शनिवार, 16 मई 2020

निर्भया से निर्भया तक /सदानंद शाही


निर्भया कांड को हुए  सात साल हो गए। 2012 में जब यह कांड हुआ था ,पूरे देश में एक उद्वेलन महसूस किया गया।स्त्री के प्रति संवेदना और सहानुभूति की नदी बह चली थी। ऐसा लगा जैसे आने वाले दिनों में स्त्री के प्रति हमारी सामाजिक सोच बदल जाएगी और हम स्त्री के प्रति संवेदनशील हो जाएंगे । पूरे देश में प्रदर्शन हुए ,जुलूस और रैलियां निकाली गई ,भाषण हुए ,लेख लिखे गए, संसद से सड़क तक हंगामा बरपा।लेकिन वही ढाक के  तीन पात। एक तरफ न्याय प्रणाली को स्त्री मुखी बनाने की बात होती रही, उसे चुस्त-दुरुस्त करने की बात होती रही  उसी के साथ अपराधियों को सरेआम सजा देने की बात भी हुई । यह सब होता रहा और आए दिन बलात्कार की घटनाएं भी अखबारों में छपती रहीं।  शायद ही कोई ऐसा दिन बीता जिस दिन बलात्कार या स्त्री हिंसा की कोई घटना प्रकाश में  न आई हो । स्त्री हिंसा की  भयावह घटनाएं घटित होती रही, जिसमें छह महीने की बच्ची से लेकर नब्बे साल की बूढ़ी महिला तक शिकार बनी। ऐसी घटनाओं में धर्मगुरुओं से लेकर राजनेताओं तक की करतूतें सामने आईं। कोई धर्म ,कोई जाति, कोई राजनीतिक समूह  इसका अपवाद नहीं रहा। स्त्री हिंसा और स्त्री से दुर्व्यवहार के मामले में सबके दामन दागदार हुए।एक बात सामान्य रही कि हर स्त्री हिंसा में कसूरवार या अपराधी पुरुष यानी मर्द ही रहा। पिछले महीने हैदराबाद में प्रियंका रेड्डी के साथ हुई घटना ने एक बार फिर वैसा ही विक्षोभ  पैदा किया ।इस विक्षोभ के दौरान  देशभर में फिर तरह-तरह की  प्रतिक्रियाएं हुईं। तरह-तरह की मांगे हुईं-आरोपी का अंग भंग कर देने से लेकर गोली मार देने और  भीड़ के हवाले कर देने जैसी।   हैदराबाद में हुई घटना के बारे में यह मांग राज्यसभा तक पहुंची कि  ऐसे लोगों की लिंचिंग हो जानी चाहिए ।ऐसी मांग न्याय व्यवस्था के प्रति गहरी निराशा और अविश्वास का नतीजा थीं।ऐसा लगा कि कठोर और सख्त सजा देने पर स्त्री हिंसा  की घटनाएं कम हो जाएंगी। हैदराबाद पुलिस ने संभवतः ऐसे ही जन दबाव में चारों आरोपियों  को एनकाउंटर में मार गिराया ।इस एनकाउंटर की मिश्रित प्रतिक्रिया हुई।एक ओर चौतरफा  प्रशंसा हुई तो  कुछ खित्तों  से वैधानिकता का सवाल उठाया गया और यह कहा गया कि विधिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाना चाहिए और त्वरित और विधिक कार्रवाई होनी चाहिए, न कि एनकाउंटर ।इस पर बहस होती रहेगी ।
लेकिन असल  सवाल यह  है कि क्या  स्त्री के प्रति होने वाली हिंसा या बलात्कार को प्रभावी कानून और कठोर सजा  से पूरी तरह रोका जा सकता है ।यह सही है कि प्रभावी कानूनी प्रक्रिया एक डर पैदा करेगी और ऐसा कदम उठाने वाले या व्यवहार करने वाले के मन में हिचक पैदा होगी। लेकिन इससे ऐसी घटनाएं खत्म हो जायेंगी यह उम्मीद करना ज्यादा उम्मीद  करना होगा और  समस्या को ऊपर ऊपर से देखना होगा।हमें यह समझना होगा कि  बलात्कार या स्त्री के प्रति हिंसा की घटनाओं के मूल में  स्त्री विरोधी मनोरचना काम कर रही है । इस मनोरचना को बदले बिना स्त्री हिंसा या बलात्कार को रोकना संभव नहीं है। लाख टके का सवाल यह है कि क्या हम यह मनो रचना बदलने के लिए काम कर रहे हैं?
आमतौर पर स्त्री हिंसा को बलात्कार की घटनाओं से जोड़कर देखते हैं ।लेकिन यह बात समझनी चाहिए कि बलात्कार की जितनी खबरें मीडिया में आती हैं, उससे हजारों गुना खबरें रिपोर्ट होने से रह जाती हैं। इसलिए बलात्कार की संख्या को स्त्री के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार का मापदंड नहीं बनाया जा सकता ।क्योंकि अनहुए बलात्कारों की संख्या वास्तविक  बलात्कारों से कई लाख गुना ज्यादा है। पुरुष की मर्दवादी रहन-सहन सहज  रूप से स्त्री के प्रति अवज्ञा से भरी हुई है। वह कदम कदम पर स्त्री का अनादर क रता चलता है ।ऐसे करोड़ों अनादरों की परिणति बलात्कार में होती है । यह अनादर  स्त्री के प्रति लोलुपता पैदा करता है ।यह लोलुपता  विकृति पैदा करती है। अभी हाल में एक स्कूल शिक्षिका ने इसलिए पढ़ना छोड़ दिया  कि जब वह क्लास रूम में पढ़ाने जाती थी तो दर्जा आठ में पढ़ने वाले लड़के कहते थे - 'आइटम आ गई'। यह जो लड़की को या स्त्री को आइटम समझने वाला भाव है ,वह भी मर्दानगी की ट्रेनिंग का ही नतीजा है।इसलिए स्त्री के प्रति होने वाले अपराध या हिंसा या अनादर को रोकने या खत्म करने के लिए पुरुष की   रहनि बदलनी होगी ।पुरुष की इस रहनि के मूल में उसकी मर्दवादी मानसिकता है ।यह मर्दवादी मानसिकता  बनाई जाती है। इस प्रक्रिया के दो आयाम हैं। इसके तहत स्त्री को औरत और पुरुष को मर्द बनाते हैं ।स्त्री को विनम्र होना चाहिए ,लज्जा शील होना चाहिए ,कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए, तपस्वी और मनस्वी होना चाहिए, लक्ष्मणरेखा के दायरे में रहना चाहिए आदि आदि।और इसके ठीक विपरीत मर्द को उद्दंड ,निर्लज्ज ,अकर्मण्य, लंपट आदि होना चाहिए। यानी मर्दानगी उद्दंडता और लंपटता में ही निहित है। सीमोन द बोउवार की यह बात  कि औरत पैदा नहीं होती उसे औरत बनाया जाता है जितनी सच है उतना  ही सच यह भी है की मर्द पैदा नहीं होता, उसे बनाया जाता है।
 हर बच्चा , लड़की हो या लड़का पैदा होते ही रोता है। जन्म के समय बच्चे का रोना बच्चे के स्वस्थ और सामान्य होने का लक्षण है । यह जरूरी है कि बच्चा जन्म के समय रोए। रोने से मस्तिष्क की कुछ धमनियां और शिराएं खुल जाती हैं और बच्चे का सम्यक विकास होता है। ऐसा भी  देखने में आया है कि जो बच्चे पैदा होने पर रोते नहीं हैं , उनके मस्तिष्क की कुछ धमनियां और शिराएं जबद जाती हैं, उनमें विकृति आ जाती है और वे मंदबुद्धि हो जाते हैं ।हमारे यहां रोने जैसी प्राकृतिक क्रिया को भी मर्द और औरत  के दायरे में देखा जाता है। बच्चा जैसे ही बड़ा होने लगता है तो टोका टाकी शुरू हो जाती है और कहा जाता है कि क्या औरतों की तरह रो रहे हो और एक दिन वह रोना छोड़ देता है ।या फिर चाह कर भी रो नहीं पाता।कभी-कभी लगता है कि अतिरिक्त  मर्दानगी से हमारे शरीर में रोने की क्रिया  वाला संकाय सूख गया है और हम एक खास तरह की मंदबुद्धिता के शिकार हो जाते हैं ,जिसे मर्दानगी का नाम देकर महिमामंडित किया जाता है ।यह मर्दानगी हमारे जीवन में है, हमारी भाषा में है ,हमारी समाज रचना और राजनीति में है ।जीवन के युद्ध में ,जय और पराजय दोनों ही स्थितियों में कहर स्त्रियों पर बरपा होता है। भाषा में मौजूद गालियों की छानबीन करें तो पाएंगे कि अधिकांश गालियां औरतों की ऐसी तैसी कर रही होती हैं। राजनीति भी प्रायः स्त्री और स्त्री को अपमानित करते हुए चमकायी जाती   है । राजनीति में चूड़ी के प्रयोग के   छोटे से उदाहरण से इस बात को समझ सकते हैं। हमारे यहां विरोधी नेताओं को चूड़ियां भेजने का चलन है । अगर कोई राजनेता असफल होता है या प्रभावी  कदम नहीं उठा पाता तो उसके  विरोधी चूड़ियां भेजते हैं ।चूड़ियां भेजकर  यह संदेश देना चाहते हैं कि तुम औरत हो और तुम कुछ नहीं कर सकते ।चूड़ी पहन कर घर बैठो।इसी मर्दवादी राजनीति का भोंसड़ा  रूप डींग हांकने ,अकड़ने और तरह तरह के अंग प्रदर्शन में दिखाई पड़ता है ।ऐसा करते समय हम यह भूल जाते हैं कि अतिरिक्त मर्दानगी से हमारी मनुष्यता छीजती  है ।स्त्री के प्रति होने वाली हर तरह की हिंसा का संबंध मनुष्यता के छीजते  चले जाने की कहानी है ।अपने पहले हिंदी उपन्यास सेवासदन में प्रेमचंद ने यह सवाल उठाया था कि ईश्वर वह दिन कब लावेगा कि हमारी जाति में स्त्रियों का आदर होगा। ध्यान से पढ़ें तो प्रेमचंद यहां जाति का अर्थ पुरुष जाति से है। अगर सचमुच हम स्त्री हिंसा से उबरना चाहते हैं ,इससे मुक्त समाज बनाना चाहते हैं तो हमें इस अतिरिक्त मर्दवादिता से ऊपर उठना होगा। कभी भक्तिकाल के कवियों ने एक रास्ता दिखाया था।वे  अपने आराध्य ईश्वर की उपासना परम प्रियतम  के रूप में करते थे और अपने को उनकी प्रिया के रूप में देखते थे। ऐसा करते हुए भक्तिकाल के कवियों ने अपने भीतर स्त्री तत्व को  पनपने दिया ।स्त्रीत्व का पनपना यानी मनुष्यता का विस्तार ।अगर हम सचमुच एक सभ्य समाज होना चाहते हैं और स्त्री मात्र के प्रति आदर- सम्मान और बराबरी का भाव रचना चाहते हैं तो हमें भक्तिकाल के कवियों से प्रेरणा लेकर इस अतिरिक्त मर्द वादियां से अपने से मुक्त करना   होगा । अपने भीतर की मनुष्यता का विकास करना होगा। केवल कानून बनाना और  कठोर सजा देना काफी नहीं होगा ।जरूरी है  कि मर्दवादी समाज का मानवीय समाज में रूपांतरण किया जाए ।आइए  इस रूपांतरण का वातावरण सृजित किया जाए।  दिसंबर ,2019 

