एक कप काफ़ी की पेशकश और भला शुक्रवार सदानन्द शाही
कभी-कभी अख़बारों में छपी छोटी खबरें भी सुकून दे जाती हैं।पिछले शनिवार हिन्दुस्तान अख़बार में दो छोटी-छोटी खबरें एक साथ छपी हैं । जैसा कि आम तौर पर होता है दोनो खबरें राजनेताओें के बयान से बनीं हैं । लेकिन ख़ास यह है कि ये बयान राजनीति के चालू मुहावरे से बिल्कुल अलग हैं।पहली खबर है - ‘केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को कहा कि मौजूदा राजनीतिक विमर्श में सौहार्द की कमी हो गई है और वह अपने किसी प्रतिद्वंद्वी को एक कप काफ़ी की पेशकश करने की कल्पना नहीं कर सकती ’। वे मुंबई में किसी किताब के विमोचन के मौक़े पर बोल रहीं थीं ।इस खबर के ठीक नीचे शरद पवार का बयान छपा है । ‘राकांपा प्रमुख शरद पवार ने शुक्रवार को कहा कि देश में आज एक अलग तरह की स्थिति बनी हुई है,जो चिंता का विषय है।राष्ट्र को मज़बूत करने व समाज में नफ़रत के भाव को ख़त्म करने के लिए राजनीतिक विचारधाराओं से उपर उठकर एकजुट होने की ज़रूरत है’। दोनों खबरों में एक तरह की संगति दिखाई दे रही है।एक सौहार्द की कमी महसूस कर रहा है तो दूसरे को नफ़रत का भाव दिख रहा है जिसे ख़त्म करने के लिए राजनीति से उपर उठने की बात कर रहा है।दोनों राजनेता प्रकारान्तर से एक ही सामाजिक स्थिति की ओर इशारा कर रहे हैं ।ऐसा लग रहा है जैसे दोनों नेताओं ने कहीं बैठकर काफ़ी पी हो और इस मुद्दे पर आपसी मशविरे के बाद बयान दिया हो।वैसे तो नेतागण एक दूसरे को अभियुक्त साबित करने वाले या फिर अपनी भली छवि बनाने वाले बयान देते रहते हैं। यदि मामला पक्ष और विपक्ष का हो तो खुद को नायक और दूसरे को विलेन के रूप में पेश करने की कोशिश रहती है।लेकिन यहाँ सत्ता और विपक्ष के दो क़द्दावर नेता एक अवांछित सामाजिक सचाई पर टिप्पणी कर रहे हैं ।
निर्मला सीतारमण भारत सरकार में हैं और तीसरे चौथे नम्बर की क़द्दावर केन्द्रीय मंत्री हैं।वे राजनीतिक परिदृश्य में सौहार्द की कमी महसूस कर रही हैं। उन्हें लगता है कि वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को काफ़ी की पेशकश नहीं कर सकतीं ।यह हिचक उनके मन में इसलिए है कि कहीं उन्होंने यह पेशकश की और अगले ने स्वीकार नहीं किया तो किरकिरी हो जायेगी।और ज़ाहिर है ऐसा होगा तो उनके राजनीतिक रसूख़ को धक्का लगेगा।उनके बयान से लगता है कि वे नये सिरे से ऐसा सौहार्द स्थापित करना चाहती हैं जिसमें राजनैतिक प्रतिद्वंदी ख़ुशनुमा माहौल में बैठकर काफ़ी पी सकें और देश और समाज की बेहतरी के बारे में सोच विचार सकें।
उधर शरद पवार कह रहे हैं कि राष्ट्र हित में राजनीतिक मतवाद से उपर उठकर सोचना होगा।ज़ाहिर है ऐसा सोचने के लिए उसी सौहार्द की ज़रूरत होगी जिसकी चर्चा निर्मला जी कर रही हैं।ऐसा सौहार्द नफ़रत के भाव को ख़त्म करके ही हासिल किया जा सकता है।ऐसा सौहार्द ज़रूर निर्मला सीतारमण की स्मृति में कहीं टँका होगा, जिसकी वे चर्चा कर रही हैं।
इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि राजनीतिक वातावरण में वह सौहार्द कभी मौजूद था तो कब और कैसे ख़त्म हुआ।लेकिन बात निकली है तो दूर तलक जाये इसलिए इस सवाल को, माधव मधुकर की इस सलाह के मद्देनज़र कि ‘दोष किसका है इसे बाद में तय कर लेंगे/ पहले इस कश्ती को तूफ़ाँ से बचाया जाये’ फ़िलहाल यहीं छोड़ देता हूँ ।
