विवेकानंद :मौलिक भारतीयता के हिमायती/सदानन्द शाही
हमारे निकट अतीत के महान शिक्षकों में विवेकानन्द का विशेष स्थान हैं। विवेकानन्द हमें बहुत सी बातों के साथ पूरब और पश्चिम में संतुलन स्थापित करना सिखाते हैं। ऐसा वे किसी दिखावे ,राजनीतिक हित या चतुराई के नाते नहीं बल्कि मनुष्य मात्र में अपनी अगाध श्रद्धा के नाते करते हैं ।
प्राच्य और पाश्चात्य नाम से विवेकानन्द की एक पुस्तिका है।मूल बांग्ला में लिखी यह किताब दो तरह की प्रचलित अतियों का निषेध करती है।पश्चिमी मान्यताओं और जीवन शैली को सर्वांग सुन्दर मान लेना और उसकी नकल करना एक अति है तो पुराणों में ही हमारी आज की सभी समस्याओं का समाधान है दूसरी अति है।आजादी के इतने साल बाद भी यह मुद्दा बना हुआ है।सच पूछिए तो इन अतियों का इतिहास भी उतना ही पुराना है जितना कि पूरब और पश्चिम के मुलाकात का इतिहास। आम तौर पर इन अतियों में संतुलन स्थापित करने का एक सतही तरीका दिखाई पडता है। अक्सर यह मान लिया जाता है कि भौतिक उपलब्धियां भले पश्चिम के हिस्से आयीं हों ,धार्मिक-आध्यात्मिक तौर पर पूरब यानी भारत ही श्रेष्ठ है।यह श्रेष्ठता बोध कभी कभी श्रेष्ठता दम्भ में बदल जाता है और हम अपने को विश्व गुरु घोषित कर बैठते हैं।बेशक हमारे पास अतीत की बहुत समृद्ध विरासत है लेकिन वर्तमान उस विरासत से काफी कुछ भिन्न है।यह दावा तब और हास्यास्पद लगता है जब यह सब करते- कहते हुए हम स्वयं पश्चिम की तथाकथित भौतिकता में पूरी तरह डूब उतरा रहे होते हैं। ऐसे में विवेकानन्द हमें सतही और हास्यास्पद होने से बचाते हैं।क्योंकि कुछ भी कहने के पहले वे प्राच्य और पाश्चात्य की सामर्थ्य और सीमा का सम्यक आकलन करते हैं। वे इस तरह के मिथ्या अहंकार को खारिज करते हुए कहते हैं 'जो जाति कहती है कि हम सर्वज्ञ हैं उसकी अवनति के दिन बहुत निकट हैं!' कुछ नहीं सीखना मृत्यु की राह है।हमें अन्यान्य जातियों से बहुत कुछ सीखना है।इसी के साथ वे यह भी चेताते चलते हैं कि 'जो कुछ सीखना है उसे अपने साँचे में ढाल लेना है।'इस तरह सीखना महज अनुकरण नहीं रह जाता वह एक सृजनात्मक क्रिया हो जाती है।
विवेकानन्द अपनी तरह के विरले ऐसे धार्मिक शिक्षक हैं जो भारत की वर्तमान दुरवस्था से आँख नहीं चुराते ।भारत का अतीत गौरव ही नहीं वर्तमान का ठोस यथार्थ भी उनकी नजरों के सामने होता है। वे मौलिकता के अभाव को भारत की अवनति का मूल कारण मानते हैं।मौलिकता के अभाव का मूल हमारी शास्त्रबद्धता में है।वे कहते हैं-'हम लोग वह काम कभी नहीं कर सकते जो शास्त्रों में नहीं लिखा है।कुछ नया काम करने की हमारी शक्ति ही नष्ट हो गयी है।'विवेकानन्द की यह बात आज इसलिए भी शिद्दत से याद आ रही है क्योंकि तमाम राष्ट्रवादी हो हल्ले के बावजूद अनेक क्षेत्रों में हम पश्चिम का अन्धानुकरण ही कर रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में अन्धानुकरण की प्रवृत्ति कुछ ज्यादा ही दिख रही है।
जबकि विवेकानन्द शिक्षा को सभी समस्याओं का समाधान मानते हैं।इसलिए लोकशिक्षण पर उनका बहुत जोर है।विवेकानन्द का लोकशिक्षण एक मौलिक उद्भावना है जो भारत की जमीनी हकीकत से उपजी है।
इसी तरह विवेकानन्द धर्म की बहुत सुन्दर व्याख्या करते हैं-वे धर्म को कार्यमूलक मानते हैं और सतत कर्मशीलता को धार्मिक व्यक्ति का लक्षण मानते हैं।ऐसा करते हुए विवेकानन्द कबीर आदि श्रमजीवी सन्तों की याद दिलाते हैं।वे पश्चिम की कर्मशीलता की खुलकर तारीफ करते हैं और काहिली तथा अकर्मण्यता की भर्त्सना करते हैं,भले ही उसके पीछे कोई महान कारण( ?) बताया गया हो।
भारत के बारे में पश्चिम के प्राच्यवादियों की इकहरी सोच ही नहीं बल्कि पश्चिम के बारे में भारत की राय की सीमाएं उनके सामने स्पष्ट हैं।इसलिए वे मूल्य निर्णय देने की हडबडी नहीं दिखाते ।वे मनुष्य और प्रत्येक जाति के जातीय भाव की तह तक पहुँचते हैं और कहते हैं - 'इतने दुख दारिद्रय में भी हम भारतवासी बचे हैं ,इसका अर्थ यही है कि हमारा एक जातीय भाव है,जो इस समय भी जगत के लिए आवश्यक है।यूरोपियनों में भी उसी प्रकार एक जातीय भाव है,जिसके न होने से संसार का काम नहीं चलेगा।' विवेकानन्द पूरब और पश्चिम में संतुलन की तलाश इस समान भूमि से शुरू करते हैं। न विद्वेष,न कुण्ठा,न अहंकार।इसीलिए वे अकुण्ठ भाव से पश्चिम से कह पाते हैं -'हे विदेशी ,तुम अपने को जितना बलवान समझते हो वह केवल कल्पना ही है;भारत में भी बल है ,सार है,इसे पहले समझ लो।और यह भी समझो कि अब भी हमारे सभ्यता भण्डार में जोडने के लिए कुछ है,इसीलिए हम बचे हैं।' वे समूचे योरप को ललकारते हुए से कहते हैं कि यह भ्रम छोड दो कि हम नरपशु हैं और तुम्हीं हमारा उद्धार करोगे। इस दुनिया को हमारी जरूरत है और हम अपना उद्धार करने में सक्षम हैं।
एक ऐसे देश में जो हमेशा किसी न किसी उद्धारक की प्रतीक्षा में रहता आया हो विवेकानन्द का यह विचार बेहद महत्वपूर्ण है।

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