कहीं आस्था का कपूर औपचारिकता में विलीन तो नहीं हो गया है/सदानन्द शाही
हम उत्सवधर्मी समाज हैं । हमारे सांस्कृतिक मूल्य उत्सवों के माध्यम से ही प्रकट होते रहे हैं।बारहों महीने पड़ने वाले त्यौहारों का सम्बन्ध कृषक जीवन और हमारी बहुवर्णी प्रकृति के सम्बंधों की कथा कहते हैं ।राम नवमी को ही लें तो रबी की फसल के कट कर घर-खलिहान पहुँचने के दिन होते हैं ।घर-खलिहान में अनाज आया नहीं कि हमारा उत्सवधर्मी मन सक्रिय हो गया ।तरह-तरह के पकवान बनाते हैं और अपने इष्टदेव और इष्ट-मित्र परिजनों के साथ आनन्द मनाते हैं ।हम अपने इष्टदेवता को प्राय: वही पदार्थ या व्यंजन भोग में चढ़ाते हैं जो हमें स्वयं प्रिय होता है। इस मामले में सिर्फ़ भगवान शिव अपवाद हैं।क्योंकि वे हमारे आदि देवता हैं।संभवत: कृषक संस्कृति के विकास के पहले के या फिर उसके विकास की आरंभिक अवस्था के।ज़ाहिर है हम भांग, धतूर और मंदार का सेवन उस चाव से नहीं कर सकते जिस चाव से हमारे महादेव करते हैं। संभव यह भी है कि इन वनस्पतियों के औषधीय गुण का कोई विशेष प्रयोग शिव को पता रहा हो, जिसके नाते वे नीलकंठ हुए - गले में हलाहल विष धारण करने वाले। देव- असुर संग्राम अमृत के लिए ही हुआ । अमृत की चाहत देवताओं को थी, वे अमर होना चाहते थे।अमृत की चाहत असुरों को भी थी, वे भी अमर होना चाहते थे।दोनों की मूल प्रेरणा निजी हित था।हलाहल विष की चिंता किसी ने नहीं की ,जिससे पूरी कायनात के भस्म हो जाने का ख़तरा था।इसके लिए शिव आगे आये और हलाहल विष को कंठ में धारण किया।इसीलिए वे शिव कहाये।शिव यानी मंगल।इसीलिए मंगल भवन अमंगलहारी कहे जाने वाले प्रभु राम भी शिव और शिवत्व के आराधक हुए ।
हर युग में विष और अमृत का जन्म साथ-साथ होता रहा है।हमारे इस अमृत काल में भी ऐसा हो रहा है।अमृत में आकर्षण है, चकाचौंध है, इसलिए अमृत के पीछे सब भागते हैं।विष को छोड़ देते हैं ।जिसे धरती भुगतती है,आसमान झेलता है,ओज़ोन परत में छेद होता है ,उत्तराखंड दरकता है। जिसे आज की भाषा में जनता कहते हैं वह तरह तरह से इस विष का ताप सहती है।यहीं पर हमारे सामूहिक- सामाजिक शिव और शिवता आगे आते हैं।दर असल हमारे त्यौहार धरती और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शन होते हैं। प्रायः हमारे सभी त्यौहारों की प्रकृति सामूहिक होती है।ख़ुशी और उल्लास भी सामूहिक होता है। आपसी ईर्ष्या द्वेष से, भेद भाव से उपर उठने का अवसर देते हैं हमारे उत्सव। रोज़ रोज़ के मरने खपने से हमारे दिल-दिमाग़ में जो विष इकट्ठा होता है उसे हमारे उत्सव पी जाते है।उत्सव त्यौहार में हम धरती का भी ख़्याल करते हैं।उसे गंदगी के विष से यथाशक्ति मुक्त करते है।
राम नवमी बीत चुकी है, दाल भरी पूड़ी और रसियाव जिसे कुछ इलाक़ों में बखीर भी कहते हैं ,( गुड़ और चावल से बनी खीर) का भोग लग चुका है।जगह-जगह दु्र्गा के मंदिर और चौरा पर कड़ाही चढ़ चुकी है। [नवमी के दिन दुर्गा मंदिर अथवा गाँव जवार में माई के स्थान पर चूल्हा जलाकर कड़ाही में पूड़ी और आटे का गीला हलवा (जिसे लपसी कहते हैं) बनाते हैं और चढ़ाते हैं । इसी को कड़ाही चढ़ाना कहते हैं ।इस काम में नये गेहूं के आटे का प्रयोग होता है।] फिर मैं यह सब आज क्यों कह रहा हूँ। रामनवमी के उत्सव का यह सब किस्सा सिर्फ़ सुदूर गाँवों का है, जहाँ आजकल मेरी माँ रह रही हैं ।या फिर उन शहरी घरों में जहाँ ऐसी माताएँ हैं ।ज़ाहिर संस्कृति को जीने और बचाने का दावा पुरुष समाज चाहे जितने ज़ोर-शोर से करता हो ,इस नाम पर जितना हो हल्ला करता हो , उसे जीवंत रखने की असली ज़िम्मेदारी स्त्रियों पर हैं। उन्हीं स्त्रियों पर जिन्हें पुरुष समाज प्राय: मतिहीन और निचले दर्जे का मानने में गर्व का अनुभव करता है।