निर्मला जी ने सौहार्द की कमी महसूस की है तो ज़ाहिर वे सौहार्द क़ायम भी करना चाहेंगी या फिर चाहती होंगी ।चूँकि वे मौजूदा सत्ता संरचना की महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, इसलिए वे ऐसी पहल करने में समर्थ भी हैं।मुझे आर्थिक मामलों की वैसी समझ नहीं है कि वित्त मंत्री के रूप में निर्मला सीतारमण की पहलकदमियों पर कोई टिप्पणी कर सकूँ लेकिन साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते राजनीतिक- सामाजिक परिदृश्य में सौहार्द की कमी महसूस करने के लिए उनकी तारीफ़ कर सकता हूँ, सौहार्द बहाली की उनकी कोशिशों का खुले दिल से स्वागत कर सकता हूँ । इतना ही नहीं सौहार्द की बहाली के लिए उन्हें कुछ सुझाव भी दे सकता हूँ।
समझदारों का कहना है कि बिना माँगे सुझाव देना मूर्खता की कोटि में आता है लेकिन निर्मला जी की सौहार्द चिंता हमारे सामाजिक जीवन के लिए बेहद ज़रूरी है । इस ज़रूरी और भली बात के लिए मूर्ख समझे जाने का ख़तरा उठा कर भी कुछ सुझाव दे रहा हूँ ।
निर्मला जी सबसे पहले शरद पवार से ही एक कप काफ़ी की पेशकश कर सकती हैं। मुझे उम्मीद है कि शरद जी इस पेशकश का स्वागत करेंगे।यदि शरद जी हीलाहवाली करते दिखें तो उन्हें उनके बयान का हवाला देकर राजनीति से उपर उठकर सामाजिक सौहार्द के बारे में सोचने की बात की जा सकती है।निश्चित रूप से निर्मला जी का यह कदम सौहार्द बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।
यदि मुम्बई से शरद पवार को आने में दिक़्क़त हो रही हो तो वे दिल्ली में रह रही पक्ष विपक्ष की कुछ महिला सांसदों को काफ़ी पर बुला सकती हैं और उनसे ग़ैर राजनीतिक बातें कर सकती है।मसलन बदलते मौसम के बारे में या फिर उनकी हाबी के बारे में पूछ सकती हैं। वे सांसद आजकल कौन सी किताबें पढ़ रही हैं या हाल फ़िलहाल देखी गई फ़िल्म के बारे में भी बात हो सकती है।वे साथ साथ एक कार में बैठ कर चाँदनी चौक या बंगाली मार्केट में चाट खाने जा सकती हैं। बात भले ही न हो पर इस तरह उन्हें साथ साथ चाट खाते हुए देखकर सहज सौहार्द का संदेश समाज में जायेगा।
यदि इसमें भी कोई दिक़्क़त आ रही हो तो वे दिल्ली में रहने वाली लेखिकाओं या कला जगत से जुड़ी महिलाओं को काफ़ी के लिए बुला सकती हैं । या फिर वे किसी दिन यों ही बिना किसी प्रोटोकॉल के किसी सांसद, किसी कवि, किसी कलाकार के घर की घंटी बजा सकती हैं । मुझे विश्वास है वे निराश नहीं होंगी ।उन्हें पर्याप्त सौहार्द मिलेगा।
निर्मला जी यह कत्तई न सोचें कि इतने लोगों को काफ़ी का न्यौता दिलाकर मैं बैठे ठाले उनका पारिवारिक बजट गड़बड़ाने पर तुला हूँ।निर्मला जी का यह बयान मुझे इतना सुकून दे रहा है कि इस एवज़ में मैं उन्हें विनम्रतापूर्वक एक कप काफ़ी की पेशकश कर रहा हूँ । वे गाहे-बगाहे बनारस आती रहती हैं।वे किसी शुक्रवार आयें और मेरे घर पधारें । उनके इस नेक विचार के लिए मैं अपने हाथ से बनाकर काफ़ी पेश करूँगा ।
निर्मला सीतारमण भारत सरकार में हैं और तीसरे चौथे नम्बर की क़द्दावर केन्द्रीय मंत्री हैं।वे राजनीतिक परिदृश्य में सौहार्द की कमी महसूस कर रही हैं। उन्हें लगता है कि वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को काफ़ी की पेशकश नहीं कर सकतीं ।यह हिचक उनके मन में इसलिए है कि कहीं उन्होंने यह पेशकश की और अगले ने स्वीकार नहीं किया तो किरकिरी हो जायेगी।और ज़ाहिर है ऐसा होगा तो उनके राजनीतिक रसूख़ को धक्का लगेगा।उनके बयान से लगता है कि वे नये सिरे से ऐसा सौहार्द स्थापित करना चाहती हैं जिसमें राजनैतिक प्रतिद्वंदी ख़ुशनुमा माहौल में बैठकर काफ़ी पी सकें और देश और समाज की बेहतरी के बारे में सोच विचार सकें।
