सोमवार, 6 जुलाई 2020

व्याख्यान: भारतीय साहित्य में पुनर्नवता के लिए तुलनात्मक साहित्य


·         मैं यहां बोलने का अधिकारी  नहीं हूं। इस पाठ्यक्रम के समन्वयक प्रो वसिष्ठ नारायण त्रिपाठी ने प्रेम वश बुला लिया है।  आप जानते ही हैं कि प्रेम बहुत पजेसिव होता है  और वह भी त्रिपाठी जी का । एक तरह  की तानाशाही है,जिसके आगे विवश हूँ और आपके सामने हूँ।   मैं  यह बात विनम्रता के नाते नहीं  नहीं ,सचमुच कह रहा हूं।  पिछले कुछ वर्षों से मैं विश्वविद्यालय के एक नये विद्या  केंद्र –भोजपुरी अध्ययन केंद्र - के लिए काम कर रहा हूं।  इस समय सबसे बड़ी जरूरत केंद्र के लिए संसाधन जुटाना है । एकदम भिन्न तरह के काम में लगा हूं । पिछले एक-डेढ़ महीने से 12 वीं योजना के लिए प्रस्ताव तैयार करने और भोजपुरी अध्ययन केंद्र का पाठ्यक्रम तैयार करने में जुटा हूँ । इस तरह देखें तो  साहित्य की दुनिया से लगभग बाहर हूं । इसीलिए मैंने कहा कि तुलनात्मक साहित्य पर बोलने का और वह भी आप जैसे विद्वान अध्यापकों के बीच कुछ नया कह सकूँ ,यह काबिलियत नहीं है मेरे पास। लेकिन जैसा कि ग़ालिब कहते हैं-गो वां  के नहीं वां के निकाले हुए तो हैं तो साहित्य से इतना रिश्ता तो जरूर है और इसी रिश्ते से कुछ बातें साझा करूंगा । मैंने साझा शब्द का उपयोग सोच समझकर किया है।  जो निकाले हुए नहीं हैं, जो बाकायदा नागरिक हैं, वे जैसे भी हैं नागरिक हैं, उन्हें अलग से अपने को प्रमाणित करने की जरूरत नहीं है। पर जो निकाले हुए हैं उन्हें बार-बार अपने को प्रमाणित करना पड़ता है।  जैसे एन आर आई लोगों को प्रमाणित करना होता है।  भारत सरकार ने उन्हें अलग से नागरिकता प्रदान कर दी है,वैसे ही  जैसे प्रो त्रिपाठी   ने मुझे प्रदान कर दी है । यह सहज नागरिकता नहीं है प्रदान की गई नागरिकता है।  तो जो सहज नहीं है, जो निकाला गया है, जिसे अपने को बार-बार प्रमाणित करने की जरूरत पड़ती है, उसके पास कुछ दुख होते हैं और आप सुख भले साझा न करें दुख तो साझा करना पड़ता है।  कहते कछु दुख कम हो तो यहाँ बोलने के लिए साहित्य के जो बाकायदा नागरिक आपके पास आएंगे या आए हैं मैं उनसे कुछ अलग  बातें करूंगा। तुलनात्मक  साहित्य पर चर्चा हो रही है।  इसका एक सुखद पहलू तो यही दिखाई दे रहा है कि हिंदी और तेलुगु दोनों के आचार्य  में लगे हुए हैं।  वरना हमारे यहां भाषाओं के इतने विभाग हैं और उनमें कहीं कुछ साझा होता दिखाई नहीं देता।  भाषाओं का, साहित्य का सरोकार ही संवाद है। पर  सब अलग-अलग अपने अपने डिपार्ट्मेंटलिज़्म में या कह लीजिए कंपार्टमेंटलिज़्म में कैद हैं।
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                       जैसा कि हम सब जानते हैं तुलनात्मक साहित्य की चर्चा  पश्चिम से आई है।  साहित्य में ही नहीं, समाज विज्ञान में भी,प्राय: सभी प्रश्न पश्चिम से  आते हैं, जिन पर हम विचार करते हैं। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है।  मैं जिस विश्व विद्यालय का छात्र रहा हूं, गोरखपुर विश्वविद्यालय का उसका ध्येय वाक्य ही  है- आनो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वत:’, अच्छे विचार, सुविचार जहां से भी आए उनका स्वागत है। तुलनात्मक साहित्य पश्चिम का विचार है।  सबसे पहले इसका प्रयोग मैथ्यू अर्नाल्ड ने किया था। मैथ्यू अर्नाल्ड ने फ्रांस में रहने वाले अपने किसी मित्र को पत्र लिखते हुए पहली बार कंपैरेटिव लिटरेचर शब्द युग्म का प्रयोग किया था।  रोमांटिक युग  के कवि आलोचक थे  मैथ्यू अर्नाल्ड।  और जैसा कि रोमांटिक युग में एक तरह का आदर्शवाद होता है, औदात्य होता है उनमें भी था।  