नायक विहीन समय में प्रेमचंद की याद




कुछ तारीखें कागज के कैलेण्डरों पर दर्ज होती हैं और याद रखी जाती हैं पर कुछ तारीखें ऐसी भी होती हैं जो दिल के कैलेन्डर में दर्ज होती हैं और अनायास याद आ जाती हैं। प्रेमचन्द की जन्मतिथि 31 जुलार्इ ऐसी ही तारीख है। काशी की नागरी प्रचारिणी सभा भले ही प्रेमचन्द जयन्ती न मनाती हो लेकिन छोटे-छोटे स्कूलों में, सुदूर ग्रामीण अंचल में सक्रिय नामालूम सी कितनी ही संस्थाएं प्रेमचन्द जयन्ती पर छोटे बड़े आयोजन करती रहती हैं। 31 जुलाई  जैसे-जैसे करीब आती है, ग्रामीण अंचलों से प्रेमचन्द जयंती के आयोजन की खबरें मिलने लगती हैं। बिना किसी प्रेरणा या प्रोत्साहन के प्रेमचन्द जयन्ती पर आयोजनों का स्वत: स्फूर्त सिलसिला चल निकलता है।
आधुनिक हिन्दी साहित्य में प्रेमचन्द अकेली ऐसी शखिशयत हैं जिनकी जयंती इतने बड़े पैमाने पर मनायी जाती है। कबीर और तुलसी के बाद हिन्दी पट्टी  में ऐसी व्यापक लोक स्वीकृति प्रेमचन्द को ही प्राप्त है। प्रेमचन्द की यह लोक स्वीकृति उनकी छवि को नायक का दर्जा देती है। जिस समय में हम जी रहे हैं वह नायक विहीन समय है। हमारे सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक जीवन में ऐसे किरदार नहीं रह गये हैं जिन्हें सहजता के साथ नायक मान ले। नायक की तरह रंगमंच पर उपस्थित  होने वाले हर शख्स के भीतर एक छिपा हुआ खलनायक रहता है जो अवसर-बे-अवसर प्रकट होकर फर्जी नायक का पर्दाफाश कर देता है। ऐसे समय में प्रेमचन्द जैसे लेखक की जयंती सुकून देती है।
यों तो प्रेमचन्द की छवि इतनी साधारण है कि उसमें दूर-दूर तक नायक होने की सम्भावना नहीं है। ऐसा कई  बार हुआ कि प्रेमचन्द से मिलने आने वाले लोग उन से ही पूछ बैठते थे कि यहाँ कहीं प्रेमचन्द रहते हैं ? उनके व्यकितत्व में ऐसी कोई विशिष्टता न थी जो उन्हें दूसरों से अलग करे। अमृत राय (प्रेमचन्द के बेटे और हिन्दी के कथाकार, आलोचक, अनुवादक) ने प्रेमचन्द का जो चित्र खींचा है वह इस प्रकार है- उसको (प्रेमचन्द को) मगर पहचानते कैसे! कोई  विशेषता जो नहीं है उसमें। अपने आस-पास वो ऐसा एक भी चिन्ह नहीं रखना चाहता, जिससे पता चले कि वो दूसरे साधारण जनों से जरा भी अलग है। कोई  त्रिपुण्ड-तिलक से अपनी विशेषता की घोषणा  करता है, कोई  रेशम के कुर्ते और उत्तरीय के बीच से झाँकने वाले अपने ऐश्वर्य से, कोई  अपनी साज-सज्जा के अनोखेपन से, कोई  अपने किसी खास अदा या ढ़ंग से। यहाँ तक कि यत्न साधित सतर्क सरलता भी होती है जो स्वयं एक प्रदर्शन या आडंबर बन जाती है, शायद सबसे अधिक विरक्तिकर। देखो, इतना बड़ा नामी आदमी होकर भी मैं कितनी सादगी से रहता हूँ। प्रेमचन्द की सरलता सहज है। उसमें कुछ तो इस देश की पुरानी मिट्टी  का संस्कार है। कुछ उसका नैसर्गिक शील है, संकोच है कुछ उसकी गहरी जीवन दृषिट है और कुछ उसका सच्चा आत्म गौरव है।
दरअसल इस देश की पुरानी मिट्टी  का संस्कार और उससे निर्मित गहरी जीवन दृषिट ही उन्हें यह लोक स्वीकृति दिलाती है। इस गहरी जीवन दृष्टि  में भीगी प्रेमचन्द की कहानियाँ भारत के आम आदमी को कदम ब कदम याद आती हैं। मेरे एक पड़ोसी जो दवा का व्यापार करते हैं, हरिश्चन्द्र घाट पर एक दाह संस्कार में मेरे साथ थे। चमचमाता हुआ कफन देखकर उन्हें कफन कहानी के घीसू का कथन याद आया कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढ़कने को चीथड़ा भी न मिले उसे मरने पर नया कफन चाहिए। मुझे आश्चर्य हुआ कि श्मशान घाट पर जिस संस्कार में शामिल होने हम आये हैं प्रेमचन्द की कहानी उसी का आलोचनात्मक पाठ हमारे सामने रख रही है। प्रेमचंद परम्परा के भीतर जो कुछ आलोच्य है, उसकी आलोचना करते हैं। यह आलोचना करते हुए, वे समाज और परम्परा से बाहर खड़े हुए उपदेशक की तरह नहीं; बलिक परम्परा में मौजूद संकीर्णताओं  का दंश झेलते हुए सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करते हैं। प्रेमचन्द जति, धर्म, स्त्री-पुरूष के नाम पर होने वाले विभेद की दृढ़तापूर्वक आलोचना करते हैं। इसीलिए एक समय में उन्हें घृणा का प्रचारक कह कर निनिदत और अपमानित करने की कोशिश की गयी थी।

मेरे बचपन के एक मित्र जो गाँव  में ही रहकर स्कूल चलाते हैं, वे प्रेमचन्द की कहानी नमक का दारोगा के कायल हैं। उनका मानना है कि यह कहानी हमारे समय की सचार्इ है। र्इमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नमक के दारोगा बंसीधर  को व्यवस्था भ्रष्ट और पतित अलोपीदीन का सेवक बना देती है। जब बंसीधर  पढ़ार्इ पूरी करके नौकरी की तलाश में निलकते हैं तो उनके अनुभवी पिता सीख देते हैं- नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूंढना जहाँ कुछ उपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है जो एक दिन दिखार्इ देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है! परी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। अनुभवी पिता की इस सीख पर बंसीधर  ने भले कान न दिया हो लेकिन हमारे सामाजिक तंत्र में यह सामान्य अनुभव हो गया है। कहानी के शुरू में ही प्रेमचन्द लिखते हैं- जब नमक का नया विभाग बना और र्इश्वर प्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोर्इ घूस से काम निकालता था, कोर्इ चालाकी से। ऐसा लगता है कि प्रेमचन्द औपनिवेशिक युग में विकसित हो रहे पूँजीवादी तंत्र का घोषणा पत्र ही लिख रहे हैं। एक सामान्य सी सीधी सादी कहानी समूचे  भ्रष्ट तंत्र की रूपक कथा बन जाती है। र्इमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा मुअत्तली की ओर ले जायेगी इसलिए भलार्इ अलोपीदीन का शरणागत होने में है। विशालकाय तंत्र के शोषण चक्र में दिन ब दिन पिसते और परीशान होते सीधे सरल आदमी को प्रेमचन्द की यह कहानी व्यवस्था के चरित्र को जानने और उस पर हँसने का अवसर देती है।
इसी तरह कुछ लोगों को 'ईदगाह  कहानी याद रहती है। कहानी का हामिद बूढ़ी दादी अमीना के लिए अपने प्यार के बल पर चिमटे जैसी कुरूप और उपेक्षित वस्तु को सुन्दर और स्पृहणीय बना देता है यह मानवीय प्यार हामिद के भीतर एक ऐसा जज्बा पैदा करता है जो उसे सारी दुनिया के विरूद्ध तन कर खड़ा होने की ताकत देता है। इसी प्यार से सारे अभावों के बावजूद अपने तमाम हम उम्र और सम्पा बच्चों को अपना मुरीद बना लेता है। नये पूँजीवादी समाज में मानवीय रिश्तों की अहमियत खत्म होती जा रही है। ऐसे में यह कहानी अकेले पड़ते आदमी को मानवीय रिश्तों की गहरार्इ और सम्पन्नता का एहसास कराती है।
पंच परमेश्वर कहानी के जुम्मन शेख और अलगू चौधरी अपनी न्याय निष्ठा के लिए याद किए जाते हैं। बूढ़ी काकी जैसी कहानी भूख की सृजनात्मकता का पता ही नहीं देती बलिक बूढ़ी काकियों के प्रति संवेदनशील बनाती है। लाटरी कहानी लोभ और धार्मिक कर्मकाण्डों के सम्बन्ध को उजागर करती है तो नशा कहानी झूठे दंभ की पोल खोलती है। इस तरह प्रेमचन्द की कहानियाँ हमारी आत्मा को रचती हैं। अमानवीय समय में हमें मानवीय बनाती हैं।
प्रेमचन्द का साहित्य और प्रेमचन्द का जीवन हमे यह भी बताता है कि इस देश की मिट्टी  की सुगंध को पहचानने वाले व्यकित को ही नायक का दरजा मिल सकता है, जैसे कि गांधी को मिला।
 (हिन्दुस्तान ,जुलाई 2013 )




