बुधवार, 13 मई 2020

सर्चलाइट के आलोक में खुद को आँकने का उचित समय / सदानंद शाही




भोजपुरी अध्ययन केंद्र के इस आयोजन में आप सबका स्वागत कराते हुये मुझे बेहद खुशी हो रही है । कई बार लोग कहते हैं कि भोजपुरी केंद्र चलता कैसे है? क्योंकि साधन की दृष्टि से और समय की दृष्टि से भी यह विवि का सबसे छोटा केंद्र है; लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि विश्व विद्यालय के संस्थापक और स्वप्नदर्शियों  के हृदय के सबसे करीब है । भारतीय भाषाओं को लेकर उनके विचारों को आप सब जानते हैं यही हमारा संबल है और यही हमारी थाती है ।
 काशी हिन्दू विश्व विद्यालय की स्थापना के अवसर पर हुये समारोह के तीसरे दिन 6 फरवरी 1916 को   महात्मा गांधी ने जो  व्याख्यान दिया था वह भारत की राजनीति का मुस्तकबिल बदलने वाला सिद्ध हुआ ।  आज इस व्याख्यान के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं ।
काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के भव्य  स्थापना समारोह में गांधी का व्याख्यान एकदम नयी जमीन से दिया जा रहा था । भारतीय राजनीति के आकाश में नये  सूर्योदय की घोषणा हो रही थी  । वायसराय जा चुके थे लेकिन उनके आगमन से उपजा भारीपन शहर में मौजूद था । मंच पर राजे महराजे भव्य परिधान में उपस्थित थे । राजा दरभंगा सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे । सभा में एनी बेसेंट मौजूद थीं । गांधी ने अपने  भाषण में इतने बुनियादी मुद्दों को उठाया कि भव्य और आलंकारिक विधान असहज हो गए । गांधी के भाषण से चमकते अंधेरे से थिराये हुये दिमाग हिल उठे । राजे महाराजे एक एक कर मंच छोड़कर जाने लगे । एनी बेसेंट तक ने गांधी से चुप होने या इसे बंद करने के लिए कहा ।  सभाध्यक्ष दरभंगा महाराज मंच छोड़ चले गए । एनी बेसेंट मंच छोड़ चली गयीं। अंतत:गांधी को अपना भाषण अधूरा छोड़ देना पड़ा । कभी- कभी मुझे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना समारोह का वह दृश्य राष्ट्रीय रूपक की तरह लगता है । राजे महाराजे सिर्फ समारोह के मंच से नहीं जा रहे थे ;बल्कि देश के राजनीतिक मंच से भी उनकी विदाई हो रही थी । खास बात यह कि  महामना मदन मोहन मालवीय अप्रिय स्थिति के बावजूद अंत तक बने रहे, मंच पर ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति में भी । 
आखिर  इस अधूरे भाषण में ऐसा क्या था ,जिसने इतने मान्य महानुभावों को  विचलित कर दिया था ?गांधी के उस अधूरे भाषण में एक नए बन रहे विश्व विद्यालय के लिए क्या संदेश था ? और खास तौर से आज जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अपने सौ वर्ष पूरे कर चुका है , क्या यह भाषण कोई अर्थ संकेत देता है ? आज हम इसी पर विचार करने जा रहे हैं ।
मित्रो ! उत्तराधिकारी होना बहुत मुश्किल होता है, खास तौर से तब जब वैचारिक सम्पदा का उत्तराधिकार सभालना हो । भौतिक सम्पदा का उत्तराधिकारी होना मुश्किल नहीं है । वैसे भी भौतिक संपदा के अलग से दावेदार भी पैदा हो जाते हैं लेकिन वैचारिक सम्पदा कई बार अनाथ सी हो जाती है ।  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना महज एक विश्वविद्यालय की  स्थापना नहीं थी । अंग्रेज़ सरकार ने पहले भी अनेक विश्वविद्यालय स्थापित कर रखे थे । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना  स्वाधीन चेतना के विचार  की स्थापना थी  ,एक नए राष्ट्र निर्माण का  सपने का जमीन पर उतर रहा  था ।असंभव समझा जाने वाला  प्रतीचि और प्राची का सुंदर मेल हो रहा था ।   यह  शिक्षित मस्तिष्क  और प्रशिक्षित हाथ तैयार करने के संकल्प की स्थापना थी ।
गांधी ने अपने भाषण में जो बुनियादी सवाल उठाए वे इस प्रकार हैं