यूरोप हमको यहां से भले एक इकाई लगता हो, आप जानते हैं यूरोप कोई एक इकाई नहीं था।  अंग्रेज , फ्रांसीसी ,जर्मन इटालियन, कितनी भाषाएं, कितने तरह के लोग। उनके बीच प्रतिद्वंद्विताएं भी थीं।  सबका अपना-अपना इतिहास, अपने-अपने इतिहास पर  गर्व।  आप जानते हैं, फ्रांसीसी अपने को सबसे उन्नत मानते हैं।  अंग्रेजों की होड़ लगी रहती थी उनसे। मैथ्यू अर्नाल्ड ने इस प्रतिद्वंदिता और प्रतिस्पर्धा के बीच तुलनात्मक साहित्य की चर्चा की । हमें अपने साहित्यों  की आपस में तुलना करनी चाहिए।  तुलना कर के आसपास रख कर के देखना चाहिए । यूरोप में एक दूसरे के घर में देखने की खिड़की के रूप में कंपैरेटिव लिटरेचर का विचार आया और इस पर खूब काम भी हुआ।  कंपैरेटिव लिटरेचर आलोचना की कोई विधा नहीं है, यह मूल्य निर्णय का कोई प्रतिमान नहीं देता, यह शोध का भी क्षेत्र नहीं है, हालांकि इसमें शोध और आलोचना दोनों के ही तत्व हैं।  यह दो साहित्यों  को आसपास रखकर देखने का प्रस्ताव करने वाला विचार है।  मुक्तिबोध की कविता है- मालव निर्झर की झर झर कंचन रेखा’[, आपके ध्यान में होगी।  दो झरने हैं, आसपास हैं, दोनों का अपना सौंदर्य है, दोनों का अपना जादू है।  तुलनात्मक साहित्य ने  दो झरनों  के सौंदर्य को आसपास, आमने सामने रखकर देखने का प्रस्ताव किया।  यह उस समय के यूरोप की जरूरत थी।  इस पर खूब काम हुआ।  अब धीमा पड़ गया है।  यूरोप में अब उतना भेद भी नहीं रह गया है।  यूरोपीय संघ बन गया है।  एक ही वीजा से आप यूरोप के सभी देशों की यात्रा कर सकते हैं।  पर भारतीय साहित्य में इसकी जरूरत है और इसका उपयोग किया जाना चाहिए।  भारत में शताधिक  भाषाएं हैं ? बाईस चौबीस तो संविधान में स्वीकृत भाषाएं हैं। इतनी ही संविधान में आने का प्रयास कर रही हैं । उनका समृद्ध साहित्य है।  सैकड़ों भाषाएं अपनी अपनी जगह कुल बुला रही हैं । लो भाषाएं हैं, आदिवासी भाषाएं हैं, उनका अपना साहित्य है, उनका अपना सौन्दर्य  है।  तुलनात्मक साहित्य अध्ययन हमें इस बहुविधि सौंदर्य को देखने की दृष्टि से देता है।
·          आजादी के बाद राष्ट्रीय एकता की परिकल्पना में हमने एकता में सौन्दर्य  के दर्शन किए । इस क्रम में हमने भारतीय साहित्य की विशेषताएं देखीं।  उन्हें निरूपित करने की कोशिश की।  साहित्य अकादमी का ध्येय वाक्य है  - Indian Literature is one written in many languages.   भारतीय साहित्य की राधाकृष्णन  द्वारा दी गई परिभाषा है । पर यह पूरी नहीं है।  मित्रो! परिभाषा की एक दिक्कत यह होती है कि वह पूरी नहीं हो पाती । भारतीय साहित्य की इस परिभाषा में  एकता पर जोर है।  एकता पर जोर देने के कारण विशिष्टता पर ध्यान नहीं जाता और मित्रो सौंदर्य तो वैशिष्ठ्य  में निहित है । हिन्दी कवि  बिहारीलाल का एक दोहा है-
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·         अनियारे दीरघ दृगनी किति न तरुनि समान
·         वे चितवनि औरे  कछु जेहि  बस होत सुजान ॥
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·         एकता बड़ी-बड़ी, गोल-गोल सुंदर  आंखों की तरह है । उसकी कोई कमी नहीं है।  पर वैशिष्ट्य उस चितवनि में है । तो देखना यह चाहिए कि एकता की बड़ी आंखों के चक्कर में हम कहीं उस विशिष्ट चितवनि या  बांकपन से वंचित तो नहीं हो जा रहे हैं।  इसीलिए ड़िया के कवि सीताकांत महापात्र ने अपने किसी व्याख्यान में कहा था- ‘Indian literature is one ,of course , but at the same time it is many written in many languages’ .     राधाकृष्णन की परिभाषा से जो बात छूट रही थी, सीताकांत महापात्र उसे जोड़ रहे हैं।  