रामायण और महाभारत भारतीय मन को निर्मित और नियन्त्रित करने के स्रोत रहे हैं। इसलिए परिवर्तन के प्रत्येक दौर में इन महाकाव्यों को आधार बनाकर अपने विचारों और मान्यताओं को व्यक्त करने की कोशिशें हुई हैं। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को निरूपित करने की दृष्टि से भी इन दोनों महाकाव्यों का काफी उपयोग हुआ है। इस नजरिये से देखें तो सीता के चरित्र का सर्वाधिक उपयोग हुआ है। सीता और सावित्री का नाम एक साथ लिया जाता रहा है। सावित्री एक दूसरा पौराणिक चरित्र है जिसे सती का दर्जा प्राप्त है क्योंकि वह यमराज से लड़कर अपने पति सत्यवान को वापस लाने में कामयाब हुई थी। राम मनोहर लोहिया बिल्कुल ठीक कहते हैं कि सिवा इसके सावित्री के चरित्र में और कोई खास बात दिखाई नहीं देती। अपने को पूरी तरह पति या पुरुष में लीन कर देने और पुरुष की प्रधानता को स्थापित करने के लिए सावित्री की कथा से उपयुक्त दूसरी कोई कथा हो ही नहीं सकती थी। सीता का नाम सावित्री के साथ लेने के पीछे केवल अनुप्रास का लोभ नहीं बल्कि सीता की तेजस्विता को सीमित करके उन्हें सहज अनुगामिनी के रूप में बदलने की कोशिश भी है।
पराक्रम, त्याग, नीति, कौशल आदि राम के ऐसे गुण हैं जिनके लिए भारतीय मानस में बेइन्तहा सम्मान है। मर्यादा पुरुषोत्तम होने के योग्य शायद ही कोई दूसरा चरित्र हो। स्त्री सम्बन्धी कोई आदर्श स्थापित हो तो राम की पत्नी सीता से ज्यादा उपयुक्त और कौन होगा। इसलिए सीता को सावित्री के साथ जोड़ करके उन्हें सावित्री की छायाप्रति के रूप में विकसित करने की कोशिश की गई। जबकि सीता की निजी चारित्रिक विशेषताएँ और विशिष्टताएँ कुछ और थीं। सीता पति या पुरुष की उस तरह से सहज अनुगामिनी नहीं थीं, जिस तरह के स्त्री आदर्श को वर्णाश्रम व्यवस्था निर्मित करना चाहती रही है।
विपरीत समय में, सीता राम के साथ रहीं, उनके आदेशों का पालन किया पर कहीं भी सीता ने अपने स्वत्व को स्थगित नहीं किया। यह सब उन्होंने तर्क और विवेक के साथ किया। जहाँ जरूरी हुआ वहाँ पर विक्षोभ की अभिव्यक्ति हुई है। यह सब ऐसी चीजे हैं जो सीता के चरित्र को वर्णाश्रमी ढंग की स्त्री का रोल माडल बनाने में असुविधा पैदा करती है। खास तौर से दो ऐसे अवसर हैं जब सीता की तेजस्विता, तर्क बुद्धि और विक्षोभ प्रकट होता है। पहली अग्नि परीक्षा और दूसरा निष्कासन। सीता के जीवन की दो ऐसी घटनाएँ हैं जो राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को भी प्रश्नांकित करती हैं। इसलिए उन्हंें नजरन्दाज करने और झुठलाने की कोशिशें भी की जाती रही हैं।
नाना पुराण निगम आगम तथा इसके अतिरिक्त भी उपलब्ध स्रोतों को खँगालने के बाद रामकथा लिखने वाले तुलसीदास भी इस प्रसंग को बचा ले गये हैं। रामचरित मानस में जिस सीता का अपहरण होता है वह असली सीता हैं ही नहीं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम को पहले से ही मालूम है कि सीता का हरण होगा और उन्हें अपार कष्ट झेलना पड़ेगा। इसलिए वे असली सीता को अग्निदेव की सुरक्षा में दे देते हैं। रावण जिस सीता का हरण करता है वह माया की सीता हैं। अग्नि परीक्षा में होता सिर्फ यह है कि माया की सीता अग्नि में प्रवेश करती हैं और असली सीता को अग्निदेव वापस लौटा देते हैं। यहाँ अग्नि परीक्षा का नाटक सिर्फ लोकादर्श स्थापित करने के लिए होता है। इस तरह लोकादर्श भी स्थापित हो गया और सीता को कोई कष्ट भी नहीं हुआ। साॅप भी मर गया और लाठी भी बच गयी। राम का मर्यादा पुरुषोत्तम वाला रूप भी कायम रह गया। अब जब असली सीता का हरण ही नहीं हुआ तो फिर आगे की कहानी को वैसे भी ‘रामराज्य बैठे त्रैलोका हर्षित भए गए सब सोका’ पर आकर खत्म हो जाना था।
रामचन्द्र शुक्ल, तुलसीदास की जिस बात पर सबसे ज्यादा रीझते हैं वह है मार्मिक स्थलों की पहचान। मार्मिक स्थलों की यह पहचान तुलसीदास के यहाँ दुतरफा है। कुछ मार्मिक स्थलों को पहचान कर उन्हें पर्याप्त विस्तार देना और कुछ मार्मिक स्थलों को ठीक से पहचान कर (मसलन सीता निर्वासन और शम्बूक बध) छोड़ देना। तुलसीदास कहते भी हैं- ‘संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने’ं। अपने इसी विवेक से तुलसीदास ने सीता निर्वासन और शम्बूक बध आदि प्रसंगों को छोड़ दिया है। पराये घर में रह आयी स्त्री को घर में आदर पूर्वक रखना वर्णाश्रमी मर्यादा के बरक्स स्वैराचार को प्रोत्साहित करता। दूसरी तरफ गर्भवती सीता का बियावन जंगल में निर्वासन राम की दयालुता और करुणा आदि को प्रश्नांकित करता। इसलिए रामचरितमानस में तुलसीदास ने इस प्रसंग की भनक नहीं लगने दी है। सवाल मर्यादा पुरुषोत्तम का है।
जनमानस में तुलसीदास और रामचरित मानस को जो स्वीकृति मिली हुई है उसकी वजह से रामकथा के इस प्रसंग की गंभीरता और अर्थवत्ता प्रायः नजरन्दाज कर दी जाती है। बहुतेरे ऐसे रामभक्त भी मिल जायेंगे जो सीता निर्वासन के प्रसंग को ही खारिज कर देते हैं। इसके लिए यह तर्क दिया जाता है कि वाल्मीकि रामायण का उत्तरकाण्ड प्रक्षिप्त है। राम की छवि को धूमिल करने के लिए किसी ने यह प्रसंग जोड़ दिया है। इसके पक्ष में यह दलील दी जाती है कि यदि उत्तरकाण्ड की कथा प्रामाणिक होती तो महाभारत के रामोपाख्यान में भी इसका उल्लेख होता। प्रामाणिकता और अप्रामाणिकता के प्रसंग में जाने की न तो मेरी योग्यता है और न ही यहाँ इसकी जरुरत है। सिर्फ इतना कहना काफी है कि रामायण के लंका काण्ड में और महाभारत में लंका विजय के बाद और अग्नि परीक्षा के पहले राम जिस तरह सीता को सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हैं- सीता का निष्कासन उसकी स्वभाविक परिणति लगता है। अस्तु, सीता का निर्वासन रामकथा का स्वाभाविक अंग है। इसकी पुष्टि लोक और शास्त्र दोनों ही करते हैं। अब इससे राम की मर्यादा पुरुषोत्तम और सीता की मोम की गुड़िया वाली छवि खंडित होती हो तो हो।
