स्वाधीन चेतना के विकास में काशी हिन्दू विश्व विद्यालय की भूमिका /सदानंद शाही
स्वाधीनता आन्दोलन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की भूमिका जैसे विषय पर बोलने के लिए शायद मैं उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ। बेहतर होता इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने के लिए किसी राजनीति शास्त्र या इतिहास के विद्वान को बुलाया जाता। लेकिन कई बार ऐसे अवसरों पर औचित्य पर मित्रता आदि को तरजीह दी जाती है। मुझे भी मित्रता वश ही बुलाया गया है। इसलिए अगर आपको मेरे व्याख्यान से निराशा हाथ लगती है तो भी मित्रता का भाव समाज में मौजूद है यह सोच कर संतोष कर सकते हैं। साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते मैं इस विषय को बिल्कुल दूसरे नजरिए से देखता हूँ। स्वाधीनता आन्दोलन में किसी विश्वविद्यालय की दो तरह की भूमिका हो सकती है ? पहली भूमिका यह हो सकती है कि विश्वविद्यालय के कर्मचारी अध्यापक और छात्र सीधे-सीधे आन्दोलन में उतर पड़ें। अगर बनायी जाये तो ऐसे नामों की लम्बी सूची तैयार हो सकती है। महिला महाविद्यालय की पहली प्राचार्या कुमारी आशा अधिकारी 1932 में नौकरी छोड़कर स्वाधीनता आन्दोलन की गतिविधियों में शामिल होने चली गई थीं । 1942 के आन्दोलन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों की भूमिका जबर्दस्त थी। भारत छोड़ो आन्दोलन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों ने जमकर हिस्सेदारी की । प्रभुनारायण सिंह और राजनारायण की जोड़ी उसी दौरान चमकी और चर्चित हुई। फिलहाल मैं इस पहलू पर बात नहीं करने जा रहा है। काशी हिन्दू विश्व विद्यालय या किसी भी दूसरे विश्व विद्यालय की दूसरी भूमिका यह हो सकती है कि उसने देश की स्वाधीन चेतना को किस हद तक प्रभावित किया है। आज मैं इसी पहलू पर बात करुँगा।
भारत के मन पर आधिपत्य के लिए अंग्रेजों ने यहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर कब्जा जमाया। 1782 में कलकत्ते में मदरसा खुला। अरबी की शिक्षा दी जाती थी।1791 में काशी में संस्कृत कालेज खुला। शिक्षा के माध्यम से भारत की चेतना पर काबिज होने की असली कोशिश 1835 में की गई । लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा की सिफारिश की। 1854 में कलकत्ता विश्वविद्यालय, 1858 में बम्बई और मद्रास विश्वविद्यालय बना। 1882 में शिक्षा कमीशन बैठा और इसी सन में लाहौर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1887 में लार्ड लिटन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना की । भारत की शिक्षा व्यवस्था पर कब्जे की इन्हीं कोशिशों के बीच राष्ट्रीय शिक्षा चिन्ता ने जन्म लिया। राष्ट्रीय या भारतीय शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने की अनेक कोशिशें हो रही थीं ।
अमृतसर में खालसा कालेज बना। राची में नया कालेज बनाने के लिए दान मिला। अलीगढ़ कालेज की स्थापना हुई। नवाब रामपुर ने बरेली कालेज की स्थापना की। राष्ट्रीय शिक्षा के लिए राजा बलराम पुर आगे आए। विवेकानंद की प्रेरणा से टाटा अनुसंधान केन्द्र बना। कहने का अभिप्राय यह कि देश में राष्ट्रीय शिक्षा के लिए वातावरण बन रहा था। देश के विभिन्न हिस्सों के आकाश में राष्ट्रीय शिक्षा के बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। महामना मदन मोहन मालवीय ने इसी कालेज में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का सपना देखा।
राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की तीन धारायें एक साथ सक्रिय थीं। 1904 में मिन्ट हाउस में काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह की अध्यक्षता में महामना ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का प्रस्ताव रखा। श्रीमती एनी बेसेन्ट ने 1907 में University of India का प्रस्ताव Royal Charter के पास भेजा। राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का एक और सपना दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह के नेतृत्व में पल रहा था। राष्ट्रीय शिक्षा के लिए काशी में यत्नशील ये तीनों धारायें एक में मिल गयी। 1911 में दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह ने अपने सपने को मालवीय जी के सपने से जोड़ दिया । आगे चलकर श्रीमती एनी बेसेन्ट ने इस महान स्वप्न को अपने सेण्ट्रल हिन्दू स्कूल की ठोस जमीन दी।काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण में एनी बेसेंट की इस भूमिका को सदैव याद रखना चाहिए। इस तरह एक राष्ट्रीय शिक्षा की तीनों धाराएँ मालवीय जी के शुभ्र धवल नेतृत्व में एक हो गईं । कारवां आगे बढ़ गया। देखते-देखते मालवीय जी का यह सपना भारत की जनता की आकांक्षा से जुड़ गया।
भारत के इतिहास में एक नया नालंदा जन्म ले रहा था। इसका निर्माता कोई एक राजा महाराजा नहीं था। एक फकीर इसका नेतृत्व कर रहा था। सच पूछिये तो इस विश्वविद्यालय की रचना भारत की जनता की सामूहिक आकांक्षाओं का पूंजीभूत रूप बन गया । विश्वविद्यालय के लिए धन एकत्र करने के लिए राजो महराजों से लेकर सामान्य जनता में होड़ मच गई थी। धन जमा करने के लिए मालवीय जी का कारवां जब लखनऊ पहुँचा तो चकबस्त ने कौमी मुसद्दस लिखा। 3 दिसम्बर 1911 को मालवीय जी के भाषण के पहले चकबस्त ने यह मुसद्दस सुनाया। जिसकी कुछ आरम्भिक पंक्तियाँ इस तरह हैं -
‘इलाही कौन फरिश्ते हैं ये गदाए वतन ।
सफाए कल्ब से जिनके ये बज़्म है रौशन ।
झुकी हुई है सबों की लिहाज से गर्दन।
हर इक जुबां पे है ताज़ीम और अदब के सुखन।
सफे खड़ी हैं जवानों की और पीरों की
खुदा की शान यह फेरी है किन फकीरों की ।
फकीर इल्म के हैं इनकी दास्तां सुन लो।
पयाम कौम का दुख दर्द का बयांसुन लो ।
ये वो दिन है जो है यादगार हाँ सुन लो ।
है आज गैरत-ए - कौमी का इम्तहाँ सुनलो।। ......
एक लम्बी नञम है। सीता राम चतुर्वेदी ने महामना की जो जीवनी लिखी है, उसमें पूरी नञम उद्धृत है। यह नञम पढ़ने से पता चलता है कि किस तरह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना कौम की गैरत का प्रमाण बन गया था। यह जनता की राष्ट्रीय शिक्षा की आकांक्षा का प्रतीक बन गया था। यह विश्वविद्यालय सिर्फ अमीरों, राजाओं, महाराजों और भारत की तत्कालीन सरकार की मदद से नहीं बना। इस विश्वविद्यालय के निर्माण में देश की आम जनता का योगदान किसी से कम नहीं है। भारत के सामान्य स्त्री- पुरुष, हिन्दू- मुसलमान सब शामिल थे। एक दो प्रसंगों की चर्चा करना चाहता हूँ : मुरादाबाद में मालवीय जी के व्याख्यान के बाद एक मुसलमान सज्जन आँखों में आँसूं और हाथ में पाँच रुपये लिए हुए खड़े हुए और ले जाकर मालवीय जी के चरणों पर रख दिए और कहा मैं बहुत गरीब आदमी हूँ, तब भी इस नेक काम में मैं पाँच रुपये देता हूँ। इस सच्चे मुसलमान के इस दान से सबकी आँखे डबडबा आयीं।
एक दूसरा प्रसंग है-मुजफ्फरपुर में एक भिक्षा मांगने वाली ने अपने दिन भर की कमाई दान दे दी। एक व्यक्ति ने अपनी फटी कमीज दान में दे दी,जिसे नीलाम करके धन जुटाया गया । नीलामी में कमीज खरीदने वाले व्यक्ति ने वह कमीज भी विश्वविद्यालय के संग्रहालय के लिए वापस कर दी। औरतों ने अपने गहने तक दान में दे दिए। एक सेठ ने पाँच हजार रुपये द्ये तो सेठानी ने अपने हाथ का कंगन दे दिया । कंगन नीलाम हुआ तो सेठ कंगन खरीद कर सेठानी को दे दिया , पर सेठानी ने उस कंगन को संग्रहालय के लिए दे दिया। औरतों के लिए गहनों से ज्यादा प्रिय कुछ नहीं होता।