बुधवार, 13 मई 2020

स्वाधीन चेतना के विकास में काशी हिन्दू विश्व विद्यालय की भूमिका/ सदानंद शाही




स्वाधीनता आन्दोलन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की भूमिका जैसे विषय पर बोलने के लिए शायद मैं उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ। बेहतर होता इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने के लिए किसी राजनीति शास्त्र या इतिहास के विद्वान को बुलाया जाता। लेकिन कई बार ऐसे अवसरों पर औचित्य पर मित्रता आदि को तरजीह दी जाती है। मुझे भी मित्रता वश ही बुलाया गया है। इसलिए अगर आपको मेरे व्याख्यान से निराशा हाथ लगती है तो भी मित्रता का भाव समाज में मौजूद है यह सोच कर संतोष कर सकते हैं। साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते मैं इस विषय को बिल्कुल दूसरे नजरिए से देखता हूँ। स्वाधीनता आन्दोलन में किसी विश्वविद्यालय की दो तरह की भूमिका हो सकती है ? पहली भूमिका यह हो सकती है कि विश्वविद्यालय के कर्मचारी अध्यापक और छात्र सीधे-सीधे आन्दोलन में उतर पड़ें। अगर बनायी जाये तो ऐसे नामों की लम्बी सूची तैयार हो सकती है। महिला महाविद्यालय की पहली प्राचार्या कुमारी आशा अधिकारी 1932 में नौकरी छोड़कर स्वाधीनता आन्दोलन की गतिविधियों में शामिल होने चली गई थीं । 1942 के आन्दोलन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों की भूमिका जबर्दस्त थी। भारत छोड़ो आन्दोलन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों ने जमकर हिस्सेदारी की । प्रभुनारायण सिंह और राजनारायण की जोड़ी उसी दौरान चमकी और चर्चित हुई। फिलहाल मैं इस पहलू पर बात नहीं करने जा रहा है। काशी हिन्दू विश्व विद्यालय या किसी भी दूसरे विश्व विद्यालय की दूसरी भूमिका यह हो सकती है कि उसने देश की स्वाधीन चेतना को किस हद तक प्रभावित किया है। आज मैं इसी पहलू पर बात करुँगा।
भारत के मन पर आधिपत्य के लिए अंग्रेजों ने यहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर कब्जा जमाया। 1782 में कलकत्ते में मदरसा खुला। अरबी की शिक्षा दी जाती थी।1791 में काशी में संस्कृत कालेज खुला। शिक्षा के माध्यम से भारत की चेतना पर काबिज होने की असली कोशिश 1835 में की गई । लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा की सिफारिश की। 1854 में कलकत्ता विश्वविद्यालय, 1858 में बम्बई और मद्रास विश्वविद्यालय बना। 1882 में शिक्षा कमीशन बैठा और इसी सन में लाहौर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1887 में लार्ड लिटन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना की । भारत की शिक्षा व्यवस्था पर कब्जे की इन्हीं कोशिशों के बीच राष्ट्रीय शिक्षा चिन्ता ने जन्म लिया। राष्ट्रीय या भारतीय शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने की अनेक कोशिशें हो रही थीं ।
अमृतसर में खालसा कालेज बना। राची में नया कालेज बनाने के लिए दान मिला। अलीगढ़ कालेज की स्थापना हुई। नवाब रामपुर ने बरेली कालेज की स्थापना की। राष्ट्रीय शिक्षा के लिए राजा बलराम पुर आगे आए। विवेकानंद की प्रेरणा से टाटा अनुसंधान केन्द्र बना। कहने का अभिप्राय यह कि देश में राष्ट्रीय शिक्षा के लिए वातावरण बन रहा था। देश के विभिन्न हिस्सों के आकाश में राष्ट्रीय शिक्षा के बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। महामना मदन मोहन मालवीय ने इसी कालेज में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का सपना देखा।
राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की तीन धारायें एक साथ सक्रिय थीं। 1904 में मिन्ट हाउस में काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह की अध्यक्षता में महामना ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का प्रस्ताव रखा। श्रीमती एनी बेसेन्ट ने 1907 में University of India का प्रस्ताव Royal Charter के पास भेजा। राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का एक और सपना दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह के नेतृत्व में पल रहा था। राष्ट्रीय शिक्षा के लिए काशी में यत्नशील ये तीनों धारायें एक में मिल गयी। 1911 में दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह ने अपने सपने को मालवीय जी के सपने से जोड़ दिया । आगे चलकर श्रीमती एनी बेसेन्ट ने इस महान स्वप्न को अपने सेण्ट्रल हिन्दू स्कूल की ठोस जमीन दी।काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण में एनी बेसेंट की इस भूमिका को सदैव याद रखना चाहिए। इस तरह एक राष्ट्रीय शिक्षा की तीनों धाराएँ मालवीय जी के शुभ्र धवल नेतृत्व में एक हो गईं । कारवां आगे बढ़ गया। देखते-देखते मालवीय जी का यह सपना भारत की जनता की आकांक्षा से जुड़ गया।
भारत के इतिहास में एक नया नालंदा जन्म ले रहा था। इसका निर्माता कोई एक राजा महाराजा नहीं था। एक फकीर इसका नेतृत्व कर रहा था। सच पूछिये तो इस विश्वविद्यालय की रचना भारत की जनता की सामूहिक आकांक्षाओं का पूंजीभूत रूप बन गया । विश्वविद्यालय के लिए धन एकत्र करने के लिए राजो महराजों से लेकर सामान्य जनता में होड़ मच गई थी। धन जमा करने के लिए मालवीय जी का कारवां जब लखनऊ पहुँचा तो चकबस्त ने कौमी मुसद्दस लिखा। 3 दिसम्बर 1911 को मालवीय जी के भाषण के पहले चकबस्त ने यह मुसद्दस सुनाया। जिसकी कुछ आरम्भिक पंक्तियाँ इस तरह हैं -
‘इलाही कौन फरिश्ते हैं ये गदाए वतन ।
सफाए कल्ब से जिनके ये बज़्म है रौशन ।
झुकी हुई है सबों की लिहाज से गर्दन।
हर इक जुबां पे है ताज़ीम और अदब के सुखन।
सफे खड़ी हैं जवानों की और पीरों की
खुदा की शान यह फेरी है किन फकीरों की ।
फकीर इल्म के हैं इनकी दास्तां सुन लो।
पयाम कौम का दुख दर्द का बयांसुन लो ।
ये वो दिन है जो है यादगार हाँ सुन लो ।
है आज गैरत-ए - कौमी का इम्तहाँ सुनलो।। ......
एक लम्बी नञम है। सीता राम चतुर्वेदी ने महामना की जो जीवनी लिखी है, उसमें पूरी नञम उद्धृत है। यह नञम पढ़ने से पता चलता है कि किस तरह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना कौम की गैरत का प्रमाण बन गया था। यह जनता की राष्ट्रीय शिक्षा की आकांक्षा का प्रतीक बन गया था। यह विश्वविद्यालय सिर्फ अमीरों, राजाओं, महाराजों और भारत की तत्कालीन सरकार की मदद से नहीं बना। इस विश्वविद्यालय के निर्माण में देश की आम जनता का योगदान किसी से कम नहीं है। भारत के सामान्य स्त्री- पुरुष, हिन्दू- मुसलमान सब शामिल थे। एक दो प्रसंगों की चर्चा करना चाहता हूँ : मुरादाबाद में मालवीय जी के व्याख्यान के बाद एक मुसलमान सज्जन आँखों में आँसूं और हाथ में पाँच रुपये लिए हुए खड़े हुए और ले जाकर मालवीय जी के चरणों पर रख दिए और कहा मैं बहुत गरीब आदमी हूँ, तब भी इस नेक काम में मैं पाँच रुपये देता हूँ। इस सच्चे मुसलमान के इस दान से सबकी आँखे डबडबा आयीं।
एक दूसरा प्रसंग है-मुजफ्फरपुर में एक भिक्षा मांगने वाली ने अपने दिन भर की कमाई दान दे दी। एक व्यक्ति ने अपनी फटी कमीज दान में दे दी,जिसे नीलाम करके धन जुटाया गया । नीलामी में कमीज खरीदने वाले व्यक्ति ने वह कमीज भी विश्वविद्यालय के संग्रहालय के लिए वापस कर दी। औरतों ने अपने गहने तक दान में दे दिए। एक सेठ ने पाँच हजार रुपये द्ये तो सेठानी ने अपने हाथ का कंगन दे दिया । कंगन नीलाम हुआ तो सेठ कंगन खरीद कर सेठानी को दे दिया , पर सेठानी ने उस कंगन को संग्रहालय के लिए दे दिया। औरतों के लिए गहनों से ज्यादा प्रिय कुछ नहीं होता।गहना औरतों के लिए केवल शौक की वस्तु नहीं है । वे मुश्किल समय के लिए गहने को संभाले रहती हैं और वक़्त आने पर गहना निकालती हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना एक ऐसी जरूरत थी,ऐसी आत्यंतिक जरूरत थी जिसे इस सेठानी जैसी देश की असंख्य स्त्रियों ने महसूस किया और अपने गहने तक दान में दे दिए।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का सपना भारत की विशाल आबादी की राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया। मदन मोहन मालवीय की खासियत यह थी कि उन्होंने इस राष्ट्रीय कहें जातीय कहें या कौमी कहें संस्थान के निर्माण के गौरव में शामिल होने का अवसर हर आम ओ खास शख्स को दिया।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए महामना ने जो यात्राएँ की,मेरा मन होता है कि उसकी तुलना महात्मा गाँधी की दाण्डी यात्रा से करूँ । दाण्डी यात्रा से गांधी ने भारत की आम जनता के मन में यह भरोसा और विश्वास जगाया कि वे हीन और तुच्छ नहीं हैं। भारत की आजादी की महान लड़ाई में वे भी बराबर के भागीदार हो सकते हैं। नमक के साथ गांधी की उठी हुई मुट्ठी बिट्रिश साम्राज्य को चुनौती देने की महान प्रेरणा बन गयी। आप सब जानते होंगे उसके बाद गाँव-गाँव में प्रतीकात्मक ढंग से नमक बनाकर भारत कि असंख्य गरीब और मजलूम जनता ने साम्राज्यवाद के विशालकाय दुर्ग को झकझोर दिया। अनेक ऐसी कहानियाँ मिलती हैं जिसमें बूढ़ी औरतें लोटे के पानी में नमक घोल कर सारे राह ,भरे चौराहे पर पानी सुखाकर नमक बनाती हैं और अंग्रेजी पुलिस के अत्याचार का शिकार भी बनती हैं और उसे चुनौती भी देती हैं। इसी तरह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भी राष्ट्रीय शिक्षा का, राष्ट्रीय नवनिर्माण का प्रतीक बन गया था। अंग्रेजों की दलील थी कि भारतीय लोग निर्माण नहीं कर सकते, वे संस्था नहीं चला सकते, देश नहीं चला सकते,आदि आदि इत्यादि । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण ने अंग्रेजों की इस दलील का न केवल जवाब दिया,बल्कि उसे थोथा साबित किया ।
महामना ने विश्वविद्यालय के लिए जो ध्येय निश्चित किए थे, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं-
1- विशेषता: हिन्दू समुदाय को और समान्यता: सार्वभौम को हिंदुओं की संस्कृति ,उनके श्रेष्ठ चिंतनों और उनकी प्राचीन सभ्यता में जो कुछ विशिष्ट और महान था ,उसका ज्ञान कराने के लिए हिन्दू शास्त्र व संस्कृत भाषा के अध्ययन को एक साधन के रूप में प्रोत्साहित करना ।
2- साधारणत: कला तथा विज्ञान की सभी शाखाओं में शिक्षण तथा शोध कार्य को प्रोत्साहन देना ।
3- आवश्यक व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ ऐसे वैज्ञानिक,तकनीकी एवं व्यावहारिक ज्ञान का संवर्धन तथा प्रसार करना जो देशी उद्योगों को प्रोत्साहन दें एवं देश के भौतिक संसाधन का विकास करने में सहायक हों।
4- धर्म और नीति को शिक्षा का आवश्यक या अभिन्न अंग मानकर नवयुवकों में सुंदर चरित्र का गठन या चरित्र निर्माण के विकास को प्रोत्साहित करना।
विश्वविद्यालय के इस महान उद्देश्य को हमारे कुलगीत में बहुत सुन्दर ढंग से व्यक्त किया गया है- ‘प्रतीचि प्राची का मेल सुन्दर’।इस मेल में बौद्धिकता, तार्किकता और हार्दिकता के मेल का भी आवाहन था।
मित्रो! आज हम विश्वविद्यालयों की रैंकिंग को लेकर परेशान रहते हैं। मुझे लगता है कि रैंकिग से ज्यादा जरूरी है विश्वविद्यालय की मौलिकता। हमारे विश्वविद्यालय की मौलिकता है -तार्किकता और हार्दिकता का मेल। एक अखिल भारतीय समावेशिता का आग्रह। इस मौलिकता ने भारत वर्ष को किस-किस रूप में प्रेरित और प्रोत्साहित किया है , इसका आकलन होना बाकी है।
इस प्रसंग साहित्य को मिली प्रेरणा की ओर इशारा करना चाहता हूँ । साहित्य में नवजागरण की चर्चा होती है, हिन्दी में छायावाद की कविता को नवजागरण का तीसरा चरण कहा जाता है। छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद इसी बनारस में थे। उन्होंने कामायनी जैसी महान-कृति रची । जिसमे श्रद्धा और इडा जैसी बिल्कुल नयी स्त्रियां दिखाई देती है। कामायनी से पहले ऐसी स्त्रियों से हमारा परिचय नहीं था। ये भावी भारत की स्त्रियाँ थीं। देखना चाहिए कि इन स्त्रियों को गढ़ने में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की क्या भूमिका थीं। कामायनी 1936 में प्रकाशित होती है। 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना होती है । विश्वविद्यालय सह शिक्षा के साथ शुरू होता है। यहाँ विधिवत 1927 में महिला महाविद्यालय की स्थापना होती है। विश्वविद्यालय परिसर में भावी भारत की स्त्रियाँ अवतरित होती हैं। स्त्री की मुक्ति का सवाल भारतीय नवजागरण का, भारत की स्वाधीन चेतना का प्रमुख पहलू है। हमारे विश्वविद्यालय ने नए भारत की स्त्री को जमीन पर उतारा । मैं कहना चाहता हूँ कि हमारे विश्वविद्यालय ने स्वाधीन चेतना के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई है । भारत की स्वाधीन चेतना के नजरिये से विश्वविद्यालय बहुत बड़ा योगदान है। स्वाधीन चेतना का विकास विश्वविद्यालय की बहुत बड़ी देन है ।
मित्रो! आज हम विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में हैं। सौ वर्ष किसी विश्वविद्यालय के लिए बहुत ज्यादा नहीं होते। यदि हमारे विश्वविद्यालय को आने वाली शताब्दियों में भी स्वाधीन चेतना का प्रेरणा स्रोत बनें रहना है, देश को शिक्षित मस्तिष्क देना है तो उसे अपनी मौलिकता बनाये और बचाये रखनी होगी । संस्थाओं के इतिहास में उठा-पटक चलती रहती है, ऊँच-नीच होता रहता है लेकिन प्रथमत: और अंतत: वे अपनी मौलिकता के नाते ही जानी जाती हैं ।
विश्वविद्यालय के शिलारोपण कार्यक्रम के अवसर पर गांधी जी ने विद्यार्थियों के लिए जो व्याख्यान दिया था, वह इस विश्वविद्यालय का महान दस्तावेज है। उसमें गांधी ने कहा कि मातृभाषाओं में शिक्षा होनी चाहिए। गांधी जब-जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय आये उन्होंने यह याद दिलाया। गांधी जी ने चाटुकारिता और झूठ से बचने की सलाह दी। स्वाधीन चेतना के विकास की दृष्टि से हमारे विश्वविद्यालय के महान संस्थापक से जुड़ी एक और बात का जिक्र करके मैं अपनी बात समाप्त करुँगा। महामना के पास असहमति से संवाद बनाये रखने की अद्भुत सामर्थ्य थी। असहमति को स्थान दिए बगैर कोई विश्वविद्यालय मौलिक नहीं हो सकता,और मौलिक हुये बिना कोई विश्वविद्यालय न तो नये ज्ञान का सृजन कर सकता है और न ही ज्ञान की नयी व्याख्या कर सकता है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पुरानी प्रोसिडिंग पढ़िए। उसमें अनेक ऐसे प्रसंग मिलेंगे जिसमे स्वयं विश्वविद्यालय के संस्थापक पर सवाल उठाये गए हैं । मालवीय जी कभी भी उन सवालों से घबड़ाए नहीं, विचलित नहीं हुए; बल्कि आगे बढ़कर उनसे संवाद किया।मालवीय जी इसीलिए महामना हैं –महान मन वाले । यदि भविष्य में हमें अपने विश्वविद्यालय का गौरव बहाल रखना है तो असहमति के लिए जगह बनाये रखना है। अन्वेषण के लिए मौलिकता और नवीनता आवश्यक है । असहमति और विरोधी विचारों से अंत:क्रिया के वातावरण में ही ऐसा संभव है ।आइए विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में संकल्प लें की महामना द्वारा जलायी गयी स्वाधीन चेतना की मशाल को तेज से तेजतर करें । धन्यवाद ।
(15 अगस्त 2015 को को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के टीचर्स क्लब में दिये व्याख्यान का संपादित रूप । व्याख्यान हेतु आमंत्रित करने के लिए क्लब के पदाधिकारियों श्री जे पी शाही ,श्री संजीव सर्राफ और डॉ चौधरी के प्रति आभार ।)