उधर शरद पवार कह रहे हैं कि राष्ट्र हित में राजनीतिक मतवाद से उपर उठकर सोचना होगा।ज़ाहिर है ऐसा सोचने के लिए उसी सौहार्द की ज़रूरत होगी जिसकी चर्चा निर्मला जी कर रही हैं।ऐसा सौहार्द नफ़रत के भाव को ख़त्म करके ही हासिल किया जा सकता है।ऐसा सौहार्द ज़रूर निर्मला सीतारमण की स्मृति में कहीं टँका होगा, जिसकी वे चर्चा कर रही हैं।
इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि राजनीतिक वातावरण में वह सौहार्द कभी मौजूद था तो कब और कैसे ख़त्म हुआ।लेकिन बात निकली है तो दूर तलक जाये इसलिए इस सवाल को, माधव मधुकर की इस सलाह के मद्देनज़र कि ‘दोष किसका है इसे बाद में तय कर लेंगे/ पहले इस कश्ती को तूफ़ाँ से बचाया जाये’ फ़िलहाल यहीं छोड़ देता हूँ ।
निर्मला जी ने सौहार्द की कमी महसूस की है तो ज़ाहिर वे सौहार्द क़ायम भी करना चाहेंगी या फिर चाहती होंगी ।चूँकि वे मौजूदा सत्ता संरचना की महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, इसलिए वे ऐसी पहल करने में समर्थ भी हैं।मुझे आर्थिक मामलों की वैसी समझ नहीं है कि वित्त मंत्री के रूप में निर्मला सीतारमण की पहलकदमियों पर कोई टिप्पणी कर सकूँ लेकिन साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते राजनीतिक- सामाजिक परिदृश्य में सौहार्द की कमी महसूस करने के लिए उनकी तारीफ़ कर सकता हूँ, सौहार्द बहाली की उनकी कोशिशों का खुले दिल से स्वागत कर सकता हूँ । इतना ही नहीं सौहार्द की बहाली के लिए उन्हें कुछ सुझाव भी दे सकता हूँ।
समझदारों का कहना है कि बिना माँगे सुझाव देना मूर्खता की कोटि में आता है लेकिन निर्मला जी की सौहार्द चिंता हमारे सामाजिक जीवन के लिए बेहद ज़रूरी है । इस ज़रूरी और भली बात के लिए मूर्ख समझे जाने का ख़तरा उठा कर भी कुछ सुझाव दे रहा हूँ ।
निर्मला जी सबसे पहले शरद पवार से ही एक कप काफ़ी की पेशकश कर सकती हैं। मुझे उम्मीद है कि शरद जी इस पेशकश का स्वागत करेंगे।यदि शरद जी हीलाहवाली करते दिखें तो उन्हें उनके बयान का हवाला देकर राजनीति से उपर उठकर सामाजिक सौहार्द के बारे में सोचने की बात की जा सकती है।निश्चित रूप से निर्मला जी का यह कदम सौहार्द बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।
यदि मुम्बई से शरद पवार को आने में दिक़्क़त हो रही हो तो वे दिल्ली में रह रही पक्ष विपक्ष की कुछ महिला सांसदों को काफ़ी पर बुला सकती हैं और उनसे ग़ैर राजनीतिक बातें कर सकती है।मसलन बदलते मौसम के बारे में या फिर उनकी हाबी के बारे में पूछ सकती हैं। वे सांसद आजकल कौन सी किताबें पढ़ रही हैं या हाल फ़िलहाल देखी गई फ़िल्म के बारे में भी बात हो सकती है।वे साथ साथ एक कार में बैठ कर चाँदनी चौक या बंगाली मार्केट में चाट खाने जा सकती हैं। बात भले ही न हो पर इस तरह उन्हें साथ साथ चाट खाते हुए देखकर सहज सौहार्द का संदेश समाज में जायेगा।
यदि इसमें भी कोई दिक़्क़त आ रही हो तो वे दिल्ली में रहने वाली लेखिकाओं या कला जगत से जुड़ी महिलाओं को काफ़ी के लिए बुला सकती हैं । या फिर वे किसी दिन यों ही बिना किसी प्रोटोकॉल के किसी सांसद, किसी कवि, किसी कलाकार के घर की घंटी बजा सकती हैं । मुझे विश्वास है वे निराश नहीं होंगी ।उन्हें पर्याप्त सौहार्द मिलेगा।
निर्मला जी यह कत्तई न सोचें कि इतने लोगों को काफ़ी का न्यौता दिलाकर मैं बैठे ठाले उनका पारिवारिक बजट गड़बड़ाने पर तुला हूँ।निर्मला जी का यह बयान मुझे इतना सुकून दे रहा है कि इस एवज़ में मैं उन्हें विनम्रतापूर्वक एक कप काफ़ी की पेशकश कर रहा हूँ । वे गाहे-बगाहे बनारस आती रहती हैं।वे किसी शुक्रवार आयें और मेरे घर पधारें । उनके इस नेक विचार के लिए मैं अपने हाथ से बनाकर काफ़ी पेश करूँगा ।
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