लोक शिक्षक विवेकानंद /सदानन्द शाही
विवेकानन्द भारत की उन्नति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा इस धारणा को मानते हैं कि ‘संसार में हम सर्वोच्च जाति के हैं।’ उनका मानना है कि यह धारणा हमें दूसरों से कुछ भी सीखने से रोकती है। विवेकानन्द मानते हैं कि भारतीयों का शेष दुनिया से अलग-थलग रहना और संसार की गति के अनुरूप चलना न सीख पाना ही भारतीय मन की अवनति का प्रमुख कारण हैं।इसीलिए अपनी शिक्षाओं में वे धार्मिक अलंकरण की जगह धर्म के सार तत्व को स्थापित करने की बात करते हैं।
विवेकानन्द मन्दिर मूर्ति देवी-देवताओं की बात करते-करते अचानक कह उठते हैं-‘आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्म भूमि भारत माता ही हमारी आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ध्यान इसी ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। सर्वत्र उसके हाथ हैं, सर्वत्र उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं।’ विवेकानन्द यहाँ तक कहते हैं कि समझ लो बाकी सब देवता सो रहे हैं। अपने मानव धर्म को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं ‘ये मनुष्य और पशु जिन्हें हम आस-पास और पीछे देख रहे हैं, ये ही हमारे ईश्वर हैं। इनमें सबसे पहले पूज्य हैं हमारे अपने देशवासी। परस्पर ईर्ष्या-द्वेष करने और झगड़ने के बजाय हमें उनकी पूजा करनी चाहिए। यह ईर्ष्या-द्वेष और कलह अत्यन्त भयावह कर्म है।’ यहाँ आकर विवेकानन्द का मानव धर्म हमारे सामने प्रत्यक्ष होता है।
विवेकानन्द के मानव धर्म का आधार यही लोक है इसीलिए वे धर्म शिक्षा पर जितना जोर देते हैं उतना ही लोक शिक्षा पर भी जोर देते हैं . वे आधुनिक शिक्षा की आलोचना इस आधार पर करते है कि यह हमें निषेधात्मक बनाती है। वे कहते हैं कि ‘निषेधात्मक बाते सीखते-सीखते बालक जब सोलह वर्ष की अवस्था को पहुँचता है निषेधों की खान बन जाता है-उसमें न जान रहती है न रीढ़।’ जान और रीढ़ के बिना स्वतंत्र विचारों की कल्पना ही नहीं की जा सकती । विवेकानन्द की बात आज भी सही है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में स्वतन्त्र विचारों के मनुष्य पैदा करने की क्षमता ही नहीं है।
स्वतंत्र विचारों को विवेकानंद धर्म जैसा अहमियत देते हैं । यह स्वतंत्र विचार तभी संभव है जब समूचा लोक शिक्षित हो । उनका प्रसिद्ध कथन है कि यदि मुहम्मद पहाड़ के पास नहीं जाता तो पहाड़ ही मुहम्मद के पास क्यों न जायें। हिन्दुस्तान का गरीब मेहनतकश किसान यदि शिक्षा के पास नहीं पहुँचता तो शिक्षा को उसके पास पहुँचना चाहिए। विवेकानन्द इसके लिए धर्मोपदेश करते हुए घूमने वाले संन्यासियों का भी आह्वान करते हैं कि उन्हें अपने को लोक शिक्षक के रूप में संगठित करके धर्मोपदेश करने के साथ लोगों को ज्ञान विज्ञान की शिक्षा भी देनी चाहिए। यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि आज विज्ञान के गर्भ से उपजी हुई तकनीक जन समुदाय के बीच रूढि़ और अन्धविश्वास फैलाने में लगी है और लगभग सौ साल पहले एक संन्यासी जन साधारण को ज्ञान विज्ञान से लैस करना चाहता है।