सर्चलाइट के आलोक में खुद को आँकने का उचित समय / सदानंद शाही




भोजपुरी अध्ययन केंद्र के इस आयोजन में आप सबका स्वागत कराते हुये मुझे बेहद खुशी हो रही है । कई बार लोग कहते हैं कि भोजपुरी केंद्र चलता कैसे है? क्योंकि साधन की दृष्टि से और समय की दृष्टि से भी यह विवि का सबसे छोटा केंद्र है; लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि विश्व विद्यालय के संस्थापक और स्वप्नदर्शियों  के हृदय के सबसे करीब है । भारतीय भाषाओं को लेकर उनके विचारों को आप सब जानते हैं यही हमारा संबल है और यही हमारी थाती है ।
 काशी हिन्दू विश्व विद्यालय की स्थापना के अवसर पर हुये समारोह के तीसरे दिन 6 फरवरी 1916 को   महात्मा गांधी ने जो  व्याख्यान दिया था वह भारत की राजनीति का मुस्तकबिल बदलने वाला सिद्ध हुआ ।  आज इस व्याख्यान के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं ।
काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के भव्य  स्थापना समारोह में गांधी का व्याख्यान एकदम नयी जमीन से दिया जा रहा था । भारतीय राजनीति के आकाश में नये  सूर्योदय की घोषणा हो रही थी  । वायसराय जा चुके थे लेकिन उनके आगमन से उपजा भारीपन शहर में मौजूद था । मंच पर राजे महराजे भव्य परिधान में उपस्थित थे । राजा दरभंगा सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे । सभा में एनी बेसेंट मौजूद थीं । गांधी ने अपने  भाषण में इतने बुनियादी मुद्दों को उठाया कि भव्य और आलंकारिक विधान असहज हो गए । गांधी के भाषण से चमकते अंधेरे से थिराये हुये दिमाग हिल उठे । राजे महाराजे एक एक कर मंच छोड़कर जाने लगे । एनी बेसेंट तक ने गांधी से चुप होने या इसे बंद करने के लिए कहा ।  सभाध्यक्ष दरभंगा महाराज मंच छोड़ चले गए । एनी बेसेंट मंच छोड़ चली गयीं। अंतत:गांधी को अपना भाषण अधूरा छोड़ देना पड़ा । कभी- कभी मुझे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना समारोह का वह दृश्य राष्ट्रीय रूपक की तरह लगता है । राजे महाराजे सिर्फ समारोह के मंच से नहीं जा रहे थे ;बल्कि देश के राजनीतिक मंच से भी उनकी विदाई हो रही थी । खास बात यह कि  महामना मदन मोहन मालवीय अप्रिय स्थिति के बावजूद अंत तक बने रहे, मंच पर ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति में भी । 
आखिर  इस अधूरे भाषण में ऐसा क्या था ,जिसने इतने मान्य महानुभावों को  विचलित कर दिया था ?गांधी के उस अधूरे भाषण में एक नए बन रहे विश्व विद्यालय के लिए क्या संदेश था ? और खास तौर से आज जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अपने सौ वर्ष पूरे कर चुका है , क्या यह भाषण कोई अर्थ संकेत देता है ? आज हम इसी पर विचार करने जा रहे हैं ।
मित्रो ! उत्तराधिकारी होना बहुत मुश्किल होता है, खास तौर से तब जब वैचारिक सम्पदा का उत्तराधिकार सभालना हो । भौतिक सम्पदा का उत्तराधिकारी होना मुश्किल नहीं है । वैसे भी भौतिक संपदा के अलग से दावेदार भी पैदा हो जाते हैं लेकिन वैचारिक सम्पदा कई बार अनाथ सी हो जाती है ।  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना महज एक विश्वविद्यालय की  स्थापना नहीं थी । अंग्रेज़ सरकार ने पहले भी अनेक विश्वविद्यालय स्थापित कर रखे थे । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना  स्वाधीन चेतना के विचार  की स्थापना थी  ,एक नए राष्ट्र निर्माण का  सपने का जमीन पर उतर रहा  था ।असंभव समझा जाने वाला  प्रतीचि और प्राची का सुंदर मेल हो रहा था ।   यह  शिक्षित मस्तिष्क  और प्रशिक्षित हाथ तैयार करने के संकल्प की स्थापना थी ।
गांधी ने अपने भाषण में जो बुनियादी सवाल उठाए वे इस प्रकार हैं
1-  (यदि आप एक क्षण के लिए भी यह समझते हैं कि )आध्यात्मिक जीवन जिसके लिए यह देश सुविख्यात है और जिस क्षेत्र में उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं ,केवल जबानी बताया जा सकता है तो  विश्वास कीजिए आप गलत हैं । आप केवल जबान से यह संदेश नहीं दे सकेंगे कि भारत एक दिन विश्व का उद्धारक बनेगा ।  .......मैं आपसे कहना चाहूँगा कि भाषणों कि उपयोगिता अब लगभग खत्म हो चुकी है ।
2-  हमारी भाषाएँ हमारा प्रतिबिंब हैं और यदि आप कहते हैं कि हमारी भाषाएँ इतनी समृद्ध नहीं हैं कि सर्वोत्तम विचारों को अभिव्यक्त कर सकें तो इसके बजाय यह कहिए कि जितनी जल्दी हमारा अस्तित्व मिट जाय उतना ही अच्छा है । .......मान लीजिये कि पिछले पचास वर्षों से हम अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा प्रपट कर रहे होते तो हमारे पास क्या होता ?आज भारत स्वतंत्र होता ,हमारे पास ऐसे  शिक्षित व्यक्ति होते, जो अपने ही देश में विदेशी जैसे न लगते ,बल्कि देश के हृदय से उनका संवाद होता।  
3-  यदि  हमारे मंदिर ही खुलेपन और स्वच्छता के आदर्श न हों तो हमारा स्वशासन कैसा होगा ?
4-  भारत कि मुक्ति तब तक नहीं हो सकती जब तक आप लोग इन बहुमूल्य आभूषणोंकों उतारकर अपने गरीब देशवासियों कि अमानत के रूप में नहीं रख देते ।
5-  मैं भारत को दोनों ओर के संदेहों से युक्त वावरण से  मुक्त कराना चाहता हूँ । यदि हमें अपने लक्षय प्रपट करने हैं ,हमारे पास ऐसा संदेह होना चाहिए ,जो परस्परिक प्रेम और विश्वास पर आधारित हो ।
6-  भारत आने के बाद चापलूसी और झूठ का जो वातावरण उन्हें (अंग्रेज़ अधिकारियों को )घेर लेता है ,वह उन्हें भ्रष्ट बना देता है जाइसकी वह हममे से किसी को भी बना देता है। कभी कभी स्वयं पर दोष ले लेना अच्छा होता है ।
ये बातें इतनी साधारण लगती हैं कि इन्हें कहना आवश्यक ही नहीं लगता और सुनना शायद समय का अपव्यय ।  इस व्याख्यान मैं ऐसी कोई बात नहीं है जिसे हम जानते न हों ,लेकिन गांधी केवल जानने कि बात नहीं कर रहे थे ,वे मनाने और बरतने कि बात कर रहे थे । ऐसा लगता  है कि यह बरतने वाली बात ही चुभ गयी होगी । ऊंचे आदर्शों को बघारने से हमें परेशानी नहीं होती परेशानी होती है उन्हें आचरण में उतारने से ।
गांधी जब कहते हैं कि मैं भाषणों से तंग आ चुका हूँ तो वे कबीर कि याद दिलाते हैं –बोलना का कहिए रे भाई ,बोलत बोलत तत्व नसाई । 
दरअसल गांधी छात्रों को आत्ममुग्धता से ऊपर उठकर आत्मलोची  और स्वतंत्र चेता बनाना चाहते थे । सौ वर्ष पूरे होने पर हम सब जो इस महान विश्वविद्यालय के वारिस हैं,उनके लिए गौरव का क्षण तो है ही सिंहावलोकन का समय भी है । कि हमने अपने महान संस्थापक के  सपनों और संकल्पों को किस हद तक मूर्त किया है ,कि हमने अपने महान संस्थापक के विचारों की  विरासत को किस हद तक सभाला  और विकसित किया है । गांधी का अधूरा भाषण इसके लिए एक निकष तो देता ही है वह एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत की उपलब्धियों को जाँचने का पैमाना भी हो सकता है । गांधी ने अपने इस भाषण में कहा था कि मैं सर्चलाइट को अपनी ओर निर्देशित करता हूँ ।शताब्दी वर्ष   अपनी उपलब्धियों और योग्यता को इस सर्चलाइट के आलोक में खुद को आँकने  का उचित समय है  ।
मुझे खुशी है कि इस चुनौती के अवसर पर हमारे साथ प्रो सुधीर चन्द्र जैसा दृष्टि सम्पन्न इतिहासकार है ,प्रो राजीव संगल जैसा व्यावहारिक गांधीवादी है और आप सब हैं । इस विचार सत्र में आप सबका स्वागत है ।
(महात्मा गांधी के अधूरे व्याख्यान के सौ वर्ष पर आयोजित विचार सत्रह में स्वागत भाषण। +विश्वविद्यालय   का शिलान्यास 4 फरवरी 1916 को हुआ था ,इसलिए मान लिया जाता है कि  व्याख्यान भी  चार फरवरी 1916 को ही हुआ होगा । हाल ही में युवा शोधकर्ता समीर पाठक ने गहन छानबीन करके यह बताया  कि यह व्याख्यान 6 फरवरी 1916 को हुआ था ।)

दूर दृषिट सम्पन्न ऋषि नेता बाबू जगजीवन राम/सदानन्द शाही


बाबू जगजीवन राम को 1977 के आम चुनावों में सुनने का अवसर मिला था। तत्कालीन राजनीतिक मसलों के अलावा जो बात ध्यान में रह गयी वह है उनकी भाषा। छोटे, सरल सुस्पष्ट वाक्य। सीधे और साफ ढंग से बिना लाग लपेट के अपनी बातें कह देने और सुनने वाले के तह तक उतर जाने की कला। मेरे किशोर मन में जगजीवन राम की ऐसी छवि बनी जिसने आगे चल कर जाति और वर्ग को योग्यता से जोड़कर देखने वाले पूर्वाग्रहों से मुक्त होने में काफी मदद की।
काफी अन्तराल के बाद सन 2007 में बाबू जी के जीवन और चिन्तन से परिचित होने का अवसर मिला। काशी हिन्दू विश्वविधालय में बाबू जगजीवन राम पीठ कायम हुर्इ। उसका उदघाटन करने तत्कालीन सामाजिक न्याय और सहकारिता मन्त्री श्रीमती मीरा कुमार को आना था। इस कार्यक्रम की आयोजन समिति से मैं भी जुड़ा हुआ था। यह तय हुआ कि 'बाबू जगजीवन राम पीठ की स्थापना के पीछे जो विचार हैं, उन्हें एक ब्रोशर के रूप में प्रकाशित करके वितरित किया जाय। ब्रोशर तैयार करने के क्रम में बाबू जगजीवन राम के व्यकितत्व और विचारों का अध्ययन-अनुशीलन किया।
बाबू जी का जीवन कर्इ कारणों से विलक्षण है। वे अकेले ऐसे दलित नेता हैं जो राष्ट्रीय आन्दोंलन की मुख्यधारा में रहे है। आजादी के पहले स्वाधीनता आन्दोलन में तथा राष्ट्रीय सरकारों मेंं उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाइ±। आजादी के बाद बनी सरकारों में शामिल होकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में योगदान किया। राष्ट्रीयआन्दोलन के नेताओं का मानना था कि आजादी हासिल करना मुख्य लक्ष्य है। आजादी के बाद दलित मुकित के प्रश्न को हल कर लिया जायेगा, जबकि दलित नेतृत्व इसे लेकर सशंकित था। इसलिए दलित नेतृत्व ने दलित मुकित के सवाल को तरजीह दी। गांधी और अम्बेडकर के बीच की बहस मुख्य रूप से यही थी । बाबू जगजीवन राम ने राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा में रहते हुए दलित मुकित के लिए काम करने का रास्ता चुना। यह बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण था। राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व पर सवर्ण जातियों का प्रभुत्व था। गांधी के अनुनायी होते हुए भी राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व वर्ग में सभी गांधी नहीं थे। इसलिए अपनी दलित पृष्ठभूमि के नाते बाबू जगजीवन राम को राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं के साथ काम करते हुए जातीय भेदभाव और विद्वेष का दंश झेलना पड़ा। दूसरी तरफ उन्हें दलित नेतृत्व के व्यंग्य बाण भी सहने पड़े। भीतर और बाहर दोनों तरफ से मिलने वाले व्यंग्य और विद्वेष से विचलित हुए बगैर बाबूजी ने राष्ट्रनिर्माण के वृहत्तर सरोकारों और दलित मुकित के विशेष सरोकारों को दृढ़ता पूर्वक अंजाम दिया।
बाबू जी  के जीवन से परिचित होने पर उनके व्यकितत्व की सबसे बड़ी खासियत नजर आती है- वह है विनम्रता और दृढ़ता का दुर्लभ संयोग। इस विनम्रता और दृढ़ता का सम्बन्ध संत रविदास की बानी से है :
प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी
जाकी अंग अंग बास समानी ।।
अपने प्रभु के साथ रच बस कर संत रविदास एकमेक हो गये थे। इस एकमेक भाव ने उन्हें सहज आत्मविश्वास से भर दिया था जिसके बल पर वे सामाजिक दंश से उपर उठ कर बेगमपुरा शहर के नागरिक बन सके थे। तुलसीदास के रामराज्य की कल्पना की चर्चा करते लोग अघाते नहीं है; पर मेरी राय में रविदास का बेगमपुरा रामराज्य से बेहतर और उन्नत संकल्पना है । (इस पर फिर कभी) संत रविदास का 'बेगमपुरा ऐसा शहर है, एक ऐसा वतन, जिसमें सभी के लिए खैरियत है। बाबू जगजीवन राम भी इसी बेगमपुरा के नागरिक थे। संत रविदास कहते हैं - 'जो हम सहरी सो मीतु हमारा। बेगमपुरा एक संकल्पना है। ऐसी संकल्पना जो मन को भेद बुद्धि से मुक्त करके समतामूलक समाज की संरचना करती है। बाबू जगजीवन राम इन्हीं अथो± में संत रविदास के 'हम सहरी और 'मीत थे।
मुझे याद है, शुरुआती दौर में बहुत से रेडिकल दलित चिन्तकों को संत रविदास की बानी नहीं पसन्द आती थी। उनकी शिकायत थी कि रविदास 'प्रभुजी। तुम चन्दन हम पानी और प्रभुजी! तुम स्वामी हम दासा कहते हैं। उन्हें लगता था इतना विनम्र आदमी दलित आन्दोलन का प्रतीक कैसे हो सकता है। रविदास की विनम्रता दिखार्इ देती थी दृढ़ता नहीं। वर्ण व्यवस्था ने श्रम को हेय करार दे रखा था। रविदास ने श्रम की संस्Ñति को दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठापित किया। जैसे-जैसे दलित आन्दोलन आगे बढ़ा वैसे-वैसे रविदास के बारे में यह समझ विकसित होती गयी।
संत रविदास की यह विनम्रता और दृढ़ता ही है जो बाबू जगजीवन राम को एक ही साथ राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति सहज और दलित सरोकारों के प्रति सजग बनाये रखती है।बाबू जगजीवन राम ने राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्यधारा में रहते हुए, सरकारों में शामिल होकर दलितोत्थान के लिए जो कार्य किये हैं उनका मूल्यांकन होना बाकी है। इसके लिए हमें दलित आन्दोलन के आगामी चरण का इन्तजार करना होगा।
बाबू जी ने अपने एक व्याख्यान में कहा है- 'शरीर को ही गुलाम नहीं, किस तरह हमारे मसितष्क को गुलाम बना दिया गया है कि जो हमारे उपर अत्याचार करता है उसको हम अपने से बड़ा मान लेते हैं। सबसे बड़ा हमारे मसितष्क का ह्रास इसमें किया गया कि हमने अपने आप को छोटा समझ लिया। जो व्यकित खुद अपने आप को छोटा समझता रहेगा, वह कभी बड़ा नहीं बन सकता रविदास प्रसिद्ध और मान्य संत होने के बाद भी बार-बार 'कह रैदास खलास चमारा कहते हैं और जूता सीने का काम करते हुए इसी मानसिक गुलामी को तोड़ते हैं।
बाबू जगजीवन राम भी संत रविदास की भाँति स्वयं को हीन और अत्याचारी को श्रेष्ठ समझने वाली मानसिक गुलामी को तोड़ने का काम करते हैं। वे बार-बार सवाल करते हैं- 'मानव के र्इश्वरत्व को प्रतिषिठत करने का जतन क्या भारतीय समाज में सम्भव है। उनका ध्येय ऐसे समाज की रचना है जिसमें मनुष्य के र्इश्वरत्व को प्रतिषिठत किया जा सके। इसीलिए वे कहते हैं- 'भारतीय समाज ने हमको छोटा बनाकर रख दिया है, मैं किसी को छोटा नहीं बनाना चाहता। यह बहुत गहरे आत्मविश्वास से उपजा हुआ कथन है । हमें छोटा बनाया गया, पर हम किसी को छोटा नहीं बनाना चाहते, हमें घृणित समझा गया पर हम किसी को घृणित नहीं समझते, हमें उत्पीडि़त किया गया पर हम किसी को उत्पीडि़त नहीं करना चाहते, हमारा शोषण किया गया, पर हम किसी का शोषण नहीं करना चाहते। ऐसी अनेक बातें हैं जो इस आत्मविश्वास से निकलती हैं। बाबू जगजीवन राम की समझ है कि शोषण के क्रम को उलट कर शोषण मुक्त और समतामूलक समाज की रचना संभव नहीं है। शोषण और विषमता पर टिके समाज में कोर्इ भी मुक्त नहीं है इसीलिए बाबू जी कहते हैं- 'यदि मैं ब्राहमणवाद को मिटाने का जतन कर रहा हूँ, तो मैं ब्राहमण को भी मुक्त करना चाहता हूँ, ठाकुर को भी मुक्त करना चाहता हूँ सिर्फ दलितों को नहीं। रेडिकल से रेडिकल दलित चिन्तन को एक न एक दिन बाबू जी की इस बात का मर्म समझना होगा कि दलित मुकित अकेले संभव नहीं है। वह तभी संभव है जब ब्राहमणवाद के जाल से स्वयंं ब्राहमण की मुकित हो, क्षत्रिय की मुकित हो, सभी वणो± की मुकित हो, पूरे समाज की मुकित हो। बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर इस बात को ठीक से समझते थे हम शायद इसीलिए उन्होंने बाबू जगजीवन राम को 'दूरदृषिट सम्पन्न ऋषि नेता करार दिया था।