(2)
शुरू तुलसीदास से ही करें। तुलसीदास के पूरे साहित्य में सीता निर्वासन के प्रसंग की चर्चा सिर्फ गीतावली में मौजूद है। वह भी एक पद में। पद अत्यन्त मार्मिक है। तुलसीदास वर्णाश्रम व्यवस्था को और शास्त्र को महत्व देने वाले व्यक्ति हैं, पर कवि तुलसीदास लोक में भी गहरे धँसे हुए हैं। गीतावली के इस पद में तुलसीदास की वाणी में लोक मन की अभिव्यक्ति हुई है-
तौ लौं बलि आपुही कीबी विनय समुझि सुधारि।
जौ लौं हौं सिखि लेउँ वन रिषि-रिति बसि दिन चारि।।
तापसी कहि कहा पठवत नृपन को मनुहारि।
बहुरि तिहि विधि आइ कहिहंै साधु कोउ हितकारि ।।
लखन लाल कृपाल ! निपटहि डारिबी न बिसारि।
पालबी सब तापसनि ज्यों राजधरम विचारि।।
सुनत सीता बचन मोचत सकल लोचन - बारि।
बाल्मीकि न सके तुलसी सो सनेह सॅभारि।। (1)
सीता को वन में छोड़कर जाते समय लक्ष्मण उनसे पूछते है कि राम के लिए कोई सन्देश हो तो कह दें। इस पर सीता जवाब देती हैं- तब तक आप अपनी ही समझ से सुधार कर मेरा विनय उनसे कह दीजिएगा, जब तक कि मैं वन में दो चार दिन रह कर यह सीख नहीं लेती कि वनवासी तपस्विनियाँ राजाओं महाराजाओं को किस भाषा में और क्या सन्देश देती हैं। यह जान लेने के बाद आते जाते किसी उपकारी साधु से अपना सन्देश भेज दूँगी। इस जवाब में सीता क्या नहीं कह देती हैं। गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक ने सवाल उठाया है- बंद ेनइंसजमतद ेचमंा घ् क्या जो हाशिए पर हैं, वंचित और उपेक्षित हैं वे बोल सकते हैं? सीता की भाषा देखिए। यह पति को परमेश्वर मानकर पूजने वाली स्त्री की भाषा नहीं है। राम ने जो अपमान किया है उससे सीता क्षुब्ध हैं। साथ ही विवश भी हैं।विवशता और क्षोभ दोनों की अभिव्यक्ति हो रही है। कल तक जो सीता महारानी थीं रातो-रात वनवासी तपस्विनी हो गयी हैं। हैसियत बदल गयी है। प्रेम और समर्पण का जो सहज सम्बन्ध है- राम उसके पात्र नहीं रह गये हैं। इसलिए पुरानी भाषा का प्रयोग नहीं किया जा सकता। जो नयी वास्तविकता है नयी सचाई है उसकी भाषा अभी तक नहीं सीख पाई हैं। वंचितों की भाषा सीख लें तब कोई सन्देश दें। सन्देश प्रियतम राम को नहीं महाराजाधिराज को देना है। साधारण वनवासी तपस्विनियाँ महाराजाधिराज को किस तरीके से संबोधित करती है। यह जान लेना आवश्यक है। एक बात और है-लक्ष्मण जो सन्देश ले जाने के लिए प्रस्तुत हैं वे महाराजाधिराज के भाई हैं। वे सभी तपस्विनियों का संवाद तो ले नहीं जाते हैं। कोई आता-जाता राही बटोही साधु संन्यासी ही यह संवाद राज दरबार तक ले जा सकता है। तो फिर मुझे यह विशेषाधिकार क्यों ? सीता अपने सभी विशेषाधिकारों की भी तिलांजलि दे देती हैं। लखन लाल से भी उन्हें कोई व्यक्तिगत अनुकम्पा नहीं चाहिए। वे उनसे न भूलने का अनुरोध इसलिए करती हैं कि यह राजधरम है। प्रकारान्तर से यह राम के राज धरम पर भी टिप्पणी है।
अभिप्राय यह कि तुलसीदास भी जब इस प्रसंग को उठाते हैं तो वे न केवल राम के अन्याय के प्रति सीता के क्षोभ को व्यक्त करते हैं बल्कि काफी हद तक उनके साथ खड़े हैं।
राम के सीता के प्रति व्यवहार और सीता के क्षोभ की अभिव्यक्ति के कुछ और रूप देखें। क्रौंच पक्षी के शोक को श्लोक का रूप देने वाले आदि कवि वाल्मीकि के यहाँ दोनांे प्रसंग मिलते हैं। वाल्मीकि रामकथा के रचयिता ही नहीं वे स्वयं इस कथा के महत्वपूर्ण किरदार भी हैं। खास तौर से सीता निर्वासन से लेकर लवकुश के पालन-पोषण और अश्वमेध यज्ञ में राम से उनके युद्ध और सीता के धरती में प्रवेश आदि घटनाओं के सूत्रधार और साक्षी।
लंका पर विजय हासिल करने के बाद सीता राम के सम्मुख लायी जाती हैं। उस समय राम ने सीता के चरित्र पर सन्देह करते हुए जो बातें की हैं वह किसी मर्यादा पुरुषोत्तम की नहीं बल्कि एक पुरुष प्रधान समाज के औसत पुरुष का कथन ही जान पड़ता है। राम के सन्देह का सबसे प्रमुख कारण है सीता का शारीरिक सौन्दर्य। राम कहते हैं-‘सीते ! तुम जैसी दिव्य रूप सौन्दर्य से सुशोभित मनोरम नारी को अपने घर में स्थित देखकर रावण चिरकाल तक तुमसे दूर रहने का कष्ट नहीं सह सका होगा।’2 यानी सीता का सौन्दर्य ही उनका सबसे बड़ा शत्रु बन गया। पूरे एक सर्ग में राम यह समझाते हैं कि सीता देवि, यह युद्ध मैंने आपको प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि आपके अपहरण से मेरे महान कुल पर जो धब्बा लग गया था उसे दूर करने के लिए किया और अपने पराक्रम से जीता है।