपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी की अध्यक्ष प्रो वीणा दाढे ने मेरे ठहरने की
व्यवस्था आई एआर आई के अतिथिगृह में करा रखी थी। दीक्षाभूमि वहां से काफी नजदीक
है।दो अप्रैल को सुबह टहलते हुए मैं दीक्षाभूमि गया।वहाँ पहुँचते ही मेरी भेंट उस विशाल पीपल(बोधि) वृक्ष
से हुई जिसके नीचे बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर ने करीब साठ
साल पहले बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी।थोडी देर मैंने इस बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर
प्रात:काल की ठण्ढी हवाओं को महसूस किया और महसूस किया बुद्ध की महाकरूणा की सुगन्ध को।फिर मैने वहां पर बने स्मारक की
परिक्रमा सी की।स्वाभाविक रूप से स्मारक बौद्ध स्तूप की तरह बनाया गया है। दीक्षा भूमि के विशाल परिसर में रोज
टहलने आने वाले लोगों की जमात वापस जा चुकी थी। इक्के दुक्के वृद्धजन वहां मौजूद
रह गये थे।पीपल की डाल से पक्षियों का समूह बार बार स्मारक के गुम्बद पर जा बैठता,मानो बोधिवृक्ष से महाकरुणा का जीवित स्पन्दन पहुँचा रहा हो।
थोडी देर घूमघामकर स्मारक के भीतर गया।भीतर फोटो खींचने की मनाही थी।मैंने चाहा कि सुरक्षाकर्मियों के पास अपना टैब और मोबाइल जमा कर दूं लेकिन उन्होंने बहुत ही अदब के साथ मना कर दिया।जाने कैसे उन्हें यह भरोसा हो गया था कि मैं निर्देश का उल्लंघन नहीं करूंगा।भीतर शान्ति और स्वच्छता के दर्शन हुए।एक तरफ अम्बेडकर के जीवन की प्रमुख घटनाओं को दर्शाते हुए चित्र प्रदर्शनी लगी थी।प्रदर्शनी में अम्बेडकर की अनेक छवियां थीं जो उनकी प्रचलित छवि से भिन्न थी।मैं उन छवियों को कैमरे में उतारना चाहता था पर सुरक्षाकर्मियों के भरोसे को तोडना मुनासिब नहीं लगा।मैं मन ही मन सोच रहा था कि आज की राजनीति में अम्बेडकर की मनचाही छवियां गढने की कोशिश की जा रही है जबकि उनकी छवि निरन्तर विकासमान रही है।अम्बेडकर की छवि यात्रा का गहरा सम्बन्ध उनकी जीवन यात्रा से है। अम्बेडकर की जीवन यात्रा से काटकर उनकी कोई भी छवि चालू राजनीति के काम भले आ जाय मनुष्यता की भलाई के काम नहीं आ सकती।
अम्बेडकर की राजनीति और उनके जीवन की सबसे बडी ताकत उनके द्वारा उठाये बुनियादी सवाल हैं।खास तौर से हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज की महानता और कुलीनता को लेकर।चालू राजनीति जब ऐसे किसी व्यक्तित्व की छवि गढती है तो सवालों को परे छोड कर मनचाहे कार्यों और वक्तव्यों का चयन कर लेती है।
बहरहाल अभी मेरा उद्देश्य अम्बेडकर का सही सही पोट्रेट बनाना नहीं है।इसकी काबिलियत भी नहीं है मेरे पास।मेरा इरादा तो अम्बेडकर के बौद्ध धर्म स्वीकार करने पर ही विचार करना है।अम्बेडकर ने सन पैंतीस-छत्तीस में ही तय किया था कि वे हिन्दू पैदा जरूर हुए हैं लेकिन हिन्दू मरेंगे नहीं।वे किसी अन्य धर्म को स्वीकार करेंगे। इसकी सबसे बडी वजह अम्बेडकर का यह एहसास था कि -"हमने हिन्दू समाज में समानता का दरजा हासिल करने के लिए हर तरह की कोशिशें की और सत्याग्रह किये,परन्तु सब बेकार।हिन्दू समाज में समानता के लिये कोई स्थान नहीं है"।ध्यान रहे कि अम्बेडकर और गांधी के बीच बुनियादी मतभेद इसी बिन्दु पर था।गाँधी को भरोसा था कि वे अपनी उदात्त सोच से हिन्दू समाज का हृदय बदल देंगे और दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म कर देंगे।जबकि अम्बेडकर जानते थे कि ऐसा असंभव है।इतिहास ने अम्बेडकर को सही साबित किया।
निर्णय लेने के करीब बीस साल बाद अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म का परित्याग किया और अपने लाखों अनुयायियों के साथ २४ अक्टूबर १९५६ को इसी दीक्षा भूमि में बौद्ध धर्म स्वीकार किया।अम्बेडकर के इस धर्मपरिवर्तन को मैं हिन्दुस्तान की महान घटना मानता हूँ,क्योंकि यह महज धर्म परिवर्तन नहीं संकीर्ण हिन्दू धर्म का परित्याग था,अन्य वैकल्पिक धर्मों की सीमाओं का रेखांकन था ,दलित समुदाय के लिए ही नहीं असमानता और भेदभाव झेल रहे असंख्य हिन्दुओं के लिए मुक्तिमार्ग भी था।अम्बेडकर ने बुद्ध धर्म को स्वीकार किया इसके पीछे सबसे बडा कारण था बौद्ध धर्म की तार्किकता।बुद्ध के 'अप्प दीपो भव' सन्देश ने अम्बेडकर को सबसे ज्यादा आकृष्ट किया।चमत्कार का इन्तजार करते रहने वाले इस देश में अप्प दीपो भव से बडा सन्देश कुछ हो नहीं सकता।अन्धविश्वासों,अफवाहों ,चमत्कारों के जादुई असर में बने रहने वाले लोगों को यह भूमि अपने भीतर के प्रकाश को पहचानने का विवेक देती है। इसीलिए इस महान घटना की साक्षी रही यह दीक्षाभूमि आधुनिक भारत का महानतम तीर्थ है। इसे सलाम।

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