सीतायाश्चरितं महत्/सदानन्द शाही


रामायण और महाभारत भारतीय मन को निर्मित और नियन्त्रित करने के स्रोत रहे हैं। इसलिए परिवर्तन के प्रत्येक दौर में इन महाकाव्यों को आधार बनाकर अपने विचारों और मान्यताओं को व्यक्त करने की कोशिशें हुई हैं। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को निरूपित करने की दृष्टि से भी इन दोनों महाकाव्यों का काफी उपयोग हुआ है। इस नजरिये से देखें तो सीता के चरित्र का सर्वाधिक उपयोग हुआ है। सीता और सावित्री का नाम एक साथ लिया जाता रहा है। सावित्री एक दूसरा पौराणिक चरित्र है जिसे सती का दर्जा प्राप्त है क्योंकि वह यमराज से लड़कर अपने पति सत्यवान को वापस लाने में कामयाब हुई थी। राम मनोहर लोहिया बिल्कुल ठीक कहते हैं कि सिवा इसके सावित्री के चरित्र में और कोई खास बात दिखाई नहीं देती। अपने को पूरी तरह पति या पुरुष में लीन कर देने और पुरुष की प्रधानता को स्थापित करने के लिए सावित्री की कथा से उपयुक्त दूसरी कोई कथा हो ही नहीं सकती थी। सीता का नाम सावित्री के साथ लेने के पीछे केवल अनुप्रास का लोभ नहीं बल्कि सीता की तेजस्विता को सीमित करके उन्हें सहज अनुगामिनी के रूप में बदलने की कोशिश भी है।
पराक्रम, त्याग, नीति, कौशल आदि राम के ऐसे गुण हैं जिनके लिए भारतीय मानस में बेइन्तहा सम्मान है। मर्यादा पुरुषोत्तम होने के योग्य शायद ही कोई दूसरा चरित्र हो। स्त्री सम्बन्धी कोई आदर्श स्थापित हो तो राम की पत्नी सीता से ज्यादा उपयुक्त और कौन होगा। इसलिए सीता को सावित्री के साथ जोड़ करके उन्हें सावित्री की छायाप्रति के रूप में विकसित करने की कोशिश की गई। जबकि सीता की निजी चारित्रिक विशेषताएँ और विशिष्टताएँ कुछ और थीं। सीता पति या पुरुष की उस तरह से सहज अनुगामिनी नहीं थीं, जिस तरह के स्त्री आदर्श को वर्णाश्रम व्यवस्था निर्मित करना चाहती रही है।
विपरीत समय में, सीता राम के साथ रहीं, उनके आदेशों का पालन किया पर कहीं भी सीता ने अपने स्वत्व को स्थगित नहीं किया। यह सब उन्होंने तर्क और विवेक के साथ किया। जहाँ जरूरी हुआ वहाँ पर विक्षोभ की अभिव्यक्ति हुई है। यह सब ऐसी चीजे हैं जो सीता के चरित्र को वर्णाश्रमी ढंग की स्त्री का रोल माडल बनाने में असुविधा पैदा करती है। खास तौर से दो ऐसे अवसर हैं जब सीता की तेजस्विता, तर्क बुद्धि और विक्षोभ प्रकट होता है। पहली अग्नि परीक्षा और दूसरा निष्कासन। सीता के जीवन की दो ऐसी घटनाएँ हैं जो राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को भी प्रश्नांकित करती हैं। इसलिए उन्हंें नजरन्दाज करने और झुठलाने की कोशिशें भी की जाती रही हैं।
नाना पुराण निगम आगम तथा इसके अतिरिक्त भी उपलब्ध स्रोतों को खँगालने के बाद रामकथा लिखने वाले तुलसीदास भी इस प्रसंग को बचा ले गये हैं। रामचरित मानस में जिस सीता का अपहरण होता है वह असली सीता हैं ही नहीं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम को पहले से ही मालूम है कि सीता का हरण होगा और उन्हें अपार कष्ट झेलना पड़ेगा। इसलिए वे असली सीता को अग्निदेव की सुरक्षा में दे देते हैं। रावण जिस सीता का हरण करता है वह माया की सीता हैं। अग्नि परीक्षा में होता सिर्फ यह है कि माया की सीता अग्नि में प्रवेश करती हैं और असली सीता को अग्निदेव वापस लौटा देते हैं। यहाँ अग्नि परीक्षा का नाटक सिर्फ लोकादर्श स्थापित करने के लिए होता है। इस तरह लोकादर्श भी स्थापित हो गया और सीता को कोई कष्ट भी नहीं हुआ। साॅप भी मर गया और लाठी भी बच गयी। राम का मर्यादा पुरुषोत्तम वाला रूप भी कायम रह गया। अब जब असली सीता का हरण ही नहीं हुआ तो फिर आगे की कहानी को वैसे भी ‘रामराज्य बैठे त्रैलोका हर्षित भए गए सब सोका’ पर आकर खत्म हो जाना था।
रामचन्द्र शुक्ल, तुलसीदास की जिस बात पर सबसे ज्यादा रीझते हैं वह है मार्मिक स्थलों की पहचान। मार्मिक स्थलों की यह पहचान तुलसीदास के यहाँ दुतरफा है। कुछ मार्मिक स्थलों को पहचान कर उन्हें पर्याप्त विस्तार देना और कुछ मार्मिक स्थलों को ठीक से पहचान कर (मसलन सीता निर्वासन और शम्बूक बध) छोड़ देना। तुलसीदास कहते भी हैं- ‘संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने’ं। अपने इसी विवेक से तुलसीदास ने सीता निर्वासन और शम्बूक बध आदि प्रसंगों को छोड़ दिया है। पराये घर में रह आयी स्त्री को घर में आदर पूर्वक रखना वर्णाश्रमी मर्यादा के बरक्स स्वैराचार को प्रोत्साहित करता। दूसरी तरफ गर्भवती सीता का बियावन जंगल में निर्वासन राम की दयालुता और करुणा आदि को प्रश्नांकित करता। इसलिए रामचरितमानस में तुलसीदास ने इस प्रसंग की भनक नहीं लगने दी है। सवाल मर्यादा पुरुषोत्तम का है।
जनमानस में तुलसीदास और रामचरित मानस को जो स्वीकृति मिली हुई है उसकी वजह से रामकथा के इस प्रसंग की गंभीरता और अर्थवत्ता प्रायः नजरन्दाज कर दी जाती है। बहुतेरे ऐसे रामभक्त भी मिल जायेंगे जो सीता निर्वासन के प्रसंग को ही खारिज कर देते हैं। इसके लिए यह तर्क दिया जाता है कि वाल्मीकि रामायण का उत्तरकाण्ड प्रक्षिप्त है। राम की छवि को धूमिल करने के लिए किसी ने यह प्रसंग जोड़ दिया है। इसके पक्ष में यह दलील दी जाती है कि यदि उत्तरकाण्ड की कथा प्रामाणिक होती तो महाभारत के रामोपाख्यान में भी इसका उल्लेख होता। प्रामाणिकता और अप्रामाणिकता के प्रसंग में जाने की न तो मेरी योग्यता है और न ही यहाँ इसकी जरुरत है। सिर्फ इतना कहना काफी है कि रामायण के लंका काण्ड में और महाभारत में लंका विजय के बाद और अग्नि परीक्षा के पहले राम जिस तरह सीता को सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हैं- सीता का निष्कासन उसकी स्वभाविक परिणति लगता है। अस्तु, सीता का निर्वासन रामकथा का स्वाभाविक अंग है। इसकी पुष्टि लोक और शास्त्र दोनों ही करते हैं। अब इससे राम की मर्यादा पुरुषोत्तम और सीता की मोम की गुड़िया वाली छवि खंडित होती हो तो हो।
(2)
शुरू तुलसीदास से ही करें। तुलसीदास के पूरे साहित्य में सीता निर्वासन के प्रसंग की चर्चा सिर्फ गीतावली में मौजूद है। वह भी एक पद में। पद अत्यन्त मार्मिक है। तुलसीदास वर्णाश्रम व्यवस्था को और शास्त्र को महत्व देने वाले व्यक्ति हैं, पर कवि तुलसीदास लोक में भी गहरे धँसे हुए हैं। गीतावली के इस पद में तुलसीदास की वाणी में लोक मन की अभिव्यक्ति हुई है-
तौ लौं बलि आपुही कीबी विनय समुझि सुधारि।
जौ लौं हौं सिखि लेउँ वन रिषि-रिति बसि दिन चारि।।
तापसी कहि कहा पठवत नृपन को मनुहारि।
बहुरि तिहि विधि आइ कहिहंै साधु कोउ हितकारि ।।
लखन लाल कृपाल ! निपटहि डारिबी न बिसारि।
पालबी सब तापसनि ज्यों राजधरम विचारि।।
सुनत सीता बचन मोचत सकल लोचन - बारि।
बाल्मीकि न सके तुलसी सो सनेह सॅभारि।।     (1)

सीता को वन में छोड़कर जाते समय लक्ष्मण उनसे पूछते है कि राम के लिए कोई सन्देश हो तो कह दें। इस पर सीता जवाब देती हैं- तब तक आप अपनी ही समझ से सुधार कर मेरा विनय उनसे कह दीजिएगा, जब तक कि मैं वन में दो चार दिन रह कर यह सीख नहीं लेती कि वनवासी तपस्विनियाँ राजाओं महाराजाओं को किस भाषा में और क्या सन्देश देती हैं। यह जान लेने के बाद आते जाते किसी उपकारी साधु से अपना सन्देश भेज दूँगी। इस जवाब में सीता क्या नहीं कह देती हैं। गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक ने सवाल उठाया है- बंद ेनइंसजमतद ेचमंा घ् क्या जो हाशिए पर हैं, वंचित और उपेक्षित हैं वे बोल सकते हैं? सीता की भाषा देखिए। यह पति को परमेश्वर मानकर पूजने वाली स्त्री की भाषा नहीं है। राम ने जो अपमान किया है उससे सीता क्षुब्ध हैं। साथ ही विवश भी हैं।विवशता और क्षोभ दोनों की अभिव्यक्ति हो रही है। कल तक जो सीता महारानी थीं रातो-रात वनवासी तपस्विनी हो गयी हैं। हैसियत बदल गयी है। प्रेम और समर्पण का जो सहज सम्बन्ध है- राम उसके पात्र नहीं रह गये हैं। इसलिए पुरानी भाषा का प्रयोग नहीं किया जा सकता। जो नयी वास्तविकता है नयी सचाई है उसकी भाषा अभी तक नहीं सीख पाई हैं। वंचितों की भाषा सीख लें तब कोई सन्देश दें। सन्देश प्रियतम राम को नहीं महाराजाधिराज को देना है। साधारण वनवासी तपस्विनियाँ महाराजाधिराज को किस तरीके से संबोधित करती है। यह जान लेना आवश्यक है। एक बात और है-लक्ष्मण जो सन्देश ले जाने के लिए प्रस्तुत हैं वे महाराजाधिराज के भाई हैं। वे सभी तपस्विनियों का संवाद तो ले नहीं जाते हैं। कोई आता-जाता राही बटोही साधु संन्यासी ही यह संवाद राज दरबार तक ले जा सकता है। तो फिर मुझे यह विशेषाधिकार क्यों ? सीता अपने सभी विशेषाधिकारों की भी तिलांजलि दे देती हैं। लखन लाल से भी उन्हें कोई व्यक्तिगत अनुकम्पा नहीं चाहिए। वे उनसे न भूलने का अनुरोध इसलिए करती हैं कि यह राजधरम है। प्रकारान्तर से यह राम के राज धरम पर भी टिप्पणी है।
अभिप्राय यह कि तुलसीदास भी जब इस प्रसंग को उठाते हैं तो वे न केवल राम के अन्याय के प्रति सीता के क्षोभ को व्यक्त करते हैं बल्कि काफी हद तक उनके साथ खड़े हैं।
राम के सीता के प्रति व्यवहार और सीता के क्षोभ की अभिव्यक्ति के कुछ और रूप देखें। क्रौंच पक्षी के शोक को श्लोक का रूप देने वाले आदि कवि वाल्मीकि के यहाँ दोनांे प्रसंग मिलते हैं। वाल्मीकि रामकथा के रचयिता ही नहीं वे स्वयं इस कथा के महत्वपूर्ण किरदार भी हैं। खास तौर से सीता निर्वासन से लेकर लवकुश के पालन-पोषण और अश्वमेध यज्ञ में राम से उनके युद्ध और सीता के धरती में प्रवेश आदि घटनाओं के सूत्रधार और साक्षी।
लंका पर विजय हासिल करने के बाद सीता राम के सम्मुख लायी जाती हैं। उस समय राम ने सीता के चरित्र पर सन्देह करते हुए जो बातें की हैं वह किसी मर्यादा पुरुषोत्तम की नहीं बल्कि एक पुरुष प्रधान समाज के औसत पुरुष का कथन ही जान पड़ता है। राम के सन्देह का सबसे प्रमुख कारण है सीता का शारीरिक सौन्दर्य। राम कहते हैं-‘सीते ! तुम जैसी दिव्य रूप सौन्दर्य से सुशोभित मनोरम नारी को अपने घर में स्थित देखकर रावण चिरकाल तक तुमसे दूर रहने का कष्ट नहीं सह सका होगा।’2 यानी सीता का सौन्दर्य ही उनका सबसे बड़ा शत्रु बन गया। पूरे एक सर्ग में राम यह समझाते हैं कि सीता देवि, यह युद्ध मैंने आपको प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि आपके अपहरण से मेरे महान कुल पर जो धब्बा लग गया था उसे दूर करने के लिए किया और अपने पराक्रम से जीता है।3 ध्यान रहे कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम ये सारी बातें सीता से अकेले में नहीं बल्कि भरी सभा में कह रहे हैं। ऐसा लगता है कि राम भरी महफिल में सीता को बेइज्ज्त करके मन की कोई भड़ास निकाल रहे हैं। रावण की मृत्यु के बाद सीता जिस उम्मीद से राम के सम्मुख आयी थीं या बुलायी गयी थीं स्थिति उसके एकदम उलट थी। थोड़ी ही देर पहले लंका पर राम का आधिपत्य स्थापित होने के बाद हनुमान राम का सन्देश लेकर पहुँचते हैं और सीता से कहते हैं-‘श्री राम ने आपको यह सन्देश दिया है-देवि मैंने तुम्हारे उद्धार के लिए जो प्रतिज्ञा की थी, उसके लिए निद्रा त्यागकर अथक प्रयत्न किया और समुद्र में पुल बाँध कर रावण बध के द्वारा उस प्रतिज्ञा को पूर्ण किया’(4)। यह सन्देश मिलने के बाद सीता जब सामने आती हैं तो राम का व्यवहार देखने लायक है। वे सीता के चरित्र पर सवाल उठाते हैं ‘तुम्हारे चरित्र में संदेह का अवसर उपस्थित है; फिर भी तुम मेरे सामने खड़ी हो। जैसे आँख के रोगी को दीपक की ज्योति नहीं सुहाती उसी प्रकार आज तुम मुझे अत्यन्त अप्रिय जान पड़ती हो(5)।’ राम का तर्क यह है कि कौन ऐसा कुलीन पुरुष होगा जो तेजस्वी होकर भी दूसरे के घर में रही स्त्री को मन से भी ग्रहण कर सकेगा। इसलिए राम सीता से साफ शब्दों में कहते हैं- ‘अतः जनक कुमारी! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो चली जाओ। मैं अपनी ओर से तुम्हें अनुमति देता हूँ। भद्रे ये दशों दिशाएँ तुम्हारे लिए खुली हैं। अब तुमसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है(6)।’ यह कहने के बाद राम उन्हें विकल्प भी सुझा देते हैं। भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, वानर राज सुग्रीव अथवा राक्षस राज विभीषण जहाँ तुम्हें सुख मिले जा सकती हो।7 यहाँ राम सीता के चरित्र पर सन्देह करते ही हैं इस सन्देह के दायरे में भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, सुग्रीव और विभीषण सब आ जाते हैं। भय में, पराजय में, लाभ में और हानि में समभाव रखने वाले राम का यह विचलन अचम्भित करने वाला है।
अब महाभारत के राम का भी थेाड़ा जायजा ले लिया जाय। लंका विजय के बाद सीता जब सामने आती हैं तो राम कहते हैं- ‘विदेह कुमारी! मैने तुम्हें रावण की कैद से छुड़ा दिया अब तुम जाओ मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा कर दिया।’8 इसके बाद राम सारी हद पार कर देते हैं। वे कहते हैं-

   सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि।
   नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढ़ं हविर्यथा।। 9

अर्थात ‘मिथिलेश नन्दिनी! तुम्हारा आचार-विचार शुद्ध रह गया हो अथवा अशुद्ध अब मैं तुम्हें अपने प्रयोग में नहीं ला सकता-ठीक उसी तरह जैसे कुत्ते के चाटे हुए हविष्य को कोई भी ग्रहण नही करता है’। क्या सीता राम के लिए हवन सामग्री हैं। यदि ऐसा है तो वह कौन सा यज्ञ है जिसके लिए सीता महज हवन सामग्री हैं और जूठी हो जाने पर सर्वथा अनुपयुक्त हो जाती हैं। यह महज बानगी मात्र है। स्त्री के बारे में राम के ऐसे संकीर्ण विचारों को उदधृत किया जाय तो अपने आप में एक पूरा ग्रंथ तैयार हो जाय।
स्वयंभू के पउमचरिउ में राम कहते है कि ‘‘नदी की तरह कुटिल महिला का कौन विश्वास कर सकता है, भले ही दुष्टा महिला मर जाय, पर वह देखती किसी को है और ध्यान करती है किसी दूसरे को। उसके मन में जहर होता है, शब्दों में अमृत और दृष्टि मंे यम होता है, स्त्री के चरित्र को कौन जानता है, वह महानदी की तरह दोनों कूलों को खोद डालती है। चन्द्रकला के समान सबपर टेढ़ी नजर रखती है, दोष ग्रहण करती है, स्वयं कलंकिनी होती है, नयी बिजली की तरह वह चंचल होती है, गोरस मन्थन की तरह कालिमा से स्नेह करती है, सेठों के समान कपट और मान रखती है, अटवी के समान आशंकाओं से भरी हुई होती है, निधि के समान वह प्रयत्नों से संरक्षणीय है, गुड़ और घी की खीर की भाँति वह किसी को भी देने योग्य नहीं है।’’ 10
मैं कहना यह चाहता हूँ कि ‘जगज्जननी सीता’ के बारे में इतने कुत्सित विचारों के बावजूद राम हमारे समाज में मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में माने और पूजे जाते हैं। इसी से अन्दाज लग सकता है कि हमारे समाज में स्त्री की स्थिति कितनी नीचे गिरी हुई है। सीता बार-बार कहती हैं कि ‘जो मेरे अधीन है वह मेरा हृदय सदा आप में ही लगा रहता है (उस पर दूसरा कोई अधिकार नहीं कर सकता) परन्तु मेरे अंग तो पराधीन थे। उनका यदि दूसरे से स्पर्श हो गया तो मैं विवश  अबला क्या कर सकती हूँ।11’ वे बार-बार कहती हैं कि रावण के शरीर से मेरे शरीर का स्पर्श हो गया इसमें मेरी विवशता ही रही है। मैंने स्वेच्छा से ऐसा नहीं किया था। अपनी ही जीवन संगिनी की इस विवशता को राम किसी तरह से समझने को तैयार नहीं हैं। वे न केवल सीता को बल्कि समूची स्त्री जाति को सन्देह की नजर से देखते हैं। इस पर सीता की टिप्पणी  देखने लायक है-
पृथकस्त्रीणां प्रचारेण जातिं त्वं परिशकुसे (12)
अर्थात ‘नीच श्रेणी की स्त्रियों का आचरण देखकर यदि आप समूची स्त्री जाति पर सन्देह करते हैं तो यह उचित नहीं है।’ वंचित तबके के लिए एक व्यक्ति या सदस्य की गलती को पूरे वर्ग के चरित्र लक्षण के रूप में देखना या निरूपित करना प्रभावशाली समूहों की आम प्रवृत्ति है। यहाँ राम का आचरण इसी तरह का है। सीता की नजर में राम की यह प्रवृत्ति ओछे मनुष्य की प्रवृत्ति है। वे कहती हैं- ‘नृपश्रेष्ठ! आपने ओछे मनुष्य की भाँति केवल रोष का ही अनुसरण करके मेरे शील स्वभाव का विचार छोड़ कर केवल निम्नकोटि की स्त्रियों के स्वभाव को ही अपने सामने रखा है(13)।’ राम को ओछा मनुष्य कहने का यह साहस सीता के व्यक्तित्व के एक अलग ही रूप को प्रकाशित करता है। आम तौर पर जिससे हमारा परिचय नहीं है। सीता यह कहती हैं कि यदि मुझे त्यागना ही था तो यह बात आपने तभी कहला दी होती जब आपने हनुमान को मेरा हाल जानने के लिए भेजा था। मैं उसी समय अपना प्राण त्याग देती और आपको और आपके साथियों को युद्ध का यह श्रम नहीं करना पड़ता। फिर इस प्रकार अपने जीवन को संकट में डालकर आपको यह युद्ध आदि का व्यर्थ का परिश्रम नहीं करना पड़ता तथा आपके ये मित्र लोग भी अकारण कष्ट नहीं उठाते (14)। सीता इतनी सरलता से उस महायुद्ध की व्यर्थता की ओर इशारा करती हैं जो राम के पौरुष, प्रभुत्व और पराक्रम की महागाथा है। वे राम के पराक्रम और पुरुष अहं दोनो की हवा निकाल देती हंै। पर अहं तो अहं है। सीता को अग्नि परीक्षा तो देनी ही होगी। इस पूरे प्रसंग में राम ने जैसे अपना विवेक ही खो दिया है। वाल्मीकि कहते हैं- उस समय श्री रघुनाथ जी प्रलयकालीन संहारकारी यमराज के समान लोगों के मन में भय उत्पन्न कर रहे थे। उनका कोई भी मित्र उन्हें समझाने उनसे कुछ कहने अथवा उनकी ओर देखने का साहस न कर सका(15)। सीता अपनी सचाई को प्रमाणित करने के लिए लक्ष्मण से चिता सजाने के लिए कहती हैं। न चाहते हुए भी राम का इशारा पाकर लक्ष्मण चिता तैयार करते हैं। देखते-देखते सीता सबके सामने आग में प्रवेश कर जाती हैं। यद्यपि यहाँ सीता अग्नि परीक्षा में सफल होती हैं और साक्षात अग्नि देवता उन्हें लेकर प्रकट होते हैं। अग्नि देव से सीता का चरित्र प्रमाण पत्र पाकर राम आश्वस्त होते हैं। थोड़ी देर पहले तक क्रोध में अन्धे होकर विवेक शून्य बातें करने वाले राम यहाँ तक कह डालते हैं कि मुझे अच्छी तरह मालूम है कि सीता प्रज्वलित अग्नि शिखा के समान दुर्धर्ष तथा दूसरों के लिए अलभ्य हैं। दुष्टात्मा रावण मन के द्वारा भी इनके उपर अत्याचार करने में समर्थ नहीं हो सकता था(16)। प्रश्न उठता है कि जब सीता की तेजस्विता के बारे में राम को इतना अखण्ड विश्वास था फिर अग्नि परीक्षा लेने की जरूरत क्या थी? राम स्वयं कहते हैं कि सीता रावण के घर में रही थी ं इसलिए परीक्षा के बगैर उनके साथ रहने पर लोग मुझे कामी और मूर्ख समझ लेते। राम एक और तर्क देते हैं। मैं तो सीता के चरित्र के प्रति पहले ही आश्वस्त था लेकिन मैं चाहता था कि सीता की शुद्धता के बारे में त्रैलोक्य को पता चल जाये, इसलिए उन्हें अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा।17 अग्नि परीक्षा से सीता के चरित्र के बारे में त्रैलोक्य कितना आश्वस्त हुआ और स्वयं राम किस हद तक आश्वस्त हुए इसकी चर्चा थोड़ा आगे करेंगे।
थोड़ी देर रुक कर अग्नि परीक्षा के सामाजिक सन्देश पर विचार कर लें। मेरी जानकारी में स्त्री को अपनी शुचिता प्रमाणित करने के लिए अग्नि परीक्षा देने की यह पहली घटना है। इससे राम भक्तों के इस देश में त्रैलोक्य को स्त्री की शुचिता की परीक्षा लेने और पुरुष वर्चस्व को स्थापित करने का एक बड़ा हथियार मिल गया। जब जगज्जननी सीता अग्नि परीक्षा से गुजर सकती हैं तो फिर साधारण स्त्रियाँ क्यांे नहीं। अग्नि परीक्षा से सीता तो बच गईं पर इस दृष्टान्त की वेदी पर करोड़ों स्त्रियाँ अग्नि और अग्निपरीक्षा के हवाले होती रही हैं। हमारे समाज ने स्त्री की शुचिता को नापने का अद्भुत पैमाना विकसित कर लिया और राम की उदात्त कथा शताब्दियों से इस पैमाने को वैधता प्रदान करती आ रही है।
कालान्तर में सीता के निर्वासन की घटना प्रमाणित करती है कि सीता की अग्नि परीक्षा से न तो त्रैलोक्य का मन साफ हुआ और न ही राम का। सीता रावण के घर में रहीं और अब फिर राम के घर में हैं, इस पर धोबी प्रतिकूल टिप्पणी करता है। जाहिर है यह धोबी उसी त्रैलोक्य का हिस्सा है जिसे विश्वास दिलाने के लिए सीता की अग्नि परीक्षा कराई गयी थी। जिस गुप्तचर ने राजा रामचन्द्र तक यह सूचना पहुँचायी वह भी धोबी के तर्क से सहमत लगता है तभी उसने ऐसी सूचना राम तक पहुँचायी। वह गुप्तचर भी इसी त्रैलोक्य का हिस्सा रहा होगा। अब थोड़ा राम की स्थिति पर विचार करें। गुप्तचर से यह खबर मिलते ही राम के भीतर धँसा हुआ काँटा फिर से टभकने लगता है। वे भूल जाते हैं कि सीता अग्नि परीक्षा से गुजर चुकी हैं, सीता की शुचिता और तेजस्विता के बारे में कही गयी अपनी बातें भी भूल जाते हंै। वे भूल जाते हैं कि सीता अग्निशिखा के समान दुर्धर्ष और अलभ्य हैं। दुष्टात्मा रावण उन्हें मन से भी स्पर्श नहीं कर सकता। राम एक बार फिर अपना विवेक खो देते हैं। वे सीता के निष्कासन का निर्णय ले लेते हैं। एक बार फिर वे कोई तर्क सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। लोक निन्दा का भय इतना विकराल रूप ले लेता है कि उसके आगे सब कुछ बेमानी हो जाता है। दर अस्ल यहाॅ मामला सिर्फ लोक निन्दा का नहीं बल्कि स्त्री के प्रति सहज अविश्वास का है, जिसके नाते राम सीता को त्यागने के लिए उद्यत हैं। वे कहते हैं- नर श्रेष्ठ बन्धुओ ! मैं लोक निन्दा के भय से अपने प्राणों को और तुम सबको त्याग सकता हूँ। फिर सीता को त्यागना कौन सी बड़ी बात है।18 सीता यानी महज एक स्त्री जो सभासदों आदि की तुलना में तुच्छ और त्याज्य है। यहँा राम ऐसे राजा के रूप में दिखाई देते हैं जो अपने निर्णय पर कोई तर्क वितर्क नहीं सुनना चाहता। वे कहते हैं सीता के बारे में मुझसे किसी तरह की कोई दूसरी बात तुम्हे नहीं कहनी चाहिए।19 जो मेरे इस कथन के बीच में कूद कर किसी प्रकार मुझसे अनुनय विनय करने के लिए कुछ कहेंगे वे मेेरे अभीष्ट कार्य में बाधा डालने के कारण सदा के लिए मेरे शत्रु होंगे।20 इसके बाद फिर किसकी हिम्मत हो सकती है कुछ बोलने की।कौन राजाज्ञा के विरोध के अपराध का भागी बने?
लक्ष्मण के जिम्मे फिर एक अप्रिय कार्य आता है। उन्हें सीता को वन में छोड़ने की जिम्मेदारी दी जाती है। लक्ष्मण सीता से कहते हैं- ‘विदेह नन्दिनी मेरे हृदय में सबसे बड़ा काँटा यही खटक रहा है कि आज रघुनाथ जी ने बुद्धिमान होकर भी मुझे वह काम सौंपा जिसके कारण लोक में मेरी निन्दा होगी।’21 राम के सहज अनुयायी लक्ष्मण इस आदेश से इतने आहत और अमर्ष में हैं कि वे कह उठते हैं। ‘इस लोक निन्दित कार्य में मुझे लगाना उचित नहीं था।’22 यानी राम और लक्ष्मण का लोक अलग-अलग है। राम बार बार जिस त्रैलोक्य अर्थात लोक का हवाला देते हैं वह स्त्री के प्रति अनुदार है। इसीलिए सीता को एक पल भी घर में रखना राम केा लोक निन्दा का सबब लग रहा है। इसके एकदम उलट लक्ष्मण को सीता के बनवास में सहायक होना लोक निन्दित कार्य लग रहा हैै। यानी राम के लोक से अलग भी एक लोक है जो स्त्री के प्रति उदार और सहानुभूतिशील है। भले ही लोक का यह हिस्सा सामाजिक, राजनीतिक संरचना में हाशिए पर ही रहा हो और उसकी आवाज की परवाह करने की फुरसत राजसत्ता को न हो। इस अवसर पर सीता का सन्देश हाशिए की वह आवाज है जो विवशता के बावजूद वर्चस्वशाली समूहों पर तीखा व्यंग्य करती है। सीता कहती हैं-
‘रघुनन्दन जिस तरह पुरवासियों के अपवाद से बचकर रहा जा सके उसी तरह आप रहें। स्त्री के लिए तो पति ही देवता है, पति ही बंधु है पति ही गुरु है। इसलिए प्राणों की बाजी लगाकर भी विशेष रूप  से पति का प्रिय करना चाहिए।’23 अन्तर्निहित व्यंग्य यह कि पति का पत्नी के लिए कोई कर्तव्य नहीं है। एक पुरुष प्रधान समाज में पत्नी के कर्तव्य निर्धारित हैं,मर्यादा निर्धारित हंै। पति का न तो कर्तव्य निर्धारित हैं न मर्यादा। ऐसा लगता है कि राम का   मर्यादा पुरुषोत्तम होना मानवता का आदर्श नहीं बल्कि वर्णसत्ता और पुरुष सत्ता का आदर्श है। वे शम्बूक का वध वर्ण की मर्यादा सुरक्षित रखने के लिए करते हैं तो सीता का निष्कासन पुरुष अहं की रक्षा के लिए। राम के कमजोर और दुहरे चरित्र को लक्ष्य करती हुई कालिदास की सीता राम को चुनौती देती हैं। वे लक्ष्मण के माध्यम से राम को कहलाती हैं-‘और राजा से जाकर तुम मेरी ओर से कहना कि आपने अपने सामने ही मुझे अग्नि मंे शुद्ध पाया था। इस समय अपजस के डर से जो आपने मुझे छोड़ दिया है वह क्या उस प्रसिद्ध कुल को शोभा देता है जिसमें आपने जन्म लिया है।’24 तुलसी दास की सीता महाराजाधिराज को सन्देश देने के लिए उपयुक्त भाषा सीखने का इन्तजार करती हैं। कालिदास की सीता का संबोधन देखने लायक है ‘और राजा से जाकर तुम मेरी ओर से कहना।’ राम अब प्रिय या पति नहीं महज एक राजा हैं। ऐसे राजा जो अन्याय तो करते ही हैं अपमान भी कर रहे हैं। इसलिए राम बार बार जिस कुल की दुहाई देते हैं, श्रेष्ठता का डंका पीटते हैं, सीता (और कालिदास) को राम का यह आचरण उसी कुल की मर्यादा के अनुरूप नहीं लगता।
राम का यह व्यवहार कालिदास के वाल्मीकि को इतना खराब लगता है कि वे राम का नाम तक नहीं लेना चाहते। वे राम को भरत के बड़े भाई के रूप मंे याद करतें हैं। यह भी एक लोक है जो राम का नाम लेने से गुरेज करता है। आम तौर पर गर्हित काम करने वाले का नाम नहीं लिया जाता। राम ने गर्भवती सीता को निर्वासित करके ऐसा ही गर्हित काम किया है। ‘यद्यपि वे तीनो लोकों का दुख दूर करने वाले हैं, अपनी प्रतिज्ञा के पक्के हैं और अपने मुँह से अपनी बड़ाई भी नहीं करते, फिर भी तुम्हारे साथ जो उन्होंने भद्दा व्यवहार किया है, इसे देखकर मुझे भरत के भाई पर बड़ा क्रोध आ रहा है।’25 लोक में आज भी यह परम्परा है कि गर्हित कार्य करने वाले व्यक्ति का लोग नाम भी नहीं लेना चाहते। कालिदास के वाल्मीकि राम को नाम से पुकारने के बजाय भरत का भाई कहते हैं।
जिस लोक निन्दा के भय से राम ने सीता का निष्कासन किया किया मजे की बात है कि लोक के एक हिस्से में भी इसके लिए राम निन्दित होते रहे हैं। लोक गीतों में एक कथा प्रसंग मिलता है। राम एक वन से दूसरे वन जा रहे है। तीसरे वृन्दावन में गुल्ली डंडा खेलते हुए दो बालक मिलते हैं। उन्हें देखकर राम मोहित हो जाते हैं और पूछते हैं-
गुल्ली-डंडा खेलत दुइ बलकवा देखि राम मोहन,
केकर तू पुतवा नतियवा केकर हौ भतिजवा
लरिका कौनी महतरिया के कोखिया जनमि जुडवायउ हो, (26)
 (तुम किसके बेटे हो, नाती किसके हो, किसके भतीजे हो किस माँ की कोख से जन्म लेकर उसे तृप्त कर रहे हो)
इस पर बच्चे जवाब देते हैं-
बाप के नउवा न जानौ लखन के भतिजवा
हम राजा जनक के नतिया सीता के दुलरुवा हो। (27)

