मंगलवार, 12 मई 2020

भोजपुरी का पूछनिहार कौन है?/सदानन्द शाही




सोलहवीं लोकसभा के चुनाव से   सत्रहवीं लोक सभा का चुनाव कई मामलों में काफी अलग है।इसमें क्षेत्रीय भाषाओं और विशेष रूप से भोजपुरी  का सवाल सिरे से गायब है।जबकि पिछले चुनाव के दौरान भोजपुरी का सवाल यहां वहां चुनाव के  वातावरण में तैर रहा था। इसकी सबसे बडी़ वजह यह थी कि  तब प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार होकर उभरे और आज के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी,  जिन्होंने अपने कौशल से उस चुनाव अभियान को बाकायदा युद्ध में बदल दिया थापिछले चुनावों में    भोजपुरी इलाकों में अपने भाषणों की शुरुआत भोजपुरी अभिवादनों से कर रहे थे।उनके इन भोजपुरी अभिवादनों  /संबोधनों को भोजपुरी भाषी लोगों ने    बहुत उम्मीद और उत्साह से देखा सुना । लगभग आजादी के समय से ही भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की उठने वाली मांग को उम्मीदों के पर लग गये थे।लग रहा था कि श्री मोदी के नेतृत्व में सरकार बनते ही भोजपुरिया लोगों की आस पूरी हो जायेगी। यह आस इतनी बलवती थी कि  भोजपुरी  के लिए काम करने वाली सँस्थाओं ने भी जहां तहां यह  कहना  शुरू कर दिया कि 'मोदी पीएम बनिहें त भोजपुरी आठवीं अनुसूची में आयी'!यद्यपि श्री मोदी ने न तो स्वयं कभी ऐसी बात कही और न ही कहीं उनके चुनावी घोषणा पत्र में ऐसी कोई बात थी। लेकिन उस माहौल में  ऐसा पढ़ने और समझने की कई वजहें मौजूद थीं।  एक तो बाजपेयी सरकार में मैथिली सहित चार भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह दी गई थी ,जिससे यह भाव ग्रहण करना स्वाभाविक था कि भारतीय जनता पार्टी जनपदीय  भाषाओं की हिमायती है और जरूर वह भोजपुरी जैसी  भाषा, जिसके बोलने बरतने वालों की संख्या पच्चीस करोड़ के आसपास है तथा  जिसका विस्तार भारत और भारत से बाहर कई देशों में है,को मान्यता देगी। इस पर विश्वास करने की दूसरी वजह यह थी कि  चुनाव अभियान में बहुतेरे भोजपुरी गायकों कलाकारों की सक्रिय भागीदारी इस उम्मीद को जगा रही थी।पिछले चुनाव के दौरान बिहार में कई मौकों पर भारतीय जनता पार्टी के श्री रविशंकर प्रसाद जैसे दिग्गज नेताओं की उपस्थिति में यह बात मंच से  कही गयी और अखबारों की सुर्खी बनी।  भोजपुरी इलाके में भाजपा को मिली भारी सफलता के पीछे कहीं न कहीं इस  उम्मीद कि भी भूमिका  थी।सरकार बनने के बाद  श्री राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर भोजपुरिया के गृहमंत्री बनने पर यह उम्मीद विश्वास में बदल गयी। भोजपुरी से जुडे़ बहुतेरे संगठन गृहमंत्री से मिलते रहे और उन्हें भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने संबंधी  मांगपत्र देकर और आश्वासन प्राप्त कर अभिभूत होते रहे। एक समय ऐसा आया जब लगा कि  यह मांग  अब पूरी हुई कि तब पूरी हुई ।  उत्तर प्रदेश में विधान सभा  चुनावों के ठीक पहले लखनऊ  के शकुन्तला मिश्र विश्वविद्यालय में भोजपुरी अध्ययन केन्द्र का उद्घाटन करते हुए गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह ने लगभग घोषणा ही कर दी कि हम भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता देने जा रहे हैं।उन्होंने यह भी कहा कि इस बारे में प्रधानमंत्री से बात हो चुकी है।भोजपुरी जनता बम-बम थी।इसी पृष्ठभूमि में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव हुए।एक बार फिर भोजपुरी इलाके ने झार के भाजपा का समर्थन किया।उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनीं और श्री आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हुए।