इधर स्थिति थोड़ी बदली है।त्यौहारों पर पुरुष समाज हाल वर्षों से कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हुआ है।लेकिन पुरुषों की सक्रियता का सबसे ज़्यादा रूप मोबाइल के माध्यम से सोशल मीडिया पर ही दिखाई देता है।इस सक्रियता का भी निन्यानवे दशमलव नौ प्रतिशत इधर से आये बधाई संदेश या फ़ोटो को उधर करने में ही खर्च होता है।बेशक कुछ लोग होंगे जो राम नवमी, दशहरा, दीवाली, होली ,शिवरात्रि,दुर्गापूजा जैसे पर्व त्यौहारों पर कुछ शब्द और कुछ चित्र मिला कर शुभकामना संदेश रचते होंगे। जिन्हें हम सुबह से शाम तक अपने सम्पर्कों में भेजते रहते हैं । हमारे सम्पर्क भी वही-वही संदेश आगे भेजते रहते हैं । नतीजा यह होता है कि वही- वही फ़ोटो संदेश घूम फिर कर बार-बार हमारे पास आते हैं और हमारे फ़ोन की मेमोरी में भर ज़ाया करते हैं।फ़ोन की मेमोरी चाहे जितनी ज़्यादा हो , इन फ़ोटो - कम वीडियो संदेशों के आगे बौने साबित होते हैं ।नतीजा यह होता है कि जिस उत्साह से हम त्यौहार का दिन संदेश भेजने में ज़ाया करते हैं ,लगभग उसी अनुपात की बेचारगी का अनुभव करते हुए अगले दिन डिलीट बटन का इस्तेमाल करते हैं।ऐसा करते हुए पता नहीं हम अपने देवता को फ़ोन या कम्प्यूटर के बिन में डालने पर ग्लानि का अनुभव करते हैं या नहीं ।मुझे तो ग्लानि का अनुभव होता है। बचपन में कभी हम दीवाली के दिए इकट्ठा करते थे , उनसे तराज़ू आदि कई तरह के खिलौने बनाते थे, उसमें एक ख़ास तरह का आनन्द था।मोबाइल की सफ़ाई में खीझ के अलावा कुछ नहीं मिलता। कभी- कभी सोचता हूँ कि वे लोग जिनकी भावनायें बात बे-बात आहत होती रहती हैं, वे इस समस्या से कैसे निपटते होंगे ? ऐसा करते हुए उनकी भावना या आस्था आहत होती है या नहीं, ज़ाहिर तौर पर ऐसा प्रसंग कभी सामने आया नहीं ।
जिस तरह हमारा शिक्षित(?)- अर्धशिक्षित मध्यवर्ग त्योहारों के साथ बर्ताव करता है, उससे एक बात तो यह पता चलती है कि त्यौहार को उसके समूचे सांस्कृतिक बोध के साथ मनाने में उसकी कोई रुचि नहीं है।यह ज़िम्मा जो कुछ बचा- खुचा है वह घर की महिलाओं पर है। हमें त्यौहारों का न तो मर्म पता है और न ही उसे पता करने में रुचि है।दुनिया को मुट्ठी में कर लेने के साथ हमारे दैनन्दिन जीवन में दाखिल हुए मोबाइल ने हमारी संवेदनाओं को ही नहीं, हमारी जिज्ञासा को भी कुन्द कर दिया है। त्यौहारों से और सामाजिकता से हमारा संबंध सिर्फ़ और सिर्फ़ दिखावा मात्र बन कर रह गया है।हम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को अपनी आस्थाशीलता का सुबूत दे देना चाहते हैं ,उन्हें बता देना चाहते हैं कि हम आस्था वान हैं।जबकि हक़ीक़त यह है आस्था का कपूर औपचारिकता में विलीन हो चुका है।

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