(पिता का नाम नही मालूम, लखन के भतीजे हैं, राजा जनक के नाती हैं और सीता के दुलारे हैं)
लोक कवि का अन्दाज देखिए। बच्चे कहते हैं पिता का नाम नही मालूम मगर हम लक्ष्मण के भतीजे हैं राजा जनक के नाती और सीता के दुलारे हैं। जिस राम के नाम की इतनी महिमा गायी जाती है लोक कवि उस नाम से जान बूझ कर परहेज करता है।  कालिदास की तरह लोक गीतों में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं।
निष्कासन के समय सीता का आहत स्वाभिमान क्षुब्ध है। वे रास्ते में लक्ष्मण को अपना पेट दिखाते हुए अपने गर्भवती होने की खबर देती हैं। उन्हें यह आशंका है कि संभव है राम फिर इसपर शंका करें- मेरी ओर से सारी बातें तुम रघुनाथ जी से कहना और आज तुम  भी मुझे देख जाओ। मैं इस समय ऋतुकाल का उल्लघंन करके गर्भवती हो चुकी हूँ।28 सीता के इन अमर्षपूर्ण वाक्यों का निहितार्थ समझना चाहिए। सीता को अयोध्या में अपमान और लांछन के सिवा मिला क्या?
लव-कुश का जन्म होता है। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पलते बढते हैं। अश्वमेध यज्ञ के समय  राम से उनका आमना-सामना होता है। सारा प्रसंग जानने के बाद सीता की वापसी की बात चलती है। वाल्मीकि सीता के आचरण के बारे मेेें राम केा आश्वस्त करते हैं। पर बेकार, राम एक बार फिर सीता की शुचिता की परीक्षा लेने का प्रस्ताव करते हैं। वे कहते हैं-‘देवताओं और ऋषियों को उपस्थित देख श्री रघुनाथ जी फिर बोले सुर श्रेष्ठ गण! यद्यपि मुझे महर्षि वाल्मीकि के निर्दोष वचनों से ही पूरा विश्वास हो गया है, तथापि जन समाज के बीच विदेह कुमारी की विशुद्धता प्रमाणित हो जाने पर मुझे अधिक प्रसन्नता होगी।’29 पहली अग्नि परीक्षा के बाद सीता राम के पास रही हैं। निष्कासन के समय वाल्मिकि के आश्रम में दुबारा अग्नि परीक्षा का औचित्य हो सकता है। किन्तु एक बार फिर अग्नि परीक्षा का प्रस्ताव सीता के सम्मुख है। अग्नि परीक्षा का यह प्रस्ताव सीता जैसी स्वाभिमानी स्त्री के लिए घोर अपमान का विषय है। एक बार अग्नि परीक्षा से गुजर कर अपनी शुचिता प्रमाणित करने बाद ही सीता अयोध्या लायी गयीं थीं। कालान्तर में यह अग्नि परीक्षा व्यर्थ सिद्ध हुई। सीता को निष्कासन का दण्ड झेलना पड़ा। अब दुबारा अग्नि परीक्षा का क्या मतलब। जन समाज के समक्ष सीता की विशुद्वता प्रमाणित हो भी गयी जो राम के मन में सन्देह का कीड़ा कुलबुलाता रहता है उसका क्या होगा? जिस अयोध्या से अपमानित और लांछित होकर निष्कासित होना पड़ा फिर वहीं जाने के लिए अग्नि परीक्षा से गुजरना। यह बार बार की अग्नि परीक्षा स्त्री के स्वत्व को कुचलने की कोशिश है। सीता इससे इन्कार करती हैं, उन्हें अपने स्वत्व को विनष्ट करके अयोध्या नहीं जाना। वे धरती मँा की शरण में जाना पसन्द करती हैं।-‘यदि मैं मन वाणी और क्रिया के द्वारा केवल श्री राम की ही आराधना करती हूँ तो भगवती पृथ्वी देवी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। और सीता पृथ्वी में समाहित हो जाती है।’30 पृथ्वी अपनी गोद में सीता को स्थान दे देती हैं। सीता बार-बार के अपमान और लंाछन से मुक्त हो जाती है।
राम के पुरुष अंह और सन्देह के पक्ष में कोई कवि खड़ा नहीं होता। सभी कवि सीता के साथ हुए अन्याय को लक्ष्य करते हैं उनके पक्ष में खड़े होते हंै। वाल्मीकि हों, व्यास हों, कालिदास हों या फिर स्वयं तुलसीदास ही क्यों न हों।
राम जिस लोक की इतनी परवाह करते हैं, जन समाज के सामने सीता की शुद्धता प्रमाणित करने के लिए विकल हैं, उसी जनमानस के भीतर उसी लोक के भीतर एक दूसरा लोक है जो राम से सहमत नहीं है। उस लोक का पाठ भी  देखिए। राम के पास तो सीता से वापस चलने को कहने का मँुह ही नही है। वे इसके लिए वसिष्ठ से कहते हैं। वसिष्ठ सीता को समझाते हैं। वसिष्ठ के समझाने पर सीता अयोध्या की ओर दस कदम चलती हैं और अयोध्या न जाने का संकल्प दुहरा देती हैं।
तुम्हारे कहा गुरु करबइ, परग दस चलबइ
फाटल धरती समाबइ, अजोधिया न जाबइ।। 31

गुरु आप के सम्मान के लिए अयोध्या की ओर बस दस कदम चलूँगी। धरती फटेगी उसमें समा जाउंगी। अयोध्या नहीं जाऊंगी। जो अयोध्या स्त्री को अपमानित और लांछित करती है उस अयोध्या जाने से सीता इन्कार करती हैं। सीता की आखों मेें अमर्ष है दुःख है इस बारे में उस अपमान और अमर्ष को लेकर सीता चुप हैं।
सीता अखियँा में भरली वियोग एकटक देखिन
सीता धरती में गइली समाइ किछु नाहीं बोलिन।। 32