3 ध्यान रहे कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम ये सारी बातें सीता से अकेले में नहीं बल्कि भरी सभा में कह रहे हैं। ऐसा लगता है कि राम भरी महफिल में सीता को बेइज्ज्त करके मन की कोई भड़ास निकाल रहे हैं। रावण की मृत्यु के बाद सीता जिस उम्मीद से राम के सम्मुख आयी थीं या बुलायी गयी थीं स्थिति उसके एकदम उलट थी। थोड़ी ही देर पहले लंका पर राम का आधिपत्य स्थापित होने के बाद हनुमान राम का सन्देश लेकर पहुँचते हैं और सीता से कहते हैं-‘श्री राम ने आपको यह सन्देश दिया है-देवि मैंने तुम्हारे उद्धार के लिए जो प्रतिज्ञा की थी, उसके लिए निद्रा त्यागकर अथक प्रयत्न किया और समुद्र में पुल बाँध कर रावण बध के द्वारा उस प्रतिज्ञा को पूर्ण किया’(4)। यह सन्देश मिलने के बाद सीता जब सामने आती हैं तो राम का व्यवहार देखने लायक है। वे सीता के चरित्र पर सवाल उठाते हैं ‘तुम्हारे चरित्र में संदेह का अवसर उपस्थित है; फिर भी तुम मेरे सामने खड़ी हो। जैसे आँख के रोगी को दीपक की ज्योति नहीं सुहाती उसी प्रकार आज तुम मुझे अत्यन्त अप्रिय जान पड़ती हो(5)।’ राम का तर्क यह है कि कौन ऐसा कुलीन पुरुष होगा जो तेजस्वी होकर भी दूसरे के घर में रही स्त्री को मन से भी ग्रहण कर सकेगा। इसलिए राम सीता से साफ शब्दों में कहते हैं- ‘अतः जनक कुमारी! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो चली जाओ। मैं अपनी ओर से तुम्हें अनुमति देता हूँ। भद्रे ये दशों दिशाएँ तुम्हारे लिए खुली हैं। अब तुमसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है(6)।’ यह कहने के बाद राम उन्हें विकल्प भी सुझा देते हैं। भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, वानर राज सुग्रीव अथवा राक्षस राज विभीषण जहाँ तुम्हें सुख मिले जा सकती हो।7 यहाँ राम सीता के चरित्र पर सन्देह करते ही हैं इस सन्देह के दायरे में भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, सुग्रीव और विभीषण सब आ जाते हैं। भय में, पराजय में, लाभ में और हानि में समभाव रखने वाले राम का यह विचलन अचम्भित करने वाला है।
अब महाभारत के राम का भी थेाड़ा जायजा ले लिया जाय। लंका विजय के बाद सीता जब सामने आती हैं तो राम कहते हैं- ‘विदेह कुमारी! मैने तुम्हें रावण की कैद से छुड़ा दिया अब तुम जाओ मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा कर दिया।’8 इसके बाद राम सारी हद पार कर देते हैं। वे कहते हैं-
सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि।
नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढ़ं हविर्यथा।। 9
अर्थात ‘मिथिलेश नन्दिनी! तुम्हारा आचार-विचार शुद्ध रह गया हो अथवा अशुद्ध अब मैं तुम्हें अपने प्रयोग में नहीं ला सकता-ठीक उसी तरह जैसे कुत्ते के चाटे हुए हविष्य को कोई भी ग्रहण नही करता है’। क्या सीता राम के लिए हवन सामग्री हैं। यदि ऐसा है तो वह कौन सा यज्ञ है जिसके लिए सीता महज हवन सामग्री हैं और जूठी हो जाने पर सर्वथा अनुपयुक्त हो जाती हैं। यह महज बानगी मात्र है। स्त्री के बारे में राम के ऐसे संकीर्ण विचारों को उदधृत किया जाय तो अपने आप में एक पूरा ग्रंथ तैयार हो जाय।
स्वयंभू के पउमचरिउ में राम कहते है कि ‘‘नदी की तरह कुटिल महिला का कौन विश्वास कर सकता है, भले ही दुष्टा महिला मर जाय, पर वह देखती किसी को है और ध्यान करती है किसी दूसरे को। उसके मन में जहर होता है, शब्दों में अमृत और दृष्टि मंे यम होता है, स्त्री के चरित्र को कौन जानता है, वह महानदी की तरह दोनों कूलों को खोद डालती है। चन्द्रकला के समान सबपर टेढ़ी नजर रखती है, दोष ग्रहण करती है, स्वयं कलंकिनी होती है, नयी बिजली की तरह वह चंचल होती है, गोरस मन्थन की तरह कालिमा से स्नेह करती है, सेठों के समान कपट और मान रखती है, अटवी के समान आशंकाओं से भरी हुई होती है, निधि के समान वह प्रयत्नों से संरक्षणीय है, गुड़ और घी की खीर की भाँति वह किसी को भी देने योग्य नहीं है।’’ 10
मैं कहना यह चाहता हूँ कि ‘जगज्जननी सीता’ के बारे में इतने कुत्सित विचारों के बावजूद राम हमारे समाज में मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में माने और पूजे जाते हैं। इसी से अन्दाज लग सकता है कि हमारे समाज में स्त्री की स्थिति कितनी नीचे गिरी हुई है। सीता बार-बार कहती हैं कि ‘जो मेरे अधीन है वह मेरा हृदय सदा आप में ही लगा रहता है (उस पर दूसरा कोई अधिकार नहीं कर सकता) परन्तु मेरे अंग तो पराधीन थे। उनका यदि दूसरे से स्पर्श हो गया तो मैं विवश अबला क्या कर सकती हूँ।11’ वे बार-बार कहती हैं कि रावण के शरीर से मेरे शरीर का स्पर्श हो गया इसमें मेरी विवशता ही रही है। मैंने स्वेच्छा से ऐसा नहीं किया था। अपनी ही जीवन संगिनी की इस विवशता को राम किसी तरह से समझने को तैयार नहीं हैं। वे न केवल सीता को बल्कि समूची स्त्री जाति को सन्देह की नजर से देखते हैं। इस पर सीता की टिप्पणी देखने लायक है-
पृथकस्त्रीणां प्रचारेण जातिं त्वं परिशकुसे (12)
अर्थात ‘नीच श्रेणी की स्त्रियों का आचरण देखकर यदि आप समूची स्त्री जाति पर सन्देह करते हैं तो यह उचित नहीं है।’ वंचित तबके के लिए एक व्यक्ति या सदस्य की गलती को पूरे वर्ग के चरित्र लक्षण के रूप में देखना या निरूपित करना प्रभावशाली समूहों की आम प्रवृत्ति है। यहाँ राम का आचरण इसी तरह का है। सीता की नजर में राम की यह प्रवृत्ति ओछे मनुष्य की प्रवृत्ति है। वे कहती हैं- ‘नृपश्रेष्ठ! आपने ओछे मनुष्य की भाँति केवल रोष का ही अनुसरण करके मेरे शील स्वभाव का विचार छोड़ कर केवल निम्नकोटि की स्त्रियों के स्वभाव को ही अपने सामने रखा है(13)।’ राम को ओछा मनुष्य कहने का यह साहस सीता के व्यक्तित्व के एक अलग ही रूप को प्रकाशित करता है। आम तौर पर जिससे हमारा परिचय नहीं है। सीता यह कहती हैं कि यदि मुझे त्यागना ही था तो यह बात आपने तभी कहला दी होती जब आपने हनुमान को मेरा हाल जानने के लिए भेजा था। मैं उसी समय अपना प्राण त्याग देती और आपको और आपके साथियों को युद्ध का यह श्रम नहीं करना पड़ता। फिर इस प्रकार अपने जीवन को संकट में डालकर आपको यह युद्ध आदि का व्यर्थ का परिश्रम नहीं करना पड़ता तथा आपके ये मित्र लोग भी अकारण कष्ट नहीं उठाते (14)। सीता इतनी सरलता से उस महायुद्ध की व्यर्थता की ओर इशारा करती हैं जो राम के पौरुष, प्रभुत्व और पराक्रम की महागाथा है। वे राम के पराक्रम और पुरुष अहं दोनो की हवा निकाल देती हंै। पर अहं तो अहं है। सीता को अग्नि परीक्षा तो देनी ही होगी। इस पूरे प्रसंग में राम ने जैसे अपना विवेक ही खो दिया है। वाल्मीकि कहते हैं- उस समय श्री रघुनाथ जी प्रलयकालीन संहारकारी यमराज के समान लोगों के मन में भय उत्पन्न कर रहे थे। उनका कोई भी मित्र उन्हें समझाने उनसे कुछ कहने अथवा उनकी ओर देखने का साहस न कर सका(15)। सीता अपनी सचाई को प्रमाणित करने के लिए लक्ष्मण से चिता सजाने के लिए कहती हैं। न चाहते हुए भी राम का इशारा पाकर लक्ष्मण चिता तैयार करते हैं। देखते-देखते सीता सबके सामने आग में प्रवेश कर जाती हैं। यद्यपि यहाँ सीता अग्नि परीक्षा में सफल होती हैं और साक्षात अग्नि देवता उन्हें लेकर प्रकट होते हैं। अग्नि देव से सीता का चरित्र प्रमाण पत्र पाकर राम आश्वस्त होते हैं। थोड़ी देर पहले तक क्रोध में अन्धे होकर विवेक शून्य बातें करने वाले राम यहाँ तक कह डालते हैं कि मुझे अच्छी तरह मालूम है कि सीता प्रज्वलित अग्नि शिखा के समान दुर्धर्ष तथा दूसरों के लिए अलभ्य हैं। दुष्टात्मा रावण मन के द्वारा भी इनके उपर अत्याचार करने में समर्थ नहीं हो सकता था(16)। प्रश्न उठता है कि जब सीता की तेजस्विता के बारे में राम को इतना अखण्ड विश्वास था फिर अग्नि परीक्षा लेने की जरूरत क्या थी? राम स्वयं कहते हैं कि सीता रावण के घर में रही थी ं इसलिए परीक्षा के बगैर उनके साथ रहने पर लोग मुझे कामी और मूर्ख समझ लेते। राम एक और तर्क देते हैं। मैं तो सीता के चरित्र के प्रति पहले ही आश्वस्त था लेकिन मैं चाहता था कि सीता की शुद्धता के बारे में त्रैलोक्य को पता चल जाये, इसलिए उन्हें अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा।17 अग्नि परीक्षा से सीता के चरित्र के बारे में त्रैलोक्य कितना आश्वस्त हुआ और स्वयं राम किस हद तक आश्वस्त हुए इसकी चर्चा थोड़ा आगे करेंगे।
थोड़ी देर रुक कर अग्नि परीक्षा के सामाजिक सन्देश पर विचार कर लें। मेरी जानकारी में स्त्री को अपनी शुचिता प्रमाणित करने के लिए अग्नि परीक्षा देने की यह पहली घटना है। इससे राम भक्तों के इस देश में त्रैलोक्य को स्त्री की शुचिता की परीक्षा लेने और पुरुष वर्चस्व को स्थापित करने का एक बड़ा हथियार मिल गया। जब जगज्जननी सीता अग्नि परीक्षा से गुजर सकती हैं तो फिर साधारण स्त्रियाँ क्यांे नहीं। अग्नि परीक्षा से सीता तो बच गईं पर इस दृष्टान्त की वेदी पर करोड़ों स्त्रियाँ अग्नि और अग्निपरीक्षा के हवाले होती रही हैं। हमारे समाज ने स्त्री की शुचिता को नापने का अद्भुत पैमाना विकसित कर लिया और राम की उदात्त कथा शताब्दियों से इस पैमाने को वैधता प्रदान करती आ रही है।
कालान्तर में सीता के निर्वासन की घटना प्रमाणित करती है कि सीता की अग्नि परीक्षा से न तो त्रैलोक्य का मन साफ हुआ और न ही राम का। सीता रावण के घर में रहीं और अब फिर राम के घर में हैं, इस पर धोबी प्रतिकूल टिप्पणी करता है। जाहिर है यह धोबी उसी त्रैलोक्य का हिस्सा है जिसे विश्वास दिलाने के लिए सीता की अग्नि परीक्षा कराई गयी थी। जिस गुप्तचर ने राजा रामचन्द्र तक यह सूचना पहुँचायी वह भी धोबी के तर्क से सहमत लगता है तभी उसने ऐसी सूचना राम तक पहुँचायी। वह गुप्तचर भी इसी त्रैलोक्य का हिस्सा रहा होगा। अब थोड़ा राम की स्थिति पर विचार करें। गुप्तचर से यह खबर मिलते ही राम के भीतर धँसा हुआ काँटा फिर से टभकने लगता है। वे भूल जाते हैं कि सीता अग्नि परीक्षा से गुजर चुकी हैं, सीता की शुचिता और तेजस्विता के बारे में कही गयी अपनी बातें भी भूल जाते हंै। वे भूल जाते हैं कि सीता अग्निशिखा के समान दुर्धर्ष और अलभ्य हैं। दुष्टात्मा रावण उन्हें मन से भी स्पर्श नहीं कर सकता। राम एक बार फिर अपना विवेक खो देते हैं। वे सीता के निष्कासन का निर्णय ले लेते हैं। एक बार फिर वे कोई तर्क सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। लोक निन्दा का भय इतना विकराल रूप ले लेता है कि उसके आगे सब कुछ बेमानी हो जाता है। दर अस्ल यहाॅ मामला सिर्फ लोक निन्दा का नहीं बल्कि स्त्री के प्रति सहज अविश्वास का है, जिसके नाते राम सीता को त्यागने के लिए उद्यत हैं। वे कहते हैं- नर श्रेष्ठ बन्धुओ ! मैं लोक निन्दा के भय से अपने प्राणों को और तुम सबको त्याग सकता हूँ। फिर सीता को त्यागना कौन सी बड़ी बात है।18 सीता यानी महज एक स्त्री जो सभासदों आदि की तुलना में तुच्छ और त्याज्य है। यहँा राम ऐसे राजा के रूप में दिखाई देते हैं जो अपने निर्णय पर कोई तर्क वितर्क नहीं सुनना चाहता। वे कहते हैं सीता के बारे में मुझसे किसी तरह की कोई दूसरी बात तुम्हे नहीं कहनी चाहिए।19 जो मेरे इस कथन के बीच में कूद कर किसी प्रकार मुझसे अनुनय विनय करने के लिए कुछ कहेंगे वे मेेरे अभीष्ट कार्य में बाधा डालने के कारण सदा के लिए मेरे शत्रु होंगे।20 इसके बाद फिर किसकी हिम्मत हो सकती है कुछ बोलने की।कौन राजाज्ञा के विरोध के अपराध का भागी बने?