गहना औरतों के लिए केवल शौक की वस्तु नहीं है । वे मुश्किल समय के लिए गहने को संभाले रहती हैं और वक़्त आने पर गहना निकालती हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना एक ऐसी जरूरत थी,ऐसी आत्यंतिक जरूरत थी जिसे इस सेठानी जैसी देश की असंख्य स्त्रियों ने महसूस किया और अपने गहने तक दान में दे दिए।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का सपना भारत की विशाल आबादी की राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया। मदन मोहन मालवीय की खासियत यह थी कि उन्होंने इस राष्ट्रीय कहें जातीय कहें या कौमी कहें संस्थान के निर्माण के गौरव में शामिल होने का अवसर हर आम ओ खास शख्स को दिया।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए महामना ने जो यात्राएँ की,मेरा मन होता है कि उसकी तुलना महात्मा गाँधी की दाण्डी यात्रा से करूँ । दाण्डी यात्रा से गांधी ने भारत की आम जनता के मन में यह भरोसा और विश्वास जगाया कि वे हीन और तुच्छ नहीं हैं। भारत की आजादी की महान लड़ाई में वे भी बराबर के भागीदार हो सकते हैं। नमक के साथ गांधी की उठी हुई मुट्ठी बिट्रिश साम्राज्य को चुनौती देने की महान प्रेरणा बन गयी। आप सब जानते होंगे उसके बाद गाँव-गाँव में प्रतीकात्मक ढंग से नमक बनाकर भारत कि असंख्य गरीब और मजलूम जनता ने साम्राज्यवाद के विशालकाय दुर्ग को झकझोर दिया। अनेक ऐसी कहानियाँ मिलती हैं जिसमें बूढ़ी औरतें लोटे के पानी में नमक घोल कर सारे राह ,भरे चौराहे पर पानी सुखाकर नमक बनाती हैं और अंग्रेजी पुलिस के अत्याचार का शिकार भी बनती हैं और उसे चुनौती भी देती हैं। इसी तरह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भी राष्ट्रीय शिक्षा का, राष्ट्रीय नवनिर्माण का प्रतीक बन गया था। अंग्रेजों की दलील थी कि भारतीय लोग निर्माण नहीं कर सकते, वे संस्था नहीं चला सकते, देश नहीं चला सकते,आदि आदि इत्यादि । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण ने अंग्रेजों की इस दलील का न केवल जवाब दिया,बल्कि उसे थोथा साबित किया ।
महामना ने विश्वविद्यालय के लिए जो ध्येय निश्चित किए थे, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं-
1- विशेषता: हिन्दू समुदाय को और समान्यता: सार्वभौम को हिंदुओं की संस्कृति ,उनके श्रेष्ठ चिंतनों और उनकी प्राचीन सभ्यता में जो कुछ विशिष्ट और महान था ,उसका ज्ञान कराने के लिए हिन्दू शास्त्र व संस्कृत भाषा के अध्ययन को एक साधन के रूप में प्रोत्साहित करना ।
2- साधारणत: कला तथा विज्ञान की सभी शाखाओं में शिक्षण तथा शोध कार्य को प्रोत्साहन देना ।
3- आवश्यक व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ ऐसे वैज्ञानिक,तकनीकी एवं व्यावहारिक ज्ञान का संवर्धन तथा प्रसार करना जो देशी उद्योगों को प्रोत्साहन दें एवं देश के भौतिक संसाधन का विकास करने में सहायक हों।
4- धर्म और नीति को शिक्षा का आवश्यक या अभिन्न अंग मानकर नवयुवकों में सुंदर चरित्र का गठन या चरित्र निर्माण के विकास को प्रोत्साहित करना।
विश्वविद्यालय के इस महान उद्देश्य को हमारे कुलगीत में बहुत सुन्दर ढंग से व्यक्त किया गया है- ‘प्रतीचि प्राची का मेल सुन्दर’।इस मेल में बौद्धिकता, तार्किकता और हार्दिकता के मेल का भी आवाहन था।
मित्रो! आज हम विश्वविद्यालयों की रैंकिंग को लेकर परेशान रहते हैं। मुझे लगता है कि रैंकिग से ज्यादा जरूरी है विश्वविद्यालय की मौलिकता। हमारे विश्वविद्यालय की मौलिकता है -तार्किकता और हार्दिकता का मेल। एक अखिल भारतीय समावेशिता का आग्रह। इस मौलिकता ने भारत वर्ष को किस-किस रूप में प्रेरित और प्रोत्साहित किया है , इसका आकलन होना बाकी है।