विवेकानंद एक घुमन्तू शिक्षालय की कल्पना करते हैं जो गरीब और असहाय लोगों के पास पहुँचकर उन्हें शिक्षित करे।इसीलिए वे लोक भाषाओं मेँ शिक्षा को महत्व देते हैं । लोकभाषा की बात करते हुए विवेकानन्द इतिहास से भी सबक लेते हैं। महात्मा बुद्ध ने जनता की भाषा में उपदेश किया और व्यापक जन तक अपनी शिक्षाओं को पहुँचाने में सफल हुए। इसीलिए विवेकानन्द प्रस्ताव करते हैं कि मातृभाषाओं के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए।
विवेकानन्द इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि इस देश में स्त्रियों और पुरुषों में इतना भेद क्यों रखा गया है। वेदान्त की घोषणा है कि सभी प्राणियों में परमात्मा विद्यमान है। इसलिए विवेकानन्द को यह बात सख्त नागवार लगती है कि स्त्रियों को इस देश में महज सन्तानोत्पादक यन्त्र बनाकर रखा गया है। इसकी असली वजह उन्हें शिक्षा से वंचित करना रहा है। इसीलिए विवेकानन्द जनसामान्य की शिक्षा पर जितना जोर देते है उतना ही जोर स्त्री शिक्षा पर भी देते हैं।
विवेकानन्द स्त्रियों को अबला के रूप में शिक्षित करने के खिलाफ है। वे भारतीय स्त्रियों की सभी समस्याओं के मूल में उनके भीतर शिक्षा का अभाव मानते हैं। इसीलिए वे स्पष्ट तौर पर घोषित करते हैं कि स्त्रियों की सभी समस्यायें शिक्षा नाम के जादू से खत्म की जा सकती है। तमाम परम्परागत बातों पर जोर देते हुये भी विवेकानंद स्त्री को स्वाधीन देखता चाहते हैं-‘स्त्रियों को ऐसी अवस्था में रखना चाहिये कि वे अपनी समस्याओं का अपने ही तरीके से हल कर सकें। हमारी भारतीय स्त्रियाँ इस कार्य में संसार की अन्य स्त्रियों के समान ही दक्ष हैं।’शक्ति पूजा के केन्द्र बंगाल मे रहते हुए विवेकानन्द ने अनुभव किया कि महज प्रतीक रूप में शक्ति पूजा करने से काम नहीं चलेगा। जरूरत यथार्थ शक्तिपूजा की है। वे कहते हैं- ‘यथार्थ शक्ति पूजक तो वह है, जो यह जानता है कि ईश्वर विश्व में सर्वव्यापी शक्ति है और जो स्त्रियों में उस शक्ति का प्रकाश देखता है।‘
विवेकानन्द हिन्दुस्तान में इस यथार्थ शक्तिपूजा के हिमायती थे। इस यथार्थ शक्तिपूजा का मूल मन्त्र स्त्री शिक्षा में देखते हैं। वे स्त्रियों के लिए अलौकिक और लौकिक दोनों तरह की शिक्षा की जरूरत पर बल देते हैं। ऐसी शिक्षा जो स्त्रियों को स्वतंत्र और शक्तिशाली बनाये, दूसरे गुणों के साथ उनके भीतर शूरता और वीरता का संचार करे।
वास्तव में विवेकानन्द शिक्षा को सर्वजन सुलभ बनाने वाले विचारक हैं। वे मानते थे कि भारतीय समाज मे परम्परा से जिन लोगों को शिक्षा और ज्ञान से वंचित रखा गया और शक्तिहीन, गुलाम और दरिद्र बनाया गया उन्हें शिक्षित करना सबसे जरूरी है। हिन्दुस्तान का किसान, मजदूर, दलित उपेक्षित वर्गों के साथ स्त्रियाँ भी शिक्षा के वरदान से वंचित रखी गयी थीं। शिक्षा को ही बन्धन में बांध कर रखा गया था। विवेकानन्द शिक्षा को हर तरह के बन्धन से मुक्त करने का आह्वान करते हैं। उनका दृढ़ मत था कि जाति, धर्म, लिंग, भाषा आदि के बंन्धन से मुक्त करके सर्वजन सुलभ बनाने मेँ ही शिक्षा की सार्थकता है ।
4 जुलाई 2015

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