लक्ष्मण के जिम्मे फिर एक अप्रिय कार्य आता है। उन्हें सीता को वन में छोड़ने की जिम्मेदारी दी जाती है। लक्ष्मण सीता से कहते हैं- ‘विदेह नन्दिनी मेरे हृदय में सबसे बड़ा काँटा यही खटक रहा है कि आज रघुनाथ जी ने बुद्धिमान होकर भी मुझे वह काम सौंपा जिसके कारण लोक में मेरी निन्दा होगी।’21 राम के सहज अनुयायी लक्ष्मण इस आदेश से इतने आहत और अमर्ष में हैं कि वे कह उठते हैं। ‘इस लोक निन्दित कार्य में मुझे लगाना उचित नहीं था।’22 यानी राम और लक्ष्मण का लोक अलग-अलग है। राम बार बार जिस त्रैलोक्य अर्थात लोक का हवाला देते हैं वह स्त्री के प्रति अनुदार है। इसीलिए सीता को एक पल भी घर में रखना राम केा लोक निन्दा का सबब लग रहा है। इसके एकदम उलट लक्ष्मण को सीता के बनवास में सहायक होना लोक निन्दित कार्य लग रहा हैै। यानी राम के लोक से अलग भी एक लोक है जो स्त्री के प्रति उदार और सहानुभूतिशील है। भले ही लोक का यह हिस्सा सामाजिक, राजनीतिक संरचना में हाशिए पर ही रहा हो और उसकी आवाज की परवाह करने की फुरसत राजसत्ता को न हो। इस अवसर पर सीता का सन्देश हाशिए की वह आवाज है जो विवशता के बावजूद वर्चस्वशाली समूहों पर तीखा व्यंग्य करती है। सीता कहती हैं-
‘रघुनन्दन जिस तरह पुरवासियों के अपवाद से बचकर रहा जा सके उसी तरह आप रहें। स्त्री के लिए तो पति ही देवता है, पति ही बंधु है पति ही गुरु है। इसलिए प्राणों की बाजी लगाकर भी विशेष रूप से पति का प्रिय करना चाहिए।’23 अन्तर्निहित व्यंग्य यह कि पति का पत्नी के लिए कोई कर्तव्य नहीं है। एक पुरुष प्रधान समाज में पत्नी के कर्तव्य निर्धारित हैं,मर्यादा निर्धारित हंै। पति का न तो कर्तव्य निर्धारित हैं न मर्यादा। ऐसा लगता है कि राम का मर्यादा पुरुषोत्तम होना मानवता का आदर्श नहीं बल्कि वर्णसत्ता और पुरुष सत्ता का आदर्श है। वे शम्बूक का वध वर्ण की मर्यादा सुरक्षित रखने के लिए करते हैं तो सीता का निष्कासन पुरुष अहं की रक्षा के लिए। राम के कमजोर और दुहरे चरित्र को लक्ष्य करती हुई कालिदास की सीता राम को चुनौती देती हैं। वे लक्ष्मण के माध्यम से राम को कहलाती हैं-‘और राजा से जाकर तुम मेरी ओर से कहना कि आपने अपने सामने ही मुझे अग्नि मंे शुद्ध पाया था। इस समय अपजस के डर से जो आपने मुझे छोड़ दिया है वह क्या उस प्रसिद्ध कुल को शोभा देता है जिसमें आपने जन्म लिया है।’24 तुलसी दास की सीता महाराजाधिराज को सन्देश देने के लिए उपयुक्त भाषा सीखने का इन्तजार करती हैं। कालिदास की सीता का संबोधन देखने लायक है ‘और राजा से जाकर तुम मेरी ओर से कहना।’ राम अब प्रिय या पति नहीं महज एक राजा हैं। ऐसे राजा जो अन्याय तो करते ही हैं अपमान भी कर रहे हैं। इसलिए राम बार बार जिस कुल की दुहाई देते हैं, श्रेष्ठता का डंका पीटते हैं, सीता (और कालिदास) को राम का यह आचरण उसी कुल की मर्यादा के अनुरूप नहीं लगता।
राम का यह व्यवहार कालिदास के वाल्मीकि को इतना खराब लगता है कि वे राम का नाम तक नहीं लेना चाहते। वे राम को भरत के बड़े भाई के रूप मंे याद करतें हैं। यह भी एक लोक है जो राम का नाम लेने से गुरेज करता है। आम तौर पर गर्हित काम करने वाले का नाम नहीं लिया जाता। राम ने गर्भवती सीता को निर्वासित करके ऐसा ही गर्हित काम किया है। ‘यद्यपि वे तीनो लोकों का दुख दूर करने वाले हैं, अपनी प्रतिज्ञा के पक्के हैं और अपने मुँह से अपनी बड़ाई भी नहीं करते, फिर भी तुम्हारे साथ जो उन्होंने भद्दा व्यवहार किया है, इसे देखकर मुझे भरत के भाई पर बड़ा क्रोध आ रहा है।’25 लोक में आज भी यह परम्परा है कि गर्हित कार्य करने वाले व्यक्ति का लोग नाम भी नहीं लेना चाहते। कालिदास के वाल्मीकि राम को नाम से पुकारने के बजाय भरत का भाई कहते हैं।
जिस लोक निन्दा के भय से राम ने सीता का निष्कासन किया किया मजे की बात है कि लोक के एक हिस्से में भी इसके लिए राम निन्दित होते रहे हैं। लोक गीतों में एक कथा प्रसंग मिलता है। राम एक वन से दूसरे वन जा रहे है। तीसरे वृन्दावन में गुल्ली डंडा खेलते हुए दो बालक मिलते हैं। उन्हें देखकर राम मोहित हो जाते हैं और पूछते हैं-
गुल्ली-डंडा खेलत दुइ बलकवा देखि राम मोहन,
केकर तू पुतवा नतियवा केकर हौ भतिजवा
लरिका कौनी महतरिया के कोखिया जनमि जुडवायउ हो, (26)
(तुम किसके बेटे हो, नाती किसके हो, किसके भतीजे हो किस माँ की कोख से जन्म लेकर उसे तृप्त कर रहे हो)
इस पर बच्चे जवाब देते हैं-
बाप के नउवा न जानौ लखन के भतिजवा
हम राजा जनक के नतिया सीता के दुलरुवा हो। (27)
(पिता का नाम नही मालूम, लखन के भतीजे हैं, राजा जनक के नाती हैं और सीता के दुलारे हैं)
लोक कवि का अन्दाज देखिए। बच्चे कहते हैं पिता का नाम नही मालूम मगर हम लक्ष्मण के भतीजे हैं राजा जनक के नाती और सीता के दुलारे हैं। जिस राम के नाम की इतनी महिमा गायी जाती है लोक कवि उस नाम से जान बूझ कर परहेज करता है। कालिदास की तरह लोक गीतों में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं।
निष्कासन के समय सीता का आहत स्वाभिमान क्षुब्ध है। वे रास्ते में लक्ष्मण को अपना पेट दिखाते हुए अपने गर्भवती होने की खबर देती हैं। उन्हें यह आशंका है कि संभव है राम फिर इसपर शंका करें- मेरी ओर से सारी बातें तुम रघुनाथ जी से कहना और आज तुम भी मुझे देख जाओ। मैं इस समय ऋतुकाल का उल्लघंन करके गर्भवती हो चुकी हूँ।28 सीता के इन अमर्षपूर्ण वाक्यों का निहितार्थ समझना चाहिए। सीता को अयोध्या में अपमान और लांछन के सिवा मिला क्या?