(सीता की आँखों में वियोग का भाव है। वे एक टक देखती हैं और चुपचाप धरती में समा जाती हैं।)
सीता का धरती में समा जाना दरअस्ल अयोध्या की सत्ता को चुनौती है। उस सत्ता को जो वर्ण की श्रेेष्ठता स्थापित करने में लगी है, जो पुरुष की श्रेेष्ठता स्थापित करने लगी है- स्त्री का स्वत्व छीनने, उसे अपमानित लांछित और अधीन बनाने में लगी है। सीता का धरती में समा जाना इस अधीनता से इन्कार करना है।
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अगहन महीने में उत्तर भारत के हिन्दू घरों में शादियाँ नही होतीं। इसके पीछे मान्यता यह है कि अगहन में राम और सीता का विवाह हुआ था। यह एक असफल विवाह था। सीता को अनेक दुःख सहने पड़े। वनवास के दौरान जो कष्ट मिला उसे तो सीता ने खुशी खुशी स्वीकार कर लिया था। रावण के यहाँ जो यातना मिली उसे भी सीता ने राम के नाम पर बर्दाश्त कर लिया। सब कुछ के बाद जब राम सीता कोे सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हैं, अग्नि परीक्षा से गुजरने का अपमान और बाद उन्हें निष्कासन का दण्ड भोगना पड़ता है। यह सीता के दुर्भाग्य का चरम है। इस दुर्भाग्य पर सीता दुखी होती हैं। कहीं वे यह याद करती हैं कि उन्होंने आखिर ऐसा कौन सा कर्म किया था जिसके फलस्वरूप इतना बड़ा दुर्भाग्य उनके जीवन में घटित हुआ है। वे कर्मफल के दायरे में सारे दुखों का अपशमन करती हैं। वाल्मीकि रामायण सहित प्रायः सर्वत्र वे अपने दुर्भाग्य को पिछले जन्म के कर्मों का फल मानती हंै। स्वंयभू लिखित पउमचरित महाकाव्य की परम तेजस्वी सीता अग्नि परीक्षा के बाद अपने सारे दुर्भाग्य को कर्मों का फल मानकर राम को दोष मुक्त कर देती हैं। लेकिन वहाँ पर भी सीता कहती हैं कि हे रघुवर कुछ ऐसा करें की दुबारा स्त्री का जन्म न लेना पड़े।33 सीता से लेकर एक साधारण स्त्री तक यह कामना करती हुई मिल जाती है कि अगले जनम (यदि होता हो तो) स्त्री का जन्म न हो।जीवन के आरम्भ में प्रायः सभी स्त्रियाँ अपने स्त्री होने को एक खास गौरव के साथ देखती हैं। उनका सजना सँवरना हमेशा पुरुष के उपयोग के लिए नहीं बल्कि स्त्रीत्व का उत्सव होता है। किन्तु जीवन में जैसे-जैसे आगे बढ़ती है उसे इस बात का साक्षात्कार हो जाता है, और  जैसा कि तुलसीदास भी कहते हैं ‘कत विधि सृजी नारि जग नाहीं, पराधीन सुख सपनेहु नाहीं।’ वह इस नतीजे पर पहुँचती है कि अब उसे स्त्री का जन्म न मिले। इसके कारणों पर गौर करें तो हम पाते हैं स्त्री के जीवन में एक अदृश्य रेखा खिची होती जिसे लक्ष्मण रेखा कहते हैं। जाने अनजाने वह इसका उल्लंघन कर बैठती है। यह लक्ष्मण रेखा है राम रेखा नहीं है। यह भी एक विडम्बना ही है। लक्ष्मण जो रामकथा के हर प्रारूप में सीता के प्रति सहानुभूतिशील रहे हैं, रेखा वही खींचते हैं। तो क्या यह अर्थ लगाया जाय कि स्त्री के लिए प्रेम, सहानुभूति, सदाशयता आदि भी लक्ष्मण रेखा के रूप में ही सामने आती है। जमाना पहले का हो या आज का, मामला प्रेम का हो या अधिकार का, एक अनुल्लंघनीय लक्ष्मण रेखा मौजूद है। इस रेखा के भीतर सीता पूज्य हैं, महादेवी हैं, जगज्जननी हैं। रेखा का अतिक्रमण किया नहीं कि महादेवी से पतिता बनते देर नहीं लगती है। यह लक्ष्मण रेखा दरअस्ल स्त्री के व्यक्तित्व को सीमित करती है। इसलिए जहाँ भी स्त्री अपने व्यक्तित्व को महसूस कर बैठती है लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन हो जाता है। स्त्री की मूर्त से लेकर अदृश्य पराधीनता का सारा मामला इसी लक्ष्मण रेखा से जुड़ा हुआ है। इसलिए स्त्रियों को सुख पूर्वक जीना है तो इस रेखा को आत्मसात करना है। उनके लिए सारा सुख इसी रेखा के भीतर बने रहने में  है। इस रेखा के पार जाना, अपने व्यक्तित्व को आकार देना दुख को, दुर्भाग्य को, ग्लानि को, अपमान को, लांछन को निमंत्रण देना है।
सीता के व्यक्तित्व में एक खास बात यह दिखाई देती है कि वे अपने दुर्भाग्य को कोसती हैं। पिछले जन्म के कर्मों का फल मानती हैं। पर उनका सारा दुर्भाग्य अपने इसी जन्म के जिस कर्म का फल है उसे नहीं कोसतीं। अगर सीता ने लक्ष्मण रेखा न पार की होती तो उनका जीवन वैसा दुर्भाग्यपूर्ण न हुआ होता जैसा कि था। तब तो सारा मामला रामराज्य बैठे त्रैलोका हरसित भए गय सब सोका, पर ही समाप्त हो जाता। जाहिर है सब सोका में सीता का भी शोक अन्तर्निहित है। वे अग्नि परीक्षा से गुजरती हैं, धरती में समा जाती हैं पर लक्ष्मण रेखा को पार करने को लेकर अफसोस नहीं जाहिर करतीं। एक परिस्थिति में राम तो कह उठते हैं जो जनतेऊ वन बन्धु बिछोहू पिता वचन मनतेऊ नहि ओहू। सीता ऐसा कोई अफसोस नहीं जाहिर करतीं। सारे दुख और दुर्भाग्य का शिकार होकर  भी वे स्त्रीत्व को व्यक्तित्व सम्पन्न बनाती हैं। स्त्री के व्यक्तित्व को आकार देती हैं, उसे सम्प्रभु बनाती हैं। सीता का अयोध्या वापस जाने से इन्कार करना दरअस्ल लक्ष्मण रेखा में वापस लौटने से इन्कार करना है। रेखा के पार जाकर वे स्त्री के व्यक्तित्व को, उसकी अस्मिता को रेखांकित करती हैं। शायद इसीलिए आदि कवि वाल्मीकि ने अपने रामायण को ‘सीतायाश्चरितं महत’ भी कहा है।

















सन्दर्भः
1- गीतावली, तुलसीदास
2- नहिं त्वां रावणों दृष्ट्वा दिव्यरूपां मनेारमाम्।
    मर्षयेत् चिरं सीते स्वगृहे पर्यवस्थिताम्।।
     वाल्मीकि रामायण। युद्ध काण्ड। पञचदशाधिकशततमःसर्गश्लोक- 24
3- (अ)  विदितश्चास्तु भद्रं ते याऽयं रण परिश्रमः
  सुतीर्णः सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थ ममा कृतः।। वही, श्लोक- 15
    (ब)  रक्षता तु मया वृत्तमपवादं च सर्वतः
  प्रख्यातस्यात्मवंशस्य न्यङ च परिमार्जता।। वही, श्लोक- 16
4- मया ह्यलब्ध निद्रेण धृतेन तव निर्जये।
   प्रतिरौषा विनिस्तीर्णा बद्ध्वा सेतुं महोदधौ।।
वाल्मीकि रामायण। युद्ध काण्ड। त्रयोदशाधिकशततमः सर्ग। श्लोक- 11

5- प्राप्त चरित्र संदेहा मम प्रतिमुखे स्थिता।
   दीपो नेत्रा तुस्येव प्रति कूलासि मे दृढा।। 5
वाल्मीकि रामायण। युद्ध काण्ड। पञचदशाधिकशततमःसर्ग  श्लोक- 17

6- तद गच्छ त्वानुजानेऽद्य यथेष्टं जनकात्मजे
    एता दशा दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया।।  वही श्लोक- 16

7-  तदद्य भदे्र मयैतत् कृत बुद्धिना।
    लक्ष्मणे वाच भरते कुरु बुद्धिं यथा सुखम्।।
    शत्रुघ्नेवाच सुग्रीवे राक्षसे वा विभीषणे
    निवेशया मनः सीतेयथा वा सुखमात्मना।।  वही, श्लोक- 22-23


8- उवाच रामो वैदेही परामर्श विशंकितः
   गच्छ वैदेहि मुक्ता त्वं यत् कार्य तन्मयाकृतम्।।
महाभारत, रामोपाख्यानपर्व, एकनवत्यधिक द्विश्ततमोऽध्यायः श्लोक-10
9-  वही श्लोक- 13
10-।।जंमेट्टिया।। अह खल- महिलहे पाइ जिह कुडिलहे।
    को पत्तिज्जई जइ ति मरिज्जइ ।।1।।
    अण्णु णिएइ अणु अणु वोल्लावइ। चिन्तइ अण्णु अण्णु मणें भावइ ।।2।।
    हियवइ णिवसइ विसु हालाहलु। अमिउ वयणँ दिðिहँ जमु केवलु।।3।।
    महिलाहँ तणउ चरिउ को जाणइ। उभय- तउइँ जिह खणइ महा-णइ।।4।।
चन्द-कल व सव्वोवरि वङ्की। दोस- ग्गाहिणि सइँ स- कलङ्की।।5।।
णव-विज्जुलिय व चंचल-देही। गोरस- मन्थ व कारिम-णेही।।6।।
चणिय-कल कबडङ्किय-माणी। अउइ व गरुआसङ्का-थाणी।।7।।
णिहि व पयतें परिरक्खेवी। गुलहिय- खीरि व कहोंविण देवी।।8।।
अप्पोणेण जें अप्पउ वोहिउ। वरिगय सीयम लोउ विरोहिउ।।9।।
पउम चरिउ भाग-5 पृ0140-143 सम्पादक डाॅ0 एच0सी0 भायाणी
अनुवाद- डाॅ0 देवेन्द्र कुमार जैन,
प्रथम संस्करण, 1969, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन

11- मदधीनं तु यत तन्मे हृदयं त्वयि वर्तते।
    पराधीनेषु गात्रेषु किं करिष्याम्यनीश्वरी।। 10
वाल्मीकि रामायण। युद्ध काण्ड। षोडशाधिकशततमःसर्ग  श्लोक- 9
12-   वही श्लोक- 7
13- त्वया तु नृप शार्दूल रोषमेवानुवर्तता।
    लघुनेव मनुष्येण स्त्रीत्वमेव पुरस्कृतम्।। वही श्लोक- 14

14- न वृथा ते श्रमोऽयं स्यात् संशये न्यस्य जीवितम्।
    सुहृज्जनपरिक्लेशो न चायं विफलस्तव।। वही श्लोक- 13

15- नहि रामं तदा कश्चित् कालान्तकयमोपमम्।
    अनुनेतुमथो वक्तुं द्रष्टंु वाप्यशकत सुहृत्।। वही श्लोक- 22

16- न शक्तः सुदुष्टात्मा मनसापि हि मैथिलीम्।
     प्रधर्षयितुमप्राप्यां दीप्तामग्निशिखामिव।। वही, सप्तदशाधिकशतमसः सर्गः श्लोक-18

17- अवश्यं चापि लोकेषु सीता पावन मर्हति
    दीर्घ कालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा।।
    बालिशो बत कामात्मा रामो दशरथात्मजः
    इति वक्ष्यति मां लोको जानकीय विशोध्य हि।। वही, अष्ट दशाधिकशत तमः सर्गःश्लोक-13-14

18- अप्यहं जीवितं जह्यां युष्मान् वा पुरुर्षभाः
    अपवादभयाद् भीतः किं पुनर्जनकात्मजाम्।।
वाल्मीकि रामायण। उत्तर काण्ड। पञचचत्वारिषः सर्गः  श्लोक- 14-15

19- न चारिम प्रति वक्तव्यः सीता प्रति कथंचन ।। वही श्लोक- 19

20- ये मां वाक्यान्तरे ब्रूयुरनुनेतुं कथंचन
     अहिता नाम ते नित्यं मदभीष्ट विघतनात्। वही श्लोक- 21-22

21-  हृग्दतं में महच्छल्यं यस्मादार्येण धीमता।
     इअस्मिन्निमित्ते वैदेहि लोकस्य वचनीकृत ।।
वही, सप्तचत्वारिशः सर्गः श्लोक -4

22- न चास्मिनीदृशे कार्ये नियोज्यो लोक निन्दिते । वही श्लोक- 5

23- यथापवादं पौराणां तथैव रघुनन्दन
     पतिर्हि देवता नार्याः पतिर्बंधुः पतिर्गुरुः ।।
     प्राणैरपि पिं्रय तस्माद् भर्तुः कार्य विशेषतः।
     (वाल्मीकि रामायण। उत्तर काण्ड।अष्टचत्वारिशः सर्गः श्लोक 17-18)
24- वाच्यस्त्वया मद्वचनात्स राजा वह्नौ विशुद्धा मपि यत्समक्षम्
     मां लोकवादश्रवणादहासीः श्रुतस्य किं तत्सदृंश कुलस्य।।
रघुवंश। चतुर्दश सर्ग। 6।

25- उत्खातलोकत्रयकण्टकेऽपि सत्यप्रतिज्ञेऽप्यविकत्थनेऽपि।
     त्वां प्रत्यकस्मात्कलुषप्रवृत्तावस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे मे।

26- रामायण का काव्यमर्म, विद्यानिवासमिश्र
पृष्ठ-188 रघुवंश। चतुर्दश सर्गः 73
27- वही,
28- इति मदवचननाद् रामो वक्तव्यो मम संग्रहः  ।
     निरीक्ष्य माद्य गच्छ त्वमृतुकालाति वर्तिनीम्।।
     (वाल्मीकि रामायण। उत्तर काण्ड।अष्टचत्वारिशः सर्गः श्लोक 18-19)
29- दृष्द्वा देवानृषींश्चैव राघवः पुनरब्रवीत्। 
    प्रत्ययो मे सुरश्रेष्ठ ऋषिवाक्यैरकल्मषै
    शुद्धायां जगतो मध्ये वैदेहयां प्रीतिरस्तु में।
     (वही, सप्तनवतितमः सर्गः श्लोक 9-10)

30- मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये।
    तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति।।15।।

31 -रामायण काव्यमर्म, विद्यानिवास मिश्र पृ0 187 वही, श्लोक 15

32 - वही,  पृ0 189

33- एवहि तिह करेमि पुणु रहुवइ। जिहि ण होमि पडिवारी तियमइ।।
पउम चरिउ भाग-5 पृ198-199 सम्पादक डाॅ0 एच0सी0 भायाणी
अनुवाद- डाॅ0 देवेन्द्र कुमार जैन,
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन