सोमवार, 15 मई 2023

दशहरे में नीलकंठ/सदानन्द शाही



सुबह  से नीलकंठ के इंतजार में हूं।पर साक्षात नीलकंठ की नगरी में पक्षी नीलकंठ नहीं दिखा।विजयादशमी के दिन नीलकंठ पक्षी को देखने का रिवाज है। आज के दिन नीलकंठ को देखना शुभ माना जाता है। अब ऐन दशहरे के दिन नीलकंठ कहां मिले जो देखें। प्रकृति से दूरी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। मनुष्य की आत्म केन्द्रिकता ने उसे प्रकृति कहें या मानवेतर जगत का लगभग विरोधी बना दिया है। मनुष्य ने जैसे शेष प्रकृति का भरोसा ही खो दिया है।अब हम अपने घर में घुसे हुए हैं या कि कोरोना के डर से दुबके पड़े   हैं तो नीलकंठ को क्या पड़ी है कि वह अपने आशियाने से निकले और हमारे शुभ के लिए के लिए हमें दर्शन दे। 

लेकिन भाई नीलकंठ ! तुम्हें यह नाम हमारे पुरखों ने अपने सबसे प्रिय देवता के नाम पर दे रखा है,इसका तो लाज रखना था। आखिर शिव ने हालाहल विष का पान इसीलिए किया था कि उसके दाह से धरती को बचा सकें।वे विष को भीतर भी नहीं ले जा सकते थे। धरती की विवशता के लिए शिव का होना जरूरी था।सो अपने कंठ में विष को धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाए। अपने नाम से इतनी प्रेरणा तो लेते। तुम्हें कौन विषपान करना था, तुम्हें तो बस दिख जाना था।क्या तुम सिर्फ नाम के नीलकंठ हो!तुम्हें हालाहल के दाह से दग्ध होती दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है! ना मैं यह नहीं मान सकता। तुम तो आदमी की तरह स्वार्थी हो सकते हो और ही पाखणडी कि कि नाम नीलकंठ रख लो और विषवमन करते रहो। तुम तो पक्षी हो। उस पर  भी शिव के उत्तराधिकारी। शिवेतर की क्षति करके शिवता का मंगल का अलख जगाने की जिम्मेदारी तुम्हारी भी तो है।आखिर निकल क्यों नहीं रहे हो!


गांवों में तो फिर भी दिख जाते हो। वहां  बहेलिए, जिन्हें हम बचपन में मिसकार कहते थे, दशहरे के दिन जंगलों से तुम्हें पकड़ कर लाते और घर घर घूमकर तुम्हारा (नीलकंठ का) दर्शन कराते। उन्हें भी कुछ इनाम इकराम  मिल जाता।मेरे बाबा बहेलिए को कुछ ज़्यादा धन देकर उनसे नीलकंठ ले लेते और उड़ा देते।आज महेंद्र प्रताप जी के वाल पर उड़ते हुए नीलकंठ को देखकर वहीं दृश्य याद गया। मेरे बाबा के साथ से छूट कर उड़ता हुआ उत्तर दिशा की ओर जाता हुआ नीलकंठ।आंवले के पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर सुस्ताता हुआ नीलकंठ। हमें देखते हुए देखता नीलकंठ। हमारी हरकतों पर विचार करता नीलकंठ।करता तुम अपने लाभ के लिए दूसरों को बंधन में डालने की हमारी आदत पर विचार करते थे?क्या वहां बैठकर  यह विचार करते थे कि हम अपने आसपास जहर क्यों उड़ेलते रहते हैं?

आज सोचता हूं नीलकंठ पक्षी का दशहरे से क्या संबंध है? यह तो रावण पर राम के विजय का त्यौहार है! इसी रूप में हम इसे मनाते आये हैं। रामलीलाओं में राम के उसी पराक्रम को याद करते रहते हैं। यह शक्ति की आराधना का भी त्यौहार है।पूरा बंगाल दुर्गापूजा में व्यस्त हैं। अनेक तरह की दुष्प्रवृत्तियों का दमन करती हुई दुर्गा की मूर्तियां मन मोह लेती हैं। राम का पराक्रम और दुर्गा की शक्ति अन्तत: शिवत्व की ही स्थापना करते हैं।जिसे हम भूल से गये हैं। नीलकंठ कहीं इस भूली हुई कड़ी की याद तो नहीं दिलाता कहीं यह देवाधिदेव महादेव की याद दिलाने के लिए तो नहीं आता ।हमारे आस-पास फैले हुए हालाहल को पीकर खुद हमें नीलकंठ बन जाने का संकल्प दिलाता हुआ।


विजयादशमी पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।


25.10.2020


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