लव-कुश का जन्म होता है। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पलते बढते हैं। अश्वमेध यज्ञ के समय राम से उनका आमना-सामना होता है। सारा प्रसंग जानने के बाद सीता की वापसी की बात चलती है। वाल्मीकि सीता के आचरण के बारे मेेें राम केा आश्वस्त करते हैं। पर बेकार, राम एक बार फिर सीता की शुचिता की परीक्षा लेने का प्रस्ताव करते हैं। वे कहते हैं-‘देवताओं और ऋषियों को उपस्थित देख श्री रघुनाथ जी फिर बोले सुर श्रेष्ठ गण! यद्यपि मुझे महर्षि वाल्मीकि के निर्दोष वचनों से ही पूरा विश्वास हो गया है, तथापि जन समाज के बीच विदेह कुमारी की विशुद्धता प्रमाणित हो जाने पर मुझे अधिक प्रसन्नता होगी।’29 पहली अग्नि परीक्षा के बाद सीता राम के पास रही हैं। निष्कासन के समय वाल्मिकि के आश्रम में दुबारा अग्नि परीक्षा का औचित्य हो सकता है। किन्तु एक बार फिर अग्नि परीक्षा का प्रस्ताव सीता के सम्मुख है। अग्नि परीक्षा का यह प्रस्ताव सीता जैसी स्वाभिमानी स्त्री के लिए घोर अपमान का विषय है। एक बार अग्नि परीक्षा से गुजर कर अपनी शुचिता प्रमाणित करने बाद ही सीता अयोध्या लायी गयीं थीं। कालान्तर में यह अग्नि परीक्षा व्यर्थ सिद्ध हुई। सीता को निष्कासन का दण्ड झेलना पड़ा। अब दुबारा अग्नि परीक्षा का क्या मतलब। जन समाज के समक्ष सीता की विशुद्वता प्रमाणित हो भी गयी जो राम के मन में सन्देह का कीड़ा कुलबुलाता रहता है उसका क्या होगा? जिस अयोध्या से अपमानित और लांछित होकर निष्कासित होना पड़ा फिर वहीं जाने के लिए अग्नि परीक्षा से गुजरना। यह बार बार की अग्नि परीक्षा स्त्री के स्वत्व को कुचलने की कोशिश है। सीता इससे इन्कार करती हैं, उन्हें अपने स्वत्व को विनष्ट करके अयोध्या नहीं जाना। वे धरती मँा की शरण में जाना पसन्द करती हैं।-‘यदि मैं मन वाणी और क्रिया के द्वारा केवल श्री राम की ही आराधना करती हूँ तो भगवती पृथ्वी देवी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। और सीता पृथ्वी में समाहित हो जाती है।’30 पृथ्वी अपनी गोद में सीता को स्थान दे देती हैं। सीता बार-बार के अपमान और लंाछन से मुक्त हो जाती है।
राम के पुरुष अंह और सन्देह के पक्ष में कोई कवि खड़ा नहीं होता। सभी कवि सीता के साथ हुए अन्याय को लक्ष्य करते हैं उनके पक्ष में खड़े होते हंै। वाल्मीकि हों, व्यास हों, कालिदास हों या फिर स्वयं तुलसीदास ही क्यों न हों।
राम जिस लोक की इतनी परवाह करते हैं, जन समाज के सामने सीता की शुद्धता प्रमाणित करने के लिए विकल हैं, उसी जनमानस के भीतर उसी लोक के भीतर एक दूसरा लोक है जो राम से सहमत नहीं है। उस लोक का पाठ भी देखिए। राम के पास तो सीता से वापस चलने को कहने का मँुह ही नही है। वे इसके लिए वसिष्ठ से कहते हैं। वसिष्ठ सीता को समझाते हैं। वसिष्ठ के समझाने पर सीता अयोध्या की ओर दस कदम चलती हैं और अयोध्या न जाने का संकल्प दुहरा देती हैं।
तुम्हारे कहा गुरु करबइ, परग दस चलबइ
फाटल धरती समाबइ, अजोधिया न जाबइ।। 31
गुरु आप के सम्मान के लिए अयोध्या की ओर बस दस कदम चलूँगी। धरती फटेगी उसमें समा जाउंगी। अयोध्या नहीं जाऊंगी। जो अयोध्या स्त्री को अपमानित और लांछित करती है उस अयोध्या जाने से सीता इन्कार करती हैं। सीता की आखों मेें अमर्ष है दुःख है इस बारे में उस अपमान और अमर्ष को लेकर सीता चुप हैं।
सीता अखियँा में भरली वियोग एकटक देखिन
सीता धरती में गइली समाइ किछु नाहीं बोलिन।। 32
(सीता की आँखों में वियोग का भाव है। वे एक टक देखती हैं और चुपचाप धरती में समा जाती हैं।)
सीता का धरती में समा जाना दरअस्ल अयोध्या की सत्ता को चुनौती है। उस सत्ता को जो वर्ण की श्रेेष्ठता स्थापित करने में लगी है, जो पुरुष की श्रेेष्ठता स्थापित करने लगी है- स्त्री का स्वत्व छीनने, उसे अपमानित लांछित और अधीन बनाने में लगी है। सीता का धरती में समा जाना इस अधीनता से इन्कार करना है।
3
अगहन महीने में उत्तर भारत के हिन्दू घरों में शादियाँ नही होतीं। इसके पीछे मान्यता यह है कि अगहन में राम और सीता का विवाह हुआ था। यह एक असफल विवाह था। सीता को अनेक दुःख सहने पड़े। वनवास के दौरान जो कष्ट मिला उसे तो सीता ने खुशी खुशी स्वीकार कर लिया था। रावण के यहाँ जो यातना मिली उसे भी सीता ने राम के नाम पर बर्दाश्त कर लिया। सब कुछ के बाद जब राम सीता कोे सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हैं, अग्नि परीक्षा से गुजरने का अपमान और बाद उन्हें निष्कासन का दण्ड भोगना पड़ता है। यह सीता के दुर्भाग्य का चरम है। इस दुर्भाग्य पर सीता दुखी होती हैं। कहीं वे यह याद करती हैं कि उन्होंने आखिर ऐसा कौन सा कर्म किया था जिसके फलस्वरूप इतना बड़ा दुर्भाग्य उनके जीवन में घटित हुआ है। वे कर्मफल के दायरे में सारे दुखों का अपशमन करती हैं। वाल्मीकि रामायण सहित प्रायः सर्वत्र वे अपने दुर्भाग्य को पिछले जन्म के कर्मों का फल मानती हंै। स्वंयभू लिखित पउमचरित महाकाव्य की परम तेजस्वी सीता अग्नि परीक्षा के बाद अपने सारे दुर्भाग्य को कर्मों का फल मानकर राम को दोष मुक्त कर देती हैं। लेकिन वहाँ पर भी सीता कहती हैं कि हे रघुवर कुछ ऐसा करें की दुबारा स्त्री का जन्म न लेना पड़े।