सारी भारतीय भाषाओं की साहित्यिक पहचान विशिष्ट है और भिन्न  है । भारतीय साहित्य बहुवर्णी  है । इस बहुवर्णी पन को समझने की जरूरत है । भारतीय साहित्य को समझने के लिए ,भारतीयत को समझने के लिए एकता के साथ उसमें निहित विशिष्टता को समझना आवश्यक है । इसके लिए तुलनात्मक साहित्य पद्धति उपयोगी होगी । भारतीय संदर्भ में तुलनात्मक साहित्य पद्धति के उपयोग से हम भारतीय साहित्य को भिन्न-भिन्न भारतीय भाषाओं के संदर्भ में बेहतर समझ सकेंगे । गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है- उपजहिं अनत अनत छवि लहहीं।  इसलिए तुलनात्मक साहित्य का यूरोप में जो भी अर्थ रहा हो, जिन परिस्थितियों में इसने जो  भूमिका निभाई हो, भारतीय साहित्य के संदर्भ में इसकी भूमिका और प्रकृति अलग होगी और होनी चाहिए। भारतीय संदर्भ में हमें इसकी अलग प्रविधि विकसित करनी होगी । हमारा अपना समृद्ध काव्यशास्त्र है ,अलंकारशास्त्र हैं ,हमारी भाषाएँ और इका विपुल साहित्य है जिसके माध्यम से हम तुलनात्मक साहित्य अपने ढंग से विकसित कर सकते हैं। s
·         भाषाओं  के इस महादेश में यह तो संभव नहीं है कि कोई आदमी सभी भाषाएं सीख ले और सबके साहित्य का अध्ययन करे।  इसलिए मुझे लगता है कि तुलनात्मक साहित्य का रास्ता अनुवाद से होकर गुजरता है । तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन अनुवाद साहित्य को विकसित करेगा।  अनुवाद की इतनी दिशाएं हैं, इतनी संभावनाएं हैं - विदेशी भाषाओं से भारतीय भाषाओं में, भारतीय भाषाओं में आपस में, लोक भाषाओं ,आदिवासी भाषाओं में अनुवाद की प्रक्रिया जितनी ही गतिमान होगी तुलनात्मक साहित्य उतना ही प्रभावी और उपयोगी होगा । अभी कल हमारे यहां एक किताब का लोकार्पण हुआ।  अवधेश प्रधान ने मेघदूत का भोजपुरी में अनुवाद किया है।  इससे कालिदास की, संस्कृत की सौन्दर्य चेतना और सौन्दर्य दृष्टि का तो पता मिलता ही है,स्वयं  भोजपुरी भाषा के सौंदर्य का पता चलता है। यह प्रक्रिया जितनी तेज होगी परिणाम उतना ही शुभ होगा।  इस संदर्भ में आखिर में हम सिर्फ एक बात की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करेंगे । आचार्य क्षितिमोहन सेन (अमर्त्य सेन के बाबा) यहां बनारस में पढ़ते थे।  श्यामसुंदर दास के सहपाठी थे उन्होंने कबीर का और अन्य संतों का साहित्य संकलित किया और उनका बांग्ला अनुवाद किया। इस अनुवाद के माध्यम से  टैगोर संत साहित्य से  परिचित हुए। उसमें से चुनकर  टैगोर ने कबीर के सौ पदों का  अनुवाद किया। इस अनुवाद के माध्यम से  कबीर सारी दुनिया में जाने गए। ध्यान से देखें तो टैगोर की कविता में कबीर उपस्थित है । तो यह जो परस्परता है, वह दोनों भाषाओं के लिए शुभ है।  हजारी प्रसाद द्विवेदी का उपन्यास है-पुनर्नवा । पुनर्नवा एक बूटी होती है, जिसमें नया करने की सामर्थ्य  होती है।  यह जो तुलनात्मक साहित्य है,इसमें भी पुनर्नवा करने की सामर्थ्य है । हम केवल प्रोन्नति के लिए नहीं; बल्कि अपनी भाषा और अपने साहित्य को पुनर्नवा करने के लिए इस पद्धति का उपयोग करें । आरंभ में मैं जिस  दुख की चर्चा कर रहा था-  जिस तरह भाषा विभागों में एक तरह का अबोलापन  है - वह टूटेगा। विविध भाषाएँ एक दूसरे के निकट आएंगी  और यह निकटता भारतीय साहित्य में एक तरह की पुनर्नवता लाएगी। धन्यवाद ।
·         ( कला संकाय ,काशी हिन्दू विश्व विद्यालय द्वारा तुलनात्मक साहित्य पर आयोजित पुनश्चर्या पाठ्यक्रम 16 फरवरी -7 मार्च 2012 में दिया गया व्याख्यान )  

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