चूंकि सांसद रहते हुए श्री आदित्यनाथ संसद में और संसद से बाहर कई बार भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठा चुके थे, इसलिए उनके उत्तर प्रदेश जैसे राज्य का मुखिया होने से उम्मीद  को बल मिला। बिहार में श्री  नितीश कुमार जब राजद के सहयोग से मुख्यमंत्री बने थे तब उनके प्रमुख सचिव ने बाकायदा केन्द्र सरकार को पत्र  लिखकर बिहार सरकार की ओर से   भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव  दिया‌। थोड़े दिन में श्री नितीश कुमार भी एनडीए का हिस्सा बन गये‌ । ऐसे में जबकि  उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों राज्यों  जिनकी लगभग आधी आबादी भोजपुरिया है,के मुख्यमंत्री न केवल भोजपुरी के पक्षकार हों बल्कि उसी राजनीतिक समूह के हिस्सा भी  हों जो  केन्द्र में सत्तारूढ़  हो भोजपुरी की उम्मीद को  सातवें आसमान पर पहुंचना ही था। लेकिन सातवें   आसमान  में  पहुंचकर जैसे भोजपुरी के पतंग की डोर ही  अचानक कट गयी । बात ठंडे बस्ते में चली गयी।  आज जब सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव  धीरे-धीरे आखिरी चरणों में  पहुंच गया है और भोजपुरी हार्टलैंड -पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा  पश्चिमी बिहार के उन जिलों में जहां भोजपुरी भाषियों की संख्या करोड़ों में है ,मतदान एकदम सामने है और भोजपुरी का कोई नाम लेवा नहीं है।प्रधानमंत्री भी कहीं भोजपुरी में अभिवादन करते नहीं सुने गये।  भोजपुरी भावना को सहलाने के लिए  इस चुनाव  में भोजपुरी के कुछ और गायक कलाकार  मैदान में उतारे गये  हैं ।ध्यान दें तो वे भोजपुरी के ऐसे ही   कलाकार हैं जिनकी पहचान  भोजपुरी की  छवि को विकृत करने की रही है। इन्हें भोजपुरी संस्कृति के प्रतीक  या प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तावित करना  भोजपुरी  के साथ छल है।बेशक इसके लिए किसी एक राजनीतिक दल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।  इन कलाकारों का इतिहास देखें पता चलेगा कि अलग अलग समय में सभी दलों ने राजनीतिक बढ़त के लिए इनका उपयोग किया है और इन कलाकारों ने अपना उपयोग होने दिया है। राजनीतिक हलके में हम आए दिन इस दोमुहेपन का सामना करते हैं। एक तरफ भोजपुरी की फूहड़ छवि का लाभ उठाना और दूसरी ओर उसे फूहड़ भाषा करार देना । इसलिए भोजपुरी समाज  को अपनी छवि बदलनी होगी ।    ध्यान रहे कि  भोजपुरी का सवाल केवल   भाषा का सवाल नहीं  है। भाषा से  कहीं ज्यादा यह  आर्थिक- सामाजिक सवाल है।भोजपुरी इलाके की भूमि भी शस्य श्यामला है़ं,नदियों का संजाल है,एक से एक पवित्र नदियां हैं,प्राकृतिक संसाधन हैं फिर भी भोजपुरी क्षेत्र की अर्थ रचना ऐसी है कि यहां के लोग जीवन यापन के लिए प्राय: प्रवासन पर निर्भर हैं। यह प्रवासन   आंतरिक और बाहरी दोनों तरह का  है।गिरमिटिया प्रथा शुरू हुई तो सबसे ज्यादा शर्तबंद मजदूर यहीं से गये।ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने से  कोलकाता की ओर मजदूर के रूप में हुए  प्रवासन में यही इलाका आगे था।आज भी  देश के भीतर मुंबई ,चेन्नई,हैदराबाद ,त्रिवेन्द्रम  से लेकर पंजाब तक और देश से बाहर खास तौर से खाडी देशों को होने वाला प्रवासन इसी इलाके से होता है।इसलिए भोजपुरी का सवाल महज भाषा का सवाल नहीं है उससे बढ़कर है।आश्चर्य है कि इस ओर किसी नेता या राजनीतिक दल का ध्यान नहीं है ।  भोजपुरी क्षेत्र  सदियों  से अपने अभाव और व्यथाओं को निर्गुण के उदात्त में ढ़ाल कर मस्त  मलंग रहता आया है। खेद है कि भोजपुरी और भोजपुरिया का पुछनिहार कोई नहीं है।न सत्ता न विपक्ष। समय-समय पर भोजपुरी अलंग को अलग अलग प्रतीकों के सहारे  भरमाया जरूर गया है। सत्रहवीं लोक सभा के चुनाव में भी यह सिलसिला जारी है।

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