1-  (यदि आप एक क्षण के लिए भी यह समझते हैं कि )आध्यात्मिक जीवन जिसके लिए यह देश सुविख्यात है और जिस क्षेत्र में उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं ,केवल जबानी बताया जा सकता है तो  विश्वास कीजिए आप गलत हैं । आप केवल जबान से यह संदेश नहीं दे सकेंगे कि भारत एक दिन विश्व का उद्धारक बनेगा ।  .......मैं आपसे कहना चाहूँगा कि भाषणों कि उपयोगिता अब लगभग खत्म हो चुकी है ।
2-  हमारी भाषाएँ हमारा प्रतिबिंब हैं और यदि आप कहते हैं कि हमारी भाषाएँ इतनी समृद्ध नहीं हैं कि सर्वोत्तम विचारों को अभिव्यक्त कर सकें तो इसके बजाय यह कहिए कि जितनी जल्दी हमारा अस्तित्व मिट जाय उतना ही अच्छा है । .......मान लीजिये कि पिछले पचास वर्षों से हम अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा प्रपट कर रहे होते तो हमारे पास क्या होता ?आज भारत स्वतंत्र होता ,हमारे पास ऐसे  शिक्षित व्यक्ति होते, जो अपने ही देश में विदेशी जैसे न लगते ,बल्कि देश के हृदय से उनका संवाद होता।  
3-  यदि  हमारे मंदिर ही खुलेपन और स्वच्छता के आदर्श न हों तो हमारा स्वशासन कैसा होगा ?
4-  भारत कि मुक्ति तब तक नहीं हो सकती जब तक आप लोग इन बहुमूल्य आभूषणोंकों उतारकर अपने गरीब देशवासियों कि अमानत के रूप में नहीं रख देते ।
5-  मैं भारत को दोनों ओर के संदेहों से युक्त वावरण से  मुक्त कराना चाहता हूँ । यदि हमें अपने लक्षय प्रपट करने हैं ,हमारे पास ऐसा संदेह होना चाहिए ,जो परस्परिक प्रेम और विश्वास पर आधारित हो ।
6-  भारत आने के बाद चापलूसी और झूठ का जो वातावरण उन्हें (अंग्रेज़ अधिकारियों को )घेर लेता है ,वह उन्हें भ्रष्ट बना देता है जाइसकी वह हममे से किसी को भी बना देता है। कभी कभी स्वयं पर दोष ले लेना अच्छा होता है ।
ये बातें इतनी साधारण लगती हैं कि इन्हें कहना आवश्यक ही नहीं लगता और सुनना शायद समय का अपव्यय ।  इस व्याख्यान मैं ऐसी कोई बात नहीं है जिसे हम जानते न हों ,लेकिन गांधी केवल जानने कि बात नहीं कर रहे थे ,वे मनाने और बरतने कि बात कर रहे थे । ऐसा लगता  है कि यह बरतने वाली बात ही चुभ गयी होगी । ऊंचे आदर्शों को बघारने से हमें परेशानी नहीं होती परेशानी होती है उन्हें आचरण में उतारने से ।
गांधी जब कहते हैं कि मैं भाषणों से तंग आ चुका हूँ तो वे कबीर कि याद दिलाते हैं –बोलना का कहिए रे भाई ,बोलत बोलत तत्व नसाई । 
दरअसल गांधी छात्रों को आत्ममुग्धता से ऊपर उठकर आत्मलोची  और स्वतंत्र चेता बनाना चाहते थे । सौ वर्ष पूरे होने पर हम सब जो इस महान विश्वविद्यालय के वारिस हैं,उनके लिए गौरव का क्षण तो है ही सिंहावलोकन का समय भी है । कि हमने अपने महान संस्थापक के  सपनों और संकल्पों को किस हद तक मूर्त किया है ,कि हमने अपने महान संस्थापक के विचारों की  विरासत को किस हद तक सभाला  और विकसित किया है । गांधी का अधूरा भाषण इसके लिए एक निकष तो देता ही है वह एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत की उपलब्धियों को जाँचने का पैमाना भी हो सकता है । गांधी ने अपने इस भाषण में कहा था कि मैं सर्चलाइट को अपनी ओर निर्देशित करता हूँ ।शताब्दी वर्ष   अपनी उपलब्धियों और योग्यता को इस सर्चलाइट के आलोक में खुद को आँकने  का उचित समय है  ।
मुझे खुशी है कि इस चुनौती के अवसर पर हमारे साथ प्रो सुधीर चन्द्र जैसा दृष्टि सम्पन्न इतिहासकार है ,प्रो राजीव संगल जैसा व्यावहारिक गांधीवादी है और आप सब हैं । इस विचार सत्र में आप सबका स्वागत है ।
(महात्मा गांधी के अधूरे व्याख्यान के सौ वर्ष पर आयोजित विचार सत्रह में स्वागत भाषण। +विश्वविद्यालय   का शिलान्यास 4 फरवरी 1916 को हुआ था ,इसलिए मान लिया जाता है कि  व्याख्यान भी  चार फरवरी 1916 को ही हुआ होगा । हाल ही में युवा शोधकर्ता समीर पाठक ने गहन छानबीन करके यह बताया  कि यह व्याख्यान 6 फरवरी 1916 को हुआ था ।)

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