इस प्रसंग साहित्य को मिली प्रेरणा की ओर इशारा करना चाहता हूँ । साहित्य में नवजागरण की चर्चा होती है, हिन्दी में छायावाद की कविता को नवजागरण का तीसरा चरण कहा जाता है। छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद इसी बनारस में थे। उन्होंने कामायनी जैसी महान-कृति रची । जिसमे श्रद्धा और इडा जैसी बिल्कुल नयी स्त्रियां दिखाई देती है। कामायनी से पहले ऐसी स्त्रियों से हमारा परिचय नहीं था। ये भावी भारत की स्त्रियाँ थीं। देखना चाहिए कि इन स्त्रियों को गढ़ने में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की क्या भूमिका थीं। कामायनी 1936 में प्रकाशित होती है। 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना होती है । विश्वविद्यालय सह शिक्षा के साथ शुरू होता है। यहाँ विधिवत 1927 में महिला महाविद्यालय की स्थापना होती है। विश्वविद्यालय परिसर में भावी भारत की स्त्रियाँ अवतरित होती हैं। स्त्री की मुक्ति का सवाल भारतीय नवजागरण का, भारत की स्वाधीन चेतना का प्रमुख पहलू है। हमारे विश्वविद्यालय ने नए भारत की स्त्री को जमीन पर उतारा । मैं कहना चाहता हूँ कि हमारे विश्वविद्यालय ने स्वाधीन चेतना के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई है । भारत की स्वाधीन चेतना के नजरिये से विश्वविद्यालय बहुत बड़ा योगदान है। स्वाधीन चेतना का विकास विश्वविद्यालय की बहुत बड़ी देन है ।
मित्रो! आज हम विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में हैं। सौ वर्ष किसी विश्वविद्यालय के लिए बहुत ज्यादा नहीं होते। यदि हमारे विश्वविद्यालय को आने वाली शताब्दियों में भी स्वाधीन चेतना का प्रेरणा स्रोत बनें रहना है, देश को शिक्षित मस्तिष्क देना है तो उसे अपनी मौलिकता बनाये और बचाये रखनी होगी । संस्थाओं के इतिहास में उठा-पटक चलती रहती है, ऊँच-नीच होता रहता है लेकिन प्रथमत: और अंतत: वे अपनी मौलिकता के नाते ही जानी जाती हैं ।
विश्वविद्यालय के शिलारोपण कार्यक्रम के अवसर पर गांधी जी ने विद्यार्थियों के लिए जो व्याख्यान दिया था, वह इस विश्वविद्यालय का महान दस्तावेज है। उसमें गांधी ने कहा कि मातृभाषाओं में शिक्षा होनी चाहिए। गांधी जब-जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय आये उन्होंने यह याद दिलाया। गांधी जी ने चाटुकारिता और झूठ से बचने की सलाह दी। स्वाधीन चेतना के विकास की दृष्टि से हमारे विश्वविद्यालय के महान संस्थापक से जुड़ी एक और बात का जिक्र करके मैं अपनी बात समाप्त करुँगा। महामना के पास असहमति से संवाद बनाये रखने की अद्भुत सामर्थ्य थी। असहमति को स्थान दिए बगैर कोई विश्वविद्यालय मौलिक नहीं हो सकता,और मौलिक हुये बिना कोई विश्वविद्यालय न तो नये ज्ञान का सृजन कर सकता है और न ही ज्ञान की नयी व्याख्या कर सकता है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पुरानी प्रोसिडिंग पढ़िए। उसमें अनेक ऐसे प्रसंग मिलेंगे जिसमे स्वयं विश्वविद्यालय के संस्थापक पर सवाल उठाये गए हैं । मालवीय जी कभी भी उन सवालों से घबड़ाए नहीं, विचलित नहीं हुए; बल्कि आगे बढ़कर उनसे संवाद किया।मालवीय जी इसीलिए महामना हैं –महान मन वाले । यदि भविष्य में हमें अपने विश्वविद्यालय का गौरव बहाल रखना है तो असहमति के लिए जगह बनाये रखना है। अन्वेषण के लिए मौलिकता और नवीनता आवश्यक है । असहमति और विरोधी विचारों से अंत:क्रिया के वातावरण में ही ऐसा संभव है ।आइए विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में संकल्प लें की महामना द्वारा जलायी गयी स्वाधीन चेतना की मशाल को तेज से तेजतर करें । धन्यवाद ।
(15 अगस्त 2015 को को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के टीचर्स क्लब में दिये व्याख्यान का संपादित रूप । व्याख्यान हेतु आमंत्रित करने के लिए क्लब के पदाधिकारियों श्री जे पी शाही ,श्री संजीव सर्राफ और डॉ चौधरी के प्रति आभार ।)

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