33 सीता से लेकर एक साधारण स्त्री तक यह कामना करती हुई मिल जाती है कि अगले जनम (यदि होता हो तो) स्त्री का जन्म न हो।जीवन के आरम्भ में प्रायः सभी स्त्रियाँ अपने स्त्री होने को एक खास गौरव के साथ देखती हैं। उनका सजना सँवरना हमेशा पुरुष के उपयोग के लिए नहीं बल्कि स्त्रीत्व का उत्सव होता है। किन्तु जीवन में जैसे-जैसे आगे बढ़ती है उसे इस बात का साक्षात्कार हो जाता है, और जैसा कि तुलसीदास भी कहते हैं ‘कत विधि सृजी नारि जग नाहीं, पराधीन सुख सपनेहु नाहीं।’ वह इस नतीजे पर पहुँचती है कि अब उसे स्त्री का जन्म न मिले। इसके कारणों पर गौर करें तो हम पाते हैं स्त्री के जीवन में एक अदृश्य रेखा खिची होती जिसे लक्ष्मण रेखा कहते हैं। जाने अनजाने वह इसका उल्लंघन कर बैठती है। यह लक्ष्मण रेखा है राम रेखा नहीं है। यह भी एक विडम्बना ही है। लक्ष्मण जो रामकथा के हर प्रारूप में सीता के प्रति सहानुभूतिशील रहे हैं, रेखा वही खींचते हैं। तो क्या यह अर्थ लगाया जाय कि स्त्री के लिए प्रेम, सहानुभूति, सदाशयता आदि भी लक्ष्मण रेखा के रूप में ही सामने आती है। जमाना पहले का हो या आज का, मामला प्रेम का हो या अधिकार का, एक अनुल्लंघनीय लक्ष्मण रेखा मौजूद है। इस रेखा के भीतर सीता पूज्य हैं, महादेवी हैं, जगज्जननी हैं। रेखा का अतिक्रमण किया नहीं कि महादेवी से पतिता बनते देर नहीं लगती है। यह लक्ष्मण रेखा दरअस्ल स्त्री के व्यक्तित्व को सीमित करती है। इसलिए जहाँ भी स्त्री अपने व्यक्तित्व को महसूस कर बैठती है लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन हो जाता है। स्त्री की मूर्त से लेकर अदृश्य पराधीनता का सारा मामला इसी लक्ष्मण रेखा से जुड़ा हुआ है। इसलिए स्त्रियों को सुख पूर्वक जीना है तो इस रेखा को आत्मसात करना है। उनके लिए सारा सुख इसी रेखा के भीतर बने रहने में है। इस रेखा के पार जाना, अपने व्यक्तित्व को आकार देना दुख को, दुर्भाग्य को, ग्लानि को, अपमान को, लांछन को निमंत्रण देना है।
सीता के व्यक्तित्व में एक खास बात यह दिखाई देती है कि वे अपने दुर्भाग्य को कोसती हैं। पिछले जन्म के कर्मों का फल मानती हैं। पर उनका सारा दुर्भाग्य अपने इसी जन्म के जिस कर्म का फल है उसे नहीं कोसतीं। अगर सीता ने लक्ष्मण रेखा न पार की होती तो उनका जीवन वैसा दुर्भाग्यपूर्ण न हुआ होता जैसा कि था। तब तो सारा मामला रामराज्य बैठे त्रैलोका हरसित भए गय सब सोका, पर ही समाप्त हो जाता। जाहिर है सब सोका में सीता का भी शोक अन्तर्निहित है। वे अग्नि परीक्षा से गुजरती हैं, धरती में समा जाती हैं पर लक्ष्मण रेखा को पार करने को लेकर अफसोस नहीं जाहिर करतीं। एक परिस्थिति में राम तो कह उठते हैं जो जनतेऊ वन बन्धु बिछोहू पिता वचन मनतेऊ नहि ओहू। सीता ऐसा कोई अफसोस नहीं जाहिर करतीं। सारे दुख और दुर्भाग्य का शिकार होकर भी वे स्त्रीत्व को व्यक्तित्व सम्पन्न बनाती हैं। स्त्री के व्यक्तित्व को आकार देती हैं, उसे सम्प्रभु बनाती हैं। सीता का अयोध्या वापस जाने से इन्कार करना दरअस्ल लक्ष्मण रेखा में वापस लौटने से इन्कार करना है। रेखा के पार जाकर वे स्त्री के व्यक्तित्व को, उसकी अस्मिता को रेखांकित करती हैं। शायद इसीलिए आदि कवि वाल्मीकि ने अपने रामायण को ‘सीतायाश्चरितं महत’ भी कहा है।
सन्दर्भः
1- गीतावली, तुलसीदास
2- नहिं त्वां रावणों दृष्ट्वा दिव्यरूपां मनेारमाम्।
मर्षयेत् चिरं सीते स्वगृहे पर्यवस्थिताम्।।
वाल्मीकि रामायण। युद्ध काण्ड। पञचदशाधिकशततमःसर्गश्लोक- 24
3- (अ) विदितश्चास्तु भद्रं ते याऽयं रण परिश्रमः
सुतीर्णः सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थ ममा कृतः।। वही, श्लोक- 15
(ब) रक्षता तु मया वृत्तमपवादं च सर्वतः
प्रख्यातस्यात्मवंशस्य न्यङ च परिमार्जता।। वही, श्लोक- 16
4- मया ह्यलब्ध निद्रेण धृतेन तव निर्जये।
प्रतिरौषा विनिस्तीर्णा बद्ध्वा सेतुं महोदधौ।।
वाल्मीकि रामायण। युद्ध काण्ड। त्रयोदशाधिकशततमः सर्ग। श्लोक- 11
5- प्राप्त चरित्र संदेहा मम प्रतिमुखे स्थिता।
दीपो नेत्रा तुस्येव प्रति कूलासि मे दृढा।। 5
वाल्मीकि रामायण। युद्ध काण्ड। पञचदशाधिकशततमःसर्ग श्लोक- 17
6- तद गच्छ त्वानुजानेऽद्य यथेष्टं जनकात्मजे
एता दशा दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया।। वही श्लोक- 16
7- तदद्य भदे्र मयैतत् कृत बुद्धिना।
लक्ष्मणे वाच भरते कुरु बुद्धिं यथा सुखम्।।
शत्रुघ्नेवाच सुग्रीवे राक्षसे वा विभीषणे
निवेशया मनः सीतेयथा वा सुखमात्मना।। वही, श्लोक- 22-23
8- उवाच रामो वैदेही परामर्श विशंकितः
गच्छ वैदेहि मुक्ता त्वं यत् कार्य तन्मयाकृतम्।।
महाभारत, रामोपाख्यानपर्व, एकनवत्यधिक द्विश्ततमोऽध्यायः श्लोक-10
9- वही श्लोक- 13
10-।।जंमेट्टिया।। अह खल- महिलहे पाइ जिह कुडिलहे।
को पत्तिज्जई जइ ति मरिज्जइ ।।1।।
अण्णु णिएइ अणु अणु वोल्लावइ। चिन्तइ अण्णु अण्णु मणें भावइ ।।2।।
हियवइ णिवसइ विसु हालाहलु। अमिउ वयणँ दिðिहँ जमु केवलु।।3।।
महिलाहँ तणउ चरिउ को जाणइ। उभय- तउइँ जिह खणइ महा-णइ।।4।।
चन्द-कल व सव्वोवरि वङ्की। दोस- ग्गाहिणि सइँ स- कलङ्की।।5।।
णव-विज्जुलिय व चंचल-देही। गोरस- मन्थ व कारिम-णेही।।6।।
चणिय-कल कबडङ्किय-माणी। अउइ व गरुआसङ्का-थाणी।।7।।
णिहि व पयतें परिरक्खेवी। गुलहिय- खीरि व कहोंविण देवी।।8।।
अप्पोणेण जें अप्पउ वोहिउ। वरिगय सीयम लोउ विरोहिउ।।9।।
पउम चरिउ भाग-5 पृ0140-143 सम्पादक डाॅ0 एच0सी0 भायाणी
अनुवाद- डाॅ0 देवेन्द्र कुमार जैन,
प्रथम संस्करण, 1969, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन
11- मदधीनं तु यत तन्मे हृदयं त्वयि वर्तते।
पराधीनेषु गात्रेषु किं करिष्याम्यनीश्वरी।। 10
वाल्मीकि रामायण। युद्ध काण्ड। षोडशाधिकशततमःसर्ग श्लोक- 9
12- वही श्लोक- 7
13- त्वया तु नृप शार्दूल रोषमेवानुवर्तता।
लघुनेव मनुष्येण स्त्रीत्वमेव पुरस्कृतम्।। वही श्लोक- 14
14- न वृथा ते श्रमोऽयं स्यात् संशये न्यस्य जीवितम्।
सुहृज्जनपरिक्लेशो न चायं विफलस्तव।। वही श्लोक- 13
15- नहि रामं तदा कश्चित् कालान्तकयमोपमम्।
अनुनेतुमथो वक्तुं द्रष्टंु वाप्यशकत सुहृत्।। वही श्लोक- 22
16- न शक्तः सुदुष्टात्मा मनसापि हि मैथिलीम्।
प्रधर्षयितुमप्राप्यां दीप्तामग्निशिखामिव।। वही, सप्तदशाधिकशतमसः सर्गः श्लोक-18
17- अवश्यं चापि लोकेषु सीता पावन मर्हति
दीर्घ कालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा।।
बालिशो बत कामात्मा रामो दशरथात्मजः
इति वक्ष्यति मां लोको जानकीय विशोध्य हि।। वही, अष्ट दशाधिकशत तमः सर्गःश्लोक-13-14
18- अप्यहं जीवितं जह्यां युष्मान् वा पुरुर्षभाः
अपवादभयाद् भीतः किं पुनर्जनकात्मजाम्।।
वाल्मीकि रामायण। उत्तर काण्ड। पञचचत्वारिषः सर्गः श्लोक- 14-15
19- न चारिम प्रति वक्तव्यः सीता प्रति कथंचन ।। वही श्लोक- 19
20- ये मां वाक्यान्तरे ब्रूयुरनुनेतुं कथंचन
अहिता नाम ते नित्यं मदभीष्ट विघतनात्। वही श्लोक- 21-22
21- हृग्दतं में महच्छल्यं यस्मादार्येण धीमता।
इअस्मिन्निमित्ते वैदेहि लोकस्य वचनीकृत ।।
वही, सप्तचत्वारिशः सर्गः श्लोक -4
22- न चास्मिनीदृशे कार्ये नियोज्यो लोक निन्दिते । वही श्लोक- 5
23- यथापवादं पौराणां तथैव रघुनन्दन
पतिर्हि देवता नार्याः पतिर्बंधुः पतिर्गुरुः ।।
प्राणैरपि पिं्रय तस्माद् भर्तुः कार्य विशेषतः।
(वाल्मीकि रामायण। उत्तर काण्ड।अष्टचत्वारिशः सर्गः श्लोक 17-18)
24- वाच्यस्त्वया मद्वचनात्स राजा वह्नौ विशुद्धा मपि यत्समक्षम्
मां लोकवादश्रवणादहासीः श्रुतस्य किं तत्सदृंश कुलस्य।।
रघुवंश। चतुर्दश सर्ग। 6।
25- उत्खातलोकत्रयकण्टकेऽपि सत्यप्रतिज्ञेऽप्यविकत्थनेऽपि।
त्वां प्रत्यकस्मात्कलुषप्रवृत्तावस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे मे।
26- रामायण का काव्यमर्म, विद्यानिवासमिश्र
पृष्ठ-188 रघुवंश। चतुर्दश सर्गः 73
27- वही,
28- इति मदवचननाद् रामो वक्तव्यो मम संग्रहः ।
निरीक्ष्य माद्य गच्छ त्वमृतुकालाति वर्तिनीम्।।
(वाल्मीकि रामायण। उत्तर काण्ड।अष्टचत्वारिशः सर्गः श्लोक 18-19)
29- दृष्द्वा देवानृषींश्चैव राघवः पुनरब्रवीत्।
प्रत्ययो मे सुरश्रेष्ठ ऋषिवाक्यैरकल्मषै
शुद्धायां जगतो मध्ये वैदेहयां प्रीतिरस्तु में।
(वही, सप्तनवतितमः सर्गः श्लोक 9-10)
30- मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये।
तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति।।15।।
31 -रामायण काव्यमर्म, विद्यानिवास मिश्र पृ0 187 वही, श्लोक 15
32 - वही, पृ0 189
33- एवहि तिह करेमि पुणु रहुवइ। जिहि ण होमि पडिवारी तियमइ।।
पउम चरिउ भाग-5 पृ198-199 सम्पादक डाॅ0 एच0सी0 भायाणी
अनुवाद- डाॅ0 देवेन्द्